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कौन थे राजा रामबक्श सिंह, कितनी समृद्ध थी रियासत?
अमर उजाला, भगवंतनगर (उन्नाव)
Updated Sat, 19 Oct 2013 01:10 AM IST
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डौड़िया खेड़ा में इतना बड़ा खजाना पाने की हसरत पालने वालों को इतिहास पर एक नजर जरूर डालनी चाहिए। इसके पहले राव रामबक्श सिंह के बारे में एक बार फिर जान लें।
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कोई 20 वर्ग किलोमीटर केदायरेवाली डौड़ियाखेड़ा रियासत उन्हें दहेज में मिली थी। बर्तानिया हुकूमत से बगावत करने के कारण इस रियासत पर अंग्रेजों की टेढ़ी नजर थी। कानपुर नगर नहीं अंग्रेजों की छावनी था।
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नगर आबाद होने के क्रम में सबसे पहले यहां माहेश्वरी व्यवसायी आए। फिर मारवाड़ी और एक सिलसिला शुरू हो गया। 1857 के विद्रोह को दबा देने के बाद मराठों के अंतिम पेशवा को जब पूना से निर्वासित करकेबिठूर में रखा गया तो उसकी पूरी तरह से तलाशी ली गई थी।
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तस्वीरों में देखिए: सोने के खजाने की तलाश
मतलब यह कि जो लोग यह कहते हैं कि मराठे वहां से भागे तो अपने साथ बहुत सोना लूटकर लाए इतिहास के दस्तावेज इसे झुठलाते हैं। मराठों के पास लूट का माल तो बहुत था मगर उसे गोपनीय तरीके से बिठूर लाया गया हो इसके ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं ही मिलते।
नाना साहब के दाहिने हाथ थे रामबक्श सिंह
पेशवा के मुफलिसी के दिन थे। यह बात सौ फीसदी प्रामाणिक है कि राव रामबक्श सिंह और दूसरे महान क्रांतिकारी दरियाव सिंह क्रांतिवीर नाना साहब के दाहिने बाएं हाथ की तरह थे। अंतिम पेशवा की हालत कितनी दयनीय थी इसका अंदाजा वरिष्ठ स्तंभकार नरेश मिश्र के ऐतिहासिक उपन्यास ‘क्रांति के स्वर’ से जान सकते हैं।
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इसके मुताबिक पेशवा की मौत के बाद जब पुरोहित को दक्षिणा देने के लिए सोना और जमीन देने के संकल्प की बात आई तो नानासाहब की आंखों से आंसू टपक पड़े। वे आंसू बेबसी के थे। बेबसी यह कि जिन मराठों का इकबाल काबुल की सरहदों तक बुलंद था उसके अंतिम पेशवा की अंतिम संस्कार में गज भर जमीन देने की भी हैसियत नहीं रह गई।
इस पर पुरोहित भी भावुक हो गया। कहा हम जमीन मांग नहीं रहे हैं कर्मकांड का एक हिस्सा है। जिस मित्र के लिए रामबक्श सिंह और दरियाव सिंह जान की बाजी लगाने को तैयार रहते थे खुद के पास इतना धन रहते हुए उसे इतना बेबस नहीं देख सकते थे यह समझ से परे लगता है।
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इतिहास पलटें तो डौड़ियाखेड़ा इतनी समृद्ध रियासत नहीं थी कि 1000 टन सोना छोड़ जाय और मुफलिसी में दिन कटे। पलासी की लड़ाई जीतने के बाद क्लाइव ने बंगाल के खजाने से अकेले सात स्टीमर सोना भरकर इंग्लैंड भेजवाया था। जिस कानपुर में अंग्रेजों की छावनी थी वहां की एक छोटी सी रियासत में 1000 टन सोना वे कैसे छोड़ सकते थे?
जयगढ़ में भी हुई थी खुदाई
राजस्थान के जयगढ़ में भी खजाने की अफवाह पर एएसआई ने खुदाई कराई थी। मगर वहां कुछ मिला या नहीं यह पता ही नहीं चला। जबकि वहां इस तरह का खजाना मिलने की ज्यादा संभावना थी।
राजा जय सिंह और मानसिंह मुगलों के सेनापति थे। जो सोना चांदी लूट में मिलता था उसमें वे अपना हिस्सा ले लेते थे और जयगढ़ रियासत में जमा करते थे। वहां भी खुदाई में अगर खजाना मिला होता तो चर्चा होती पर एएसआई की खुदाई में क्या मिला यह पता ही नहीं चल पाया।