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सब नदिया लीलि लिहिस अब एक छपरा बचावा
अमर उजाला/फैजाबाद
Updated Sun, 16 Jul 2017 11:31 PM IST
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केले के पेड़ की छाया में लेटा बाढ़ पीड़ित
- फोटो : अमर उजाला
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सरयू नदी अभी भले ही लाल निशान नहीं पार कर सकी है, लेकिन बाढ़ की विभीषिका का मंजर यहां कई ग्रामीणों की आंखों के सामने नाच रहा है। कई ग्रामीण तो नदी के तेज कटान से अपना सब कुछ गंवा चुके हैं और अब उस तबाही का दर्द झेलने को मजबूर हैं।
अपना दर्द बयां करते-करते माडना माझा गांव के निवासी पारसनाथ यादव की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। पारस बताता है कि कुछ दिन ही बीते, सरयू नदी कटान करते हुए पहुंची और उसकी गृहस्थी का सारा सामान अपने साथ बहा ले गई।
उसका कहना है कि अब तो यही केला के पेड़ की छांव बची है। रविवार को दोपहरी में छाता लगाकर चारपाई पर कड़ी धूप में सोता रहा। माडना माझा गांव बिल्कुल नदी के मुहाने पर आ चुका है। नदी की तेज कटान से बेफिक्र होकर कड़ी धूप में केले के पेड़ की छांव में सोता रहा। पारसनाथ को जैसे ही जगाया गया तो बोला- सब नदिया लीलि लिहिस अब एक छपरा बचावा उसमें परिवार के औरत रहती हैं हम लोग इधर-उधर सो जाते हैं।
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कहा कि सरकारी सहायता कुछ मिली नहीं, यहां तक कि कोई अधिकारी व कर्मी हाल तक पूछने नहीं आया। लगता है सहायता भी सरकार तब देती है, जब आदमी मर जाता है
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अपना दर्द बयां करते-करते माडना माझा गांव के निवासी पारसनाथ यादव की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। पारस बताता है कि कुछ दिन ही बीते, सरयू नदी कटान करते हुए पहुंची और उसकी गृहस्थी का सारा सामान अपने साथ बहा ले गई।
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उसका कहना है कि अब तो यही केला के पेड़ की छांव बची है। रविवार को दोपहरी में छाता लगाकर चारपाई पर कड़ी धूप में सोता रहा। माडना माझा गांव बिल्कुल नदी के मुहाने पर आ चुका है। नदी की तेज कटान से बेफिक्र होकर कड़ी धूप में केले के पेड़ की छांव में सोता रहा। पारसनाथ को जैसे ही जगाया गया तो बोला- सब नदिया लीलि लिहिस अब एक छपरा बचावा उसमें परिवार के औरत रहती हैं हम लोग इधर-उधर सो जाते हैं।
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कहा कि सरकारी सहायता कुछ मिली नहीं, यहां तक कि कोई अधिकारी व कर्मी हाल तक पूछने नहीं आया। लगता है सहायता भी सरकार तब देती है, जब आदमी मर जाता है