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प्रवासी मजदूरों ने बयां किया दर्द, कहा- रूखा-सूखा खा लेंगे, नहीं जाएंगे परदेश

Mon, 18 May 2020 09:33 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 18 May 2020 09:33 PM IST
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migrants told their problem due to lockdown
जौनपुर। कोरोना संकट के बीच प्रवासी श्रमिकों को सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अच्छी जिंदगी और पेट पालने की आस में अपने घर से हजारों किमी दूर निकले इन मजदूरों ने कभी नहीं सोचा होगा कि वक्त इतना बेरहम होकर इम्तहान लेगा।
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दुख, दर्द और बेबसी झेल कर मायूस लौटते इन मजदूरों का यही कहना है कि अब वह गांव का रूखा-सूखा खा लेंगे, मगर फिर से उस शहर में नहीं लौटेंगे, जिसने संकट की घड़ी में उनके सपनों को रौंद दिया। मुंबई आ रहे गुलजारगंज के चंद्रबहादुर ने बताया कि आधी दूरी ट्रकों का सहारा लेकर तो शेष पैदल ही चलना पड़ा है। घर नहीं आते तो हम भी वहां बेसहारों की मौत मर जाते। कोई सुध लेने वाला नहीं थी। मजदूरी ठप हुई तो पेट भरना मुश्किल हो गया था। जेब में जो पैसे थे, उन्हें सहेज कर किसी तरह घर के लिए चल पड़ा। अब दोबारा वहां नहीं जाऊंगा। गांव या आसपास ही कोई काम कर लूंगा।
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सोनभद्र के बभनी निवासी राहुल कुमार ने बताया कि जब घर से निकले तो महानगर में रोजगार के ढेर सारे सपने थे। एक-एक कर सब सपने टूट गए। रही-सही कसर इस लॉकडाउन ने पूरी कर दी। शहर में दुत्कार भरी जिंदगी से कई गुना गांव में स्वाभिमान से जीना है। वहां के हालात अब रहने योग्य नहीं है। अब गांव में ही काम ढूंढेंगे। जफराबाद के अमिलो गांव निवासी सुरेंद्र पालघर में रहते थे। बताया कि पहले तो स्थितियां कुछ ठीक थी, मगर कोरोना के बाद से हालात विकट हो गए थे। महामारी कैसे-किसे चपेट में ले ले, कोई भरोसा नहीं। जान बचाकर वहां से आए हैं। अब चार-पांच साल तो वापस नहीं लौटेंगे। हमारे गांव की मिट्टी और आबोहवा ही सबसे बेहतर है।
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प्रतापगढ़ निवासी लल्लन रजक नाला सोपारा में स्ट्रीट लाइट बनाने वाली कंपनी में काम करते थे। लॉकडाउन ने उनकी जिंदगी में अंधेरा कर दिया। फैक्ट्री बंद होने के बाद उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया। भोजन-पानी को कोई पूछने वाला नहीं था। लल्लन का कहना है कि जो कुछ भी कमाया था, वह बंदी के दौरान पेट भरने में खत्म हो गया। खाली हाथ घर जा रहा हूं। इतनी मेहनत गांव में करता तो परिवार सूखी रहता।

पत्नी के गहने बेचे, तब हुआ किराए का प्रबंध
सिंगरामऊ। मुंबई से कभी ट्रक तो कभी पैदल सफर कर करंजाकला के लिए परिवार समेत निकले राजेंद्र कुमार ने बताया कि वह दिहाड़ी मजदूर हैं। कल्याण में एक किराए की चाल में रहते थे। हमारे पास खाने-पीने के लिए कुछ नहीं बचा था। पत्नी ने अपने जेवर बेच कर किराए का प्रबंध किया। एक-एक व्यक्ति का चार हजार रुपये दिया गया। रास्ते भर तमाम समस्याओं को झेलते हुए रविवार की रात किसी तरह हम लोग जौनपुर-प्रतापगढ़ सीमा पर पहुंचे तो ट्रक से उतार दिया गया। यहां राजा हरपाल सिंह इंटर कॉलेज में बने क्वारंटीन सेंटर में पनाह लेनी पड़ी। यहां से आगे जाने का कोई साधन न होने के कारण हम लोग पैदल ही निकल पड़े हैं। बस किसी तरह घर पहुंच जाएं, फिर शहर नहीं जाना। गांव में मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण कर लेंगें।
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