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खुशियां लेने गए थे शहर, दर्द लेकर लौट रहे

Tue, 19 May 2020 10:36 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 19 May 2020 10:36 PM IST
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Went to the city to take happiness, returning with pain
14- मुंगराबादशाहपुर बार्डर पर बैठा दूसरे प्रदेश से आया प्रवासी श्रमिक परिवार। - फोटो : JAUNPUR
जौनपुर। सुनहरे सपनों को पूरा करने की चाह में गांव-घर छोड़कर परदेश गए मजदूर अब मजबूर होकर लौट रहे हैं। कभी ट्रकों के सहारे तो कभी पैदल ही मीलों सफर कर घर की ओर बढ़ रहे मजदूरों के चेहरे पर सपने टूटने का गम है तो सरकारों के प्रति गुस्सा भी। हालांकि इससे ज्यादा वह अपनी किस्मत को कोस रहे हैं। उनका कहना है कि जब तकदीर ही साथ नहीं तो वह तस्वीर कहां तक संवारेंगे। परदेश यह सोचकर गए थे कि वहां की कमा से अपनों के लिए खुशियां खरीदेंगे, लेकिन खून-पसीना एक करने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ, अलबत्ता जो बचा था, वह भी चला गया। संकट की घड़ी ने यह अहसास जरूर कराया है कि सपनों के शहर से अपना गांव ज्यादा सुखद है।
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काम-धंधा बंद था, रुककर करते क्या
मुंगराबादशाहपुर। मानी खुर्द खेतासराय के रहने वाले जमुना प्रसाद बिंद अपनी पत्नी सुनीता, पुत्र उत्तम (6), पुत्री उज्ज्वला (3) के साथ मुंबई के मुलुड में रहकर इमारमों में वेल्डिंग का काम करते थे। लॉक डाउन के बाद कुछ दिनों तक काम चलता रहा, जिससे दो वक्त की रोटी परिवार को नसीब हो जाती थी। लॉक डाउन बढ़ने के साथ ही उनकी दुश्वारियां भी बढ़ने लगी। पेट भरने के लिए दूसरों से उधार लेने की नौबत आ गई। ऐसे हालात में उन्होंने घर लौटना ही बेहतर समझा। कुछ जरुरी सामानों को समेटकर पूरा परिवार पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जगह-जगह ट्रकों का सहारा लेकर जैसे-तैसे वह प्रयागराज और फिर संकट मुंगराबादशाहपुर बार्डर पांडेयपुर तक पहुंचे। फाइलेरिया से ग्रसित पत्नी और बच्चों को लेकर वहां से पैदल ही मुंगराबादशाहपुर तक आए। जमुना प्रसाद ने बताया कि पिछले पांच दिनों से भोजन-पानी भी ढंग से नसीब नहीं हुआ। रास्ते में कुछ मददगार मिले, उसी ने चलने की ताकत दी। अब चाहे जैसे भी घर पहुंच जाएं, दोबारा कभी शहर में नहीं जाएंगे।
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गांव न लौटते तो भूखों मर जाते
बदलापुर। पूरे कुनबे के साथ सूरत से लौटे पुष्पेंद्र सरोज सरकारों की बेरुखी से आहत हैं। उनका कहना है कि मजदूरों के मदद की बातें तो खूब हो रही हैं, मगर जमीन पर उसका आधा भी नहीं उतर रहा। सब कुछ कैमरों की चकाचौंध तक ही सीमित है। बदलापुर के बलुआ गांव निवासी पुष्पेंद्र सूरज में सिलाई का काम करते थे। इसी के भरोसे परिवार का भरण पोषण चल रहा था। लॉक डाउन में काम बंद होने के बाद जमा पूंजी भी खत्म होने लगी। भूखों मरने की नौबत आती देख परिवार ने घर लौटने का फैसला किया। स्पेशल ट्रेन से चलकर प्रतापगढ़ आए और फिर वहां से बदलापुर। बताया कि गुजरात और महाराष्ट्र में स्थितियां काफी खराब हैं। वहां से नहीं आते तो बीमारी से पहले भूख से मर जाते। गांव में यह चिंता नहीं रहेगी। यहां पहुंचते ही सरकार की ओर से पूड़ी-सब्जी की व्यवस्था थी। इससे उम्मीद जगी है कि सरकार हमारे लिए कोई इंतजाम जरुर करेगी। पत्नी मनोरमा और भाई धर्मेंद्र की पत्नी अनीता ने बताया कि शहर से बेहतर तो गांव है। यहां व्यवसाय भी है, काम भी है, पैसा भी। परिवार के लोगों ने बताया कि अब हम सब मिल कर सूरत के बजाय गांव में ही अपनी गृहस्थी बसाएंगे।

5- बदलापुर में सड़क के किनारे बैठा दूसरे प्रदेश से आया पुष्पेन्द्र सरोज का परिवार।

5- बदलापुर में सड़क के किनारे बैठा दूसरे प्रदेश से आया पुष्पेन्द्र सरोज का परिवार।- फोटो : JAUNPUR

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