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Ayodhya News: राज्याभिषेक के साथ मना राजराजेश्वर भगवान का पाटोत्सव

Tue, 17 Feb 2026 10:25 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या Updated Tue, 17 Feb 2026 10:25 PM IST
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The Patotsav of Lord Rajarajesvara was celebrated with the coronation
राम मंदिर पहुंची सुग्रीव किला से निकली भगवान राज राजेश्वर की शोभायात्रा -मंदिर समिति
अयोध्या। आस्था और वैष्णव परंपरा के अनुपम संगम का साक्षी बना पौराणिक महत्व का स्थल सुग्रीव किला, जहां विराजमान भगवान राजराजेश्वर के पाटोत्सव पर नौ दिवसीय ब्रह्मोत्सव के अंतर्गत मंगलवार को राज्याभिषेक का भव्य अनुष्ठान संपन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और जयघोष के बीच भगवान का राजतिलक हुआ तो पूरा परिसर भक्तिरस में डूब उठा।
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सुबह शोभायात्रा के रूप में राजराजेश्वर के विग्रह को सुसज्जित रथ पर विराजित कर नव्य-भव्य मंदिर में विराजमान रामलला के समक्ष ले जाया गया। मार्ग में श्रद्धालु पुष्पवर्षा करते रहे और “जय श्रीराम” के उद्घोष से वातावरण गुंजायमान रहा। राज्याभिषेक अनुष्ठान विधि-विधान से सम्पन्न हुआ, जिसमें 150 वैदिक आचार्यों ने चारों वेदों के मंत्रों के साथ अभिषेक, पूजन और स्तोत्र-पाठ के गहन आयामों को पूर्ण किया। पूरे आयोजन का संयोजन सुग्रीव किला पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी विश्वेश प्रपन्नाचार्य के मार्गदर्शन में हुआ। उनके साथ पीठ के अधिकारी अनंत पद्मनाभ स्वामी तथा रामप्रियाकुंज के महंत और कथा प्रवाचक महंत उद्धव शरण की सक्रिय उपस्थिति रही।
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यह ब्रह्मोत्सव भगवान राजराजेश्वर की प्राण प्रतिष्ठा की वर्षगांठ के साथ आश्रम के पूर्वाचार्य जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य के वैकुंठोत्सव से भी संयुक्त है। उत्सव में दक्षिण भारत तक विस्तृत वैष्णव परंपरा की छटा स्पष्ट झलक रही है। वैदिक रीति, अलंकरण, रथ सज्जा और अनुष्ठानों की शैली में उस सांस्कृतिक सेतु का अनुभव हो रहा है, जो उत्तर और दक्षिण की भक्ति धाराओं को एक सूत्र में पिरोता है।
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ब्रह्मोत्सव के क्रम में 18 और 19 फरवरी को भजन संध्या का आयोजन भी प्रस्तावित है। सुप्रसिद्ध भजन गायक अनूप जलोटा, शंभू लहरी और चंचल काबरा अपनी प्रस्तुतियों से भक्तिमय संध्या को स्वर देंगे।



राजराजेश्वर के राज्याभिषेक के साथ ही पाटोत्सव ने आध्यात्मिक गरिमा का नया आयाम रचा है। श्रद्धालुओं का मानना है कि यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की जीवंतता और वैष्णव आस्था की निरंतरता का प्रतीक है।
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