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1899 में मऊआइमा में फैला था प्लेग, सैकड़ों हुए थे शिकार

Tue, 31 Mar 2020 03:18 PM IST
अमर उजाला लोकल ब्यूरो डॉ. अखिलेश मिश्र, अमर उजाला, प्रयागराज
डॉ. अखिलेश मिश्र, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: अमर उजाला लोकल ब्यूरो Updated Tue, 31 Mar 2020 03:18 PM IST
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In 1899 mausamaa plage
डांसिंग प्लेग - फोटो : Social media

कोरोना बीमारी में भले ही प्रयागराज के लोगों ने भले ही अब तक अपने को बचाकर रखा है परंतु देश को आजादी मिलने से पहले संगम नगरी एवं आसपास के इलाके में हैजा जैसी महामारी एवं अकाल के चपेट में आकर हर वर्ष हजारों की संख्या में लोग काल के मुंह में चले जाते थे।

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1899 में गंगापार क्षेत्र में मऊआइमा में प्लेग जैसी महामारी फैलने से कस्बे और आसपास के क्षेत्र में सैकड़ों की संख्या में लोग शिकार हो गए। इलाहाबाद के आसपास में हैजा, चेचक (छोटी माता) के प्रभाव में आकर बड़ी संख्या में लोग महामारी का शिकार हो गए। 1920 के आसपास पूरे जिले में चेचक का प्रभाव रहा। इसके साथ ही जिले में महामारी के साथ समय-समय पर पड़े भीषण अकाल में हजारों मौत के मुंह में चले गए।

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In 1899 mausamaa plage
plague dance - फोटो : social media
1783-84, 1803-04 एवं 1817 में देश पर पड़े अकाल के बीच बंगाल क्षेत्र में प्लेग फैला था, इसका कुछ असर जिले पर भी पड़ा था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो.डीपी दुबे ने बताया कि 1899 में देश पर पड़े अकाल की मार के चलते मुंबई के भिमंडी क्षेत्र में प्लेग फैलने से वहां रहने वाले मऊआइमा क्षेत्र के बुनकर (जुलाहे) भागकर अपने घर चले आए।

मुंबई से आए प्लेग से बीमार बुनकरों के कारण पूरा मऊआइमा, फूलपुर क्षेत्र प्लेग जैसी महामारी की चपेट में आ गया।  इसमें हजारों की संख्या में लोग इस महामारी में मारे गए। इस बीमारी ने पूरे गंगापार क्षेत्र को प्रभावित किया, इस बीमारी से जिले के लोगों को उबरने में लोगों को कई वर्ष लग गए। देश को आजाद हुए अभी चार वर्ष ही हुए थे कि 1951 में अप्रैल में इलाहाबाद शहर में प्लेग फैल गया। इसका प्रभाव धीरे-धीरे गांव तक फैल गया।

In 1899 mausamaa plage
जानलेवा है प्लेग - फोटो : Amar Ujala

प्लेग जैसी बीमारी के चलते जिले में आसपास के कौशांबी, फतेहपुर एवं प्रतापगढ़ में हजारों की संख्या में लोग मौत के मुंह में चले गए। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. बद्री नारायण का कहना है कि 1920 के आसपास इलाहाबाद में चेचक (छोटी माता) जैसी जानलेवा बीमारी बहुत तेजी से फैली थी, इसकी चपेट में आकर बड़ी संख्या में बच्चे मौत के मुंह में चले गए थे। उन्होंने बताया कि तत्कालीन इलाहाबाद जिले में शामिल और वर्तमान में कौशांबी के कड़ा में स्थित शीतला माता के मंदिर में छोटी माता की पूजा का प्रचलन स्थानीय लोगों में बहुत अधिक था।

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