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एमपी में सौ रुपये लेकर पु लिस ने बेबस मजदूरों को पार कराई सीमा
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29- मुंगराबादशाहपुर पंहुचे मध्यप्रदेश से पैदल गोरखपुर जा रहे युवक।
- फोटो : JAUNPUR
खाना और पैसा खत्म, फिर भी घर पहुंचने का हौसला है कायम
- बंगलौर से दस दिन पहले पैदल निकले मजदूरों की कहानी उन्हीं की जुबानी
- एमपी में सौ रुपये लेकर पुलिस ने बेबस मजदूरों को पार कराई सीमा
संवाद न्यूज एजेंसी
मुंगराबादशाहपुर। दोपहर करीब डेढ़ बजे चिलचिलाती धूप में 35 वर्षीय रामआसरे पीठ पर बैग लटकाए हुए जौनपुर रायबरेली हाईवे पर मुंगराबादशाहपुर की ओर से जौनपुर की ओर बढ़ रहे हैं। वह दस दिन पहले बंगलौर से पैदल घर के लिए निकले हैं। उन्हें गोरखपुर जाना है। हाईवे पर पैदल चलने वालों में रामआसरे अकेले नहीं हैं। उनके साथ उसी जिले के कुल सात लोग है। उनके पास मास्क तो नहीं हैं कोई गमछे से मुहं बांधा है तो कोई रुमाल से मुहं और नाक को बांध रखा है।
वह कहते हैं कि वह बंगलौर में कंपनी में मजदूरी करते थे। लॉकडाउन में कंपनी बंद हो गई। पास में जो पैसे थे उससे हप्ते दस दिन तक पेट भर सकते थे। इसलिए गांव के लिए निकल पड़े। पहले तो लगा कि सड़कपर कोई न कोई साधन जरूर मिल जाएगा लेकिन सड़कों पर वाहन नहीं दिखे। ऐसी ही बेबसी के शिकार कई लोग जब पैदल निकल लिए तो वह भी यह सोचकर पैदल ही निकल लिए कि यहां रहकर भी क्या करेंगे। जीने का कोई सहारा अब नहीं है। हो सकता है कि घर पहुंच ही जाएं। नहीं तो मरना यहां भी है तो रास्ते में ही मर जाएंगे। यह कहते हुए उनकी आंखे डबडबा गई। उन्होंने रास्ते में पुलिस से मदद क्यों नहीं मांगी इस सवाल के जवाब में राम आसरे ने कहा कि हम किस्मत वाले हैं कि ऊपर पुलिस की लाठी नहीं पड़ी। साथ में निकले कई लोगों पर तो लाठी भी पड़ चुकी है। एमपी में तो एक जिले की सीमा पार कराने के नाम पर पुलिस वाले ने सौ रुपये भी लिए। ऐसे में कौन पुलिस से मदद मांगने जाएगा। साथ में चल रहे हरिओम बिंद, कैलाश, मुकेश कुमार की भी कहानी कुछ ऐसी ही है। मुकेश कहते हैं कि करीब तीन सौ किलोमीटर का सफर ट्रक के सहारे कट गया नहीं तो अभी न जाने कहां होते। जौनपुर रायबरेली हाईवे पर दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ, सूरत, वापी आदि शहरों से पैदल चलकर बिहार, झारखंड जाने वाले मजदूरों का सिलसिला पिछले कई दिनों से चल रहा है। हालांकि सड़क पर मजदूरों की भीड़ जो दस दिन पहले थी उसमें निरंतर कमी आई है। पैदल चल रहे इन मजदूरों के पास या तो पैसे खत्म हो गए हैं या फिर खाने पीने की वस्तुएं नहीं रह गई हैं। रास्ते में कहीं किसी को उनपर तरस आई तो कुछ खाने पीने की सामग्री जरूर दे देता है। जिससे उनका रास्ता कटता जा रहा है। मुकेश कहते हैं कि उनके पास मोबाइल फोन जरूर है लेकिन उसकी बैट्री डिस्चार्ज हो गई है। ऐसे में घर वालों से भी सम्पर्क नहीं हो पा रहा है। लॉकडाउन के बाद जगह जगह शेल्टर होम भले ही बनाए गए हैं लेकिन उन्हें कहीं भी किसी ने शेल्टर होम में रहने के लिए नहीं कहा। मछलीशहर के एसडीएम अमिताभ यादव कहते हैं कि सड़कों पर पैदल घर जाने के लिए निकले बिहार के कुछ मजदूरों को मुंगराबादशाहपुर के पास शेल्टर होम में रहने के लिए कहा गया तो शेल्टर होम जाने के लिए वे पैदल चले जरूर लेकिन आगे जाकर खेत के रास्ते बन जाने कहां चले गए। ऐसे लोग किसी भी हाल में घर पहुंचना चाह रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर बपुलिस के एक अधिकारी नेथबताया कि पहले तो कहा गया कि कोई भी व्यक्ति बाहर नहीं निकलेगा, जो जहां है, वहीं रहे, लेकिन बाद में आंशिक छूट दी जाने लगी। शुरुआत में पुलिस ने राह चलते लोगों पर सख़्ती जरूर दिखाई लेकिन अब उन लोगों को नहीं मार रही है जो अपने घरों को जा रहे हैं।
