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पिंडदान के साथ पितरों का तर्पण शुरू

Wed, 02 Sep 2020 09:54 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 02 Sep 2020 09:54 PM IST
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puja
अयोध्या। पितृपक्ष शुरू होने के साथ ही पिंडदान व पितरों को तर्पण देने का काम शुरू हो गया है। लोग अपने पूर्वजों को अयोध्या सरयू तट, गुप्तारघाट, भरतकुंड, आदि पवित्र स्थानों और घरों में जल तिलांजलि देकर अपने सामर्थ्य के अनुसार पितरों का तर्पण कर रहे हैं। यह प्रक्रिया अगले एक पखवारे तक जारी रहेगा। हालांकि इस वर्ष कोरोना के चलते सरयू के घाटों पर पिंडदान के लिए कोई भीड़ नहीं नजर आई।
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पितृपक्ष बुधवार से शुरू हो गया है। पहली तिथि प्रतिपदा से पिंडदान व पितरों का तर्पण प्रारंभ हो चुका है, लोग अपने स्वर्गवासी पूर्वजों माता-पिता, दादा-दादी आदि के लिए प्रतिदिन भोजन निकालकर उसे कौओं, गायों अथवा कुत्तों को खिला रहे हैं। पूड़ी सब्जी, खीर को हवन में आहुति देकर उसे अग्निदेव से पितरों तक पहुंचाने का निवेदन कर रहे हैं।
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पितृ पक्ष के आखिरी दिन गुड़-घी, पूड़ी-खीर, पूड़ी-सब्जी की आहुति डाली जाएगी तथा उनसे स्वर्गधाम जाने का निवेदन किया जाएगा। पितृपक्ष का प्रारंभ होने के साथ ही अयोध्या में तीर्थयात्रियों का आगमन भी तेज हो जाता था, लेकिन इस वर्ष कोरोना के कारण आसपास के जिलों के ही लोग अपने पितरों का पिंडदान एवं तर्पण के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं। पितृपक्ष के पहले दिन बुधवार को सरयू तट पर नाममात्र के लोग अपने पितरों का पिंडदान करते नजर आए।
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पितृ ऋण मुक्ति के लिए होता है कर्मकांड
सनातन धर्म में हर सनातनी के लिए तीन ऋणों पितृ ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण को प्रधान ऋण माना गया है। इसमें से एक पितृ ऋण को चुकाने के लिए लोग हर साल भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या एक पखवाड़ा तक श्राद्धकर्म करते हैं। आस्थावान सनातनी अपने पूर्वजों की आत्मशांति के लिए तिल-जल आदि से तर्पण एवं पिंडदान करते हैं। मुक्ति के अभाव में पूर्वज ब्रह्मंड में विचरण करते रहते हैं, मान्यता है कि श्राद्धकर्म से उन्हें बैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। बलरामपुर से अपने पूर्वजों का श्राद्धकर्म करने अयोध्या पहुंचे निरंकार कहते हैं कि माता-पिता और बुजुर्ग जीवित तीर्थ होेते हैं। उनका प्रेमभाव से सेवा, सम्मान, प्यार व अपनत्व से देखभाल करना, उन्हें संभालना सबसे बड़ा तीर्थाटन है।
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