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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ayodhya News ›   Would save weapon, fighting long to pull: Kedarnath Singh

हथियार सहेजने होंगे, लड़ाई लंबी खिंचेगी: केदारनाथ सिंह

Thu, 05 Nov 2015 11:25 PM IST
फैजाबाद/अमरउजाला ब्यूरो
फैजाबाद/अमरउजाला ब्यूरो Updated Thu, 05 Nov 2015 11:25 PM IST
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कवि केदारनाथ सिंह सरल-सहज और विनम्र हैं। निर्मल मुस्कान। बुजुर्गियत में बच्चों जैसी मासूमियत। जीते हैं दिल्ली का नागर जीवन पर अपनी वैचारिक चेतना के उद्गम स्थल कुशीनगर की ओर बारंबार लौटते हैं। तभी तो उनकी कविताओं में लोक-जीवन पूरे ठाठ-बाट के साथ विराजता है। तीसरे सप्तक के कवि हैं।
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काव्य संग्रह -अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य रचनाएं, बाघ, टालस्टाय और साइकिल तथा सृष्टि पर पहरा में केदार की कवित्व चेतना की उर्वर अभिव्यक्ति हुई है। अकाल में सारस को साहित्य अकादमी सम्मान मिला। ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत केदारनाथ कविता को गमक मानते हैं जो बाजार में नहीं बिकती लेकिन कविता का अस्तित्व तब तक रहेगा, जब तक उसे पढ़-सुन एक भी सिर मस्ती में हिलता रहेगा।
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 असहिष्णुता को लेकर हो रही सम्मान वापसी को वे सही कदम मानते हैं लेकिन चेताते भी हैं कि हथियार सहेजने होंगे, लड़ाई लंबी खिंचेगी। कम से कम कम तीन वर्ष तक। कहीं ऐसा न हो कि हथियार ही चुक जाएं।  पुस्तक मेले में आए केदारनाथ सिंह से विभिन्न मुद्दों पर हुई विशेष बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत है...
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सवाल: कवियों, कलाकारों का सम्मान वापस करना क्या सही कदम है।
जवाब: विरोध का एक ढंग यह भी है। महत्वपूर्ण ढंग है। हथियार सहेजने होंगे, लड़ाई लंबी खिंचेगी। यह तीन-चार साल चलेगी। ये इतनी जल्दी जाने वाले तो हैं नहीं। लड़ाई इतनी लंबी है कि कुछ हथियार बचाकर रखने चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि सारे खर्च हो जाएं।

सवाल: जब कवियों ने सम्मान वापस करना शुरू किया तो आपने कैसा महसूस किया ?
जवाब: सबसे पहले उदय प्रकाश ने सम्मान वापस किया तो हमने कहा कि तूने बेवकूफी की है, लेकिन अब कहता हूं कि उदय प्रकाश ने सही काम किया। अंकुर फिल्म में उस बच्चे की तरह काम किया जिसने तालाब में पत्थर फेंक दिया। अब तो लहरियां बननी शुरू हो गई हैं। उदय प्रकाश को इतिहास में याद किया जाएगा। लेकिन पता चल रहा है कि उदय पर दबाव बहुत पड़ रहा है।

सवाल: क्या देश में सचमुच वैचारिक अहिष्णुता का दौर है, या फिर अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं।
जवाब: हमारे देश में वैचारिक असहिष्णुता रही है, कोई नई बात नहीं है। बस नया सिर्फ इतना ही है कि मौजूदा दौर की सत्ता लोगों की आवाज को सुनना नहीं चाह रही। गुजरात में दंगे हुए तो समूचे देश में हस्ताक्षर अभियान चला था लेकिन सम्मान और पुरस्कार वापसी नहीं हुई थी। आजादी के बाद कांग्रेस की सरकार ज्यादा रही। नेहरू बड़े नेता थे, उदार थे। अमेरिकी मंत्री जान फास्ट्रेस डालिस की साजिश का शिकार पाकिस्तान हुआ और वर्मा भी लेकिन पंडित नेहरू ने देश को बचा लिया। यह खतरा अभी टला नहीं है, जो दौर चल रहा है, यदि चलता रहा तो वह देश के लिए बड़ा खतरनाक साबित होगा।

सवाल: कविता पर बाजार के दबाव को किस नजरिए से देखते हैं ?
जवाब: कविता तो गमक है और गमक बाजार में बिकती ही नहीं। खाए-पीए-अघाए लोगों की बात मैं नहीं कर रहा हूं। वे लोग बाजार का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन मैं कविता की बात कर रहा हूं। रूस में एक कलाकार तन्मयता से वायलिन बजा रहा था लेकिन श्रोता उसे सुन नहीं रहे थे। क्यों बजा रहे थे के सवाल पर उसने कहा कि वायलिन के संगीत पर एक सिर हिल रहा था। एक सिर ही काफी है। उसी तरह एक सिर का हिलना ही कविता के अस्तित्व के लिए काफी है। आखिर कालिदास क्यो जिंदा हैं? गहरी मानवीय संवेदना की छोटी सी पूंजी थी उनमें, इसीलिए कालिदास आज भी जिंदा हैं।


सवाल -  अपने सम्मान वापसी पर आप का क्या रुख है?
जवाब- मैंने तो  पहले ही कहा लड़ाई लंबी चलेंगी। कुछ हथियार तो सहेज कर रखने होंगे। हथियार  खत्म न हो जाए, इसके लिए सर्तक रहने की जरूरत है। लड़ाइयां शुरू होती हैं  तो जहां जैसी जरूरत हो, वहां वैसा हथियार प्रयोग में लाया जाता है। घटनाएं  बता रही हैं कि जो कुछ चल रहा है जल्दी शांत होने वाला नहीं है। मेरे पास भी बहुत कुछ है, सही समय आने पर उसका उचित तरीके से प्रयोग करूंगा।
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