काल की कसौटीः साकेत से जुड़ती है सोमनाथ के संयोग की कहानी, नेहरू का इनकार पर मोदी बने मुख्य किरदार
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आजाद भारत में यूं तो कई मंदिरों के पुनरुद्धार, जीर्णोद्धार, नवनिर्माण और पुनर्निर्माण की कहानियां कही व सुनी जाती हैं। पर, सोमनाथ में शिवलिंग की पुनर्स्थापना और अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण देश के लोकतांत्रिक इतिहास में चारों स्तंभों की काल की कसौटी बनते हुए आगे बढ़े हैं।
दोनों की ध्वंस व सृजन की कहानी काफी मिलती-जुलती है और पात्रों का भी गुजरात व उत्तर प्रदेश से कोई न कोई रिश्ता रहा है। सोमनाथ से साकेत की धरती तक ऐसे संयोगों का दिलचस्प योग देखने को मिलता है। सोमनाथ ने 1026 ई. में मो. गजनी के बर्बर विध्वंस को झेला तो 1528 ई. में बाबर के सिपहसालार मीर बांकी की बर्बरता का निशाना अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि स्थान पर मंदिर बना।
ऐसे शुरू हुआ सोमनाथ का काम
उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ की बड़ी सार्वजनिक सभा में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण व शिवलिंग की पुनर्स्थापना के संकल्प की घोषणा की। जूनागढ़ के नवाब ने विरोध किया और पाकिस्तान को जूनागढ़ में मिलाने का साजिश रच डाली। तब पटेल ने सेनाओं को जूनागढ़ भेज नवाब की स्टेट का देश में विलय करा दिया और शिवलिंग की पुनर्स्थापना के काम को साकार करने की योजना पर काम शुरू कर दिया।
कैबिनेट से प्रस्ताव पर गांधी ने कराया बदलाव
पटेल ने महात्मा गांधी से आशीर्वाद लेने के बाद नेहरू से मिलकर कैबिनेट में प्रस्ताव लाने का आग्रह किया। 1951 के प्रारंभ में कैबिनेट की बैठक हुई। सरकारी खर्च पर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित हुआ। कैबिनेट मीटिंग के बाद कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी और एनवी गाडगिल गांधी के पास गए। वहां गांधी ने सरकारी खर्च पर मंदिर के जीर्णोद्धार पर आपत्ति जताई व जन सहयोग का सुझाव दिया। इसके बाद कैबिनेट ने पुनर्विचार कर सोमनाथ मंदिर जीर्णोद्धार ट्रस्ट की स्थापना की। इसके संचालन की जिम्मेदारी मुंशी को सौंपी गई। मुंशी 1952 से 1957 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे ।
नेहरू आयोजन में नहीं हुए शामिल
ट्रस्ट की स्थापना से पूर्व सौराष्ट्र के तत्कालीन राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई, 1950 को मंदिर के जीर्णोद्धार के काम की आधारशिला रख दी। इस बीच, सरदार पटेल की मृत्यु के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार में खाद्य एवं रसद मंत्री के साथ-साथ गृह मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार देख रहे केएम मुंशी ने सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग की पुनर्प्रतिष्ठा व पुनर्निर्माण के काम के शुभारंभ की तिथि 11 मई, 1951 तय कराई। राममंदिर आंदोलन से जुड़े रहे अमित पुरी बताते हैं कि मुंशी ने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद व प्रधानमंत्री नेहरू को आमंत्रित किया। नेहरू ने कार्यक्रम में भाग लेने से इन्कार कर दिया और राजेंद्र बाबू को भी रोका। पर राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को अनसुना करके आयोजन में भाग लिया और पूजा-अर्चना भी की। साथ ही कहा कि दुनिया देख ले कि विध्वंस से निर्माण की ताकत बड़ी होती है।
सोमनाथ जैसा राममंदिर का इतिहास
सोमनाथ मंदिर जैसा संघर्षपूर्ण व दिलचस्प इतिहास राम जन्मभूमि का भी है। सोमनाथ के संघर्ष में जहां कई पड़ाव आए, वहीं राम जन्मभूमि आंदोलन से खूनी संघर्ष से लेकर न्यायालय की लंबी लड़ाई तक कई अध्याय जुड़े। केंद्र व प्रदेश की कई सरकारों को बनाने व बिगाड़ने में भी अयोध्या ने बड़ी भूमिका निभाई। मार्च 1885 में फैजाबाद के तत्कालीन जिला न्यायाधीश सीएम चैंबियर के रामजन्म स्थान पर पूजा अर्चना और मूर्तियों को यथावत रखने के निर्णय से लेकर उच्चतम न्यायालय के 9 नवंबर, 2019 के अंतिम फैसले द्वारा 2.77 एकड़ भूमि का विवाद और रामलला विराजमान का भूमि पर मालिकाना हक के निर्णय से सारे विवादों का पटाक्षेप होने तक लंबा व रोचक इतिहास है।
शिल्पकार गुजरात का एक ही परिवार
मंदिर का डिजाइन गुजरात के चंद्रकांत सोमपुरा ने तैयार किया है। चंद्रकांत उन प्रभाशंकर सोमपुरा के पुत्र हैं जिन्होंने सोमनाथ मंदिर का डिजाइन बनाया था। राजनीति शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी पीएम नरेंद्र मोदी के राम मंदिर के भूमि पूजन में शामिल होने का विरोध करने वालों को आड़े हाथ लेते हुए कहते हैं कि तथ्यों को न समझने वाले नेहरू को महान बताते हुए मोदी की अयोध्या यात्रा का विरोध कर रहे हैं। ये मानसिकता वह है जिसने पंथनिरपेक्षता को धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप दे दिया और इसकी आड़ में तुष्टीकरण को बढ़ावा दिया। नेहरू को सोमनाथ मंदिर के लिए सरकार के कोष से धन देने पर आपत्ति थी लेकिन मस्जिदों की मरम्मत के लिए धन देने में कोई दिक्कत नहीं थी।
शिलान्यास का भी संयोग
श्रीराम जन्मभूमि पर शिलान्यास भी दो प्रधानमंत्रियों की भूमिका के संयोग को जोड़ रहा है। एक राजीव गांधी और दूसरे नरेंद्र मोदी। राजीव शिलान्यास में आए तो नहीं थे लेकिन 9 नवंबर, 1989 को यहां शिलान्यास की अनुमति दी थी। 9 नवंबर, 1989 को जहां शिलान्यास हुआ था वह स्थल उस समय की विवादित 2.77 एकड़ भूमि के बाहर एवं मौजूदा मंदिर के प्रारूप के सिंहद्वार पर था। यह अलग बात है कि राजीव सरकार शिलान्यास की घोषणा के साथ-साथ ही मस्जिद समर्थकों और कथित धर्मनिरपेक्ष लोगों के निशाने पर आ गई। सरकार 24 घंटे के भीतर ही इतने दबाव में आ गई कि शिलान्यास स्थल को विवादित बताते हुए काम रुकवा दिया।
यूपी और गुजरात का संयोग
मोदी का राम जन्मभूमि स्थल पर आना भावी पीढ़ी को बताएगा कि नेहरू के रूप में उत्तर प्रदेश से सांसद चुने गए एक प्रधानमंत्री ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग की पुनर्प्रतिष्ठा में शामिल होने से इन्कार कर दिया था। जबकि सोमनाथ की धरती पर जन्म लेने वाले व उत्तर प्रदेश से सांसद नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर के भूमि पूजन में हिस्सा लेने में संकोच नहीं किया।