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- बंगलौर से दस दिन पहले पैदल निकले मजदूरों की कहानी उन्हीं की जुबानी
- एमपी में सौ रुपये लेकर पुलिस ने बेबस मजदूरों को पार कराई सीमा
संवाद न्यूज एजेंसी
मुंगराबादशाहपुर। दोपहर करीब डेढ़ बजे चिलचिलाती धूप में 35 वर्षीय रामआसरे पीठ पर बैग लटकाए हुए जौनपुर रायबरेली हाईवे पर मुंगराबादशाहपुर की ओर से जौनपुर की ओर बढ़ रहे हैं। वह दस दिन पहले बंगलौर से पैदल घर के लिए निकले हैं। उन्हें गोरखपुर जाना है। हाईवे पर पैदल चलने वालों में रामआसरे अकेले नहीं हैं। उनके साथ उसी जिले के कुल सात लोग है। उनके पास मास्क तो नहीं हैं कोई गमछे से मुहं बांधा है तो कोई रुमाल से मुहं और नाक को बांध रखा है।
वह कहते हैं कि वह बंगलौर में कंपनी में मजदूरी करते थे। लॉकडाउन में कंपनी बंद हो गई। पास में जो पैसे थे उससे हप्ते दस दिन तक पेट भर सकते थे। इसलिए गांव के लिए निकल पड़े। पहले तो लगा कि सड़कपर कोई न कोई साधन जरूर मिल जाएगा लेकिन सड़कों पर वाहन नहीं दिखे। ऐसी ही बेबसी के शिकार कई लोग जब पैदल निकल लिए तो वह भी यह सोचकर पैदल ही निकल लिए कि यहां रहकर भी क्या करेंगे। जीने का कोई सहारा अब नहीं है। हो सकता है कि घर पहुंच ही जाएं। नहीं तो मरना यहां भी है तो रास्ते में ही मर जाएंगे। यह कहते हुए उनकी आंखे डबडबा गई। उन्होंने रास्ते में पुलिस से मदद क्यों नहीं मांगी इस सवाल के जवाब में राम आसरे ने कहा कि हम किस्मत वाले हैं कि ऊपर पुलिस की लाठी नहीं पड़ी। साथ में निकले कई लोगों पर तो लाठी भी पड़ चुकी है। एमपी में तो एक जिले की सीमा पार कराने के नाम पर पुलिस वाले ने सौ रुपये भी लिए। ऐसे में कौन पुलिस से मदद मांगने जाएगा। साथ में चल रहे हरिओम बिंद, कैलाश, मुकेश कुमार की भी कहानी कुछ ऐसी ही है। मुकेश कहते हैं कि करीब तीन सौ किलोमीटर का सफर ट्रक के सहारे कट गया नहीं तो अभी न जाने कहां होते। जौनपुर रायबरेली हाईवे पर दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ, सूरत, वापी आदि शहरों से पैदल चलकर बिहार, झारखंड जाने वाले मजदूरों का सिलसिला पिछले कई दिनों से चल रहा है। हालांकि सड़क पर मजदूरों की भीड़ जो दस दिन पहले थी उसमें निरंतर कमी आई है। पैदल चल रहे इन मजदूरों के पास या तो पैसे खत्म हो गए हैं या फिर खाने पीने की वस्तुएं नहीं रह गई हैं। रास्ते में कहीं किसी को उनपर तरस आई तो कुछ खाने पीने की सामग्री जरूर दे देता है। जिससे उनका रास्ता कटता जा रहा है। मुकेश कहते हैं कि उनके पास मोबाइल फोन जरूर है लेकिन उसकी बैट्री डिस्चार्ज हो गई है। ऐसे में घर वालों से भी सम्पर्क नहीं हो पा रहा है। लॉकडाउन के बाद जगह जगह शेल्टर होम भले ही बनाए गए हैं लेकिन उन्हें कहीं भी किसी ने शेल्टर होम में रहने के लिए नहीं कहा। मछलीशहर के एसडीएम अमिताभ यादव कहते हैं कि सड़कों पर पैदल घर जाने के लिए निकले बिहार के कुछ मजदूरों को मुंगराबादशाहपुर के पास शेल्टर होम में रहने के लिए कहा गया तो शेल्टर होम जाने के लिए वे पैदल चले जरूर लेकिन आगे जाकर खेत के रास्ते बन जाने कहां चले गए। ऐसे लोग किसी भी हाल में घर पहुंचना चाह रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर बपुलिस के एक अधिकारी नेथबताया कि पहले तो कहा गया कि कोई भी व्यक्ति बाहर नहीं निकलेगा, जो जहां है, वहीं रहे, लेकिन बाद में आंशिक छूट दी जाने लगी। शुरुआत में पुलिस ने राह चलते लोगों पर सख़्ती जरूर दिखाई लेकिन अब उन लोगों को नहीं मार रही है जो अपने घरों को जा रहे हैं।
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