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48 प्रतिशत बच्चों को ही मिल पा रहा दूध

Thu, 10 Mar 2016 11:35 PM IST
ब्यूरो/लखीमपुर खीरी।
ब्यूरो/लखीमपुर खीरी। Updated Thu, 10 Mar 2016 11:35 PM IST
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Only 48 percent of children receiving milk
दूध - फोटो : amar ujala
सफल नहीं हो पा रही एमडीएम में दुग्ध वितरण योजना 
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परिषदीय विद्यालयों में प्रत्येक बुधवार को बच्चों को दुग्ध वितरण की योजना जिले में सफल नहीं हो पा रही है। विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में 48 प्रतिशत बच्चों को ही दुग्ध का वितरण होता है। योजना के सफल संचालन न होने के कारण जहां निदेशालय स्तर से असंतोष व्यक्त किया गया है, वहीं शिक्षक संगठन भी टकराव के मूड में हैं।  
बताते चलें कि शासन स्तर से परिषदीय विद्यालयों में पढ़ने वाले सभी बच्चों को प्रत्येक बुधवार को 200 मिलीग्राम दूध वितरित करने के निर्देश हैं। विभाग के निर्देश के बाद कुछ दिन तो विद्यालयों में दुग्ध का वितरण हुआ, अधिकारियों ने इसका निरीक्षण भी किया, लेकिन कनर्वजन कास्ट में इसके लिए कोई मद न होने और गुणवत्तापूर्ण दूध उपलब्ध न होने के कारणों का हवाला देते हुए शिक्षकों ने हाथ खड़े करने शुरू कर दिए। शिक्षक संगठनों ने आंदोलन कर शासन को भी दिक्कतें बताईं और कई ने दुग्ध वितरण बंद कर दिया। मार्च से शासन स्तर से कनर्वजन कास्ट की दरों में बढ़ोत्तरी हो गई है, लेेकिन दूध वितरण की स्थिति ज्यों की त्यों ही है। इधर, शासन स्तर से दूध वितरण को लेकर सख्ती हुई तो बेसिक शिक्षा अधिकारी ने फिर से सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को पत्र भेजकर दूध वितरण कराने के निर्देश दिए, लेकिन इसके बाद भी योजना सुचारु रूप से नहीं चल पाई। आईवीआरएस प्रणाली के माध्यम प्राप्त फरवरी माह की रिपोर्ट में जिले में दुग्ध का वितरण 48 प्रतिशत बच्चों को ही हुआ है। निदेशक बेसिक शिक्षा श्रद्धा मिश्रा ने इसे गंभीरता से लेते हुए बीएसए को पत्र भेजा है और शत प्रतिशत बच्चों को दूध का वितरण कराना सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए हैं। निर्देश मिलने के बाद बीएसए ने सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे दूध वितरण न करने वाले प्रधानाध्यापकों के विरुद्घ कार्रवाई की संस्तुति करके उनके कार्यालय में भेजें। इसके बाद शिक्षकों में  रोष बढ़ने लगा है।
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यह हैं दिक्कतें 
प्राथमिक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष नरेशचंद शुक्ला ने बताया कि विद्यालयों केे छ: माह हो गए हैं कनर्वजन कास्ट नहीं मिली है। दूध की गुणवत्ता की जांच करने के लिए शिक्षकों के पास कोई यंत्र नहीं है और शासन स्तर से इस तरह की कोई एजेंसी भी नहीं निर्धारित की गई है जहां से शिक्षक दूध खरीदें। इतना ही नहीं यदि अधिकारियों की जांच में दूध में किसी प्रकार की खराबी मिलती है तो विभाग प्रधानाध्यापक को ही दोषी मानता है। दूध पीने से कोई बच्चा बीमार हो जाता है तो भी शिक्षक ही दोषी माना जाता है। कई गांवों में पर्याप्त दूध की उपलब्धता ही नहीं होती है तो प्रधानाध्यापक दूध कहां से लाए इस तरह की तमाम दिक्कतें हैं। 
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शत प्रतिशत बच्चों को होगा दुग्ध का वितरण 
बीएसए ने बताया कि शासन की योजना है कुछ शिक्षक लापरवाही बरत रहे हैं। इस संबंध में सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि सभी विद्यालयों में दुग्ध वितरण सुनिश्चित कराएं उन्होंने कहा कि जो लोग दुग्ध वितरण नहीं कराएंगे उनके विरुद्घ कार्रवाई की जाएगी। विद्यालयों में कनर्वजन कास्ट की दिक्कत नहीं है।
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