1899 में मऊआइमा में फैला था प्लेग, सैकड़ों हुए थे शिकार
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कोरोना बीमारी में भले ही प्रयागराज के लोगों ने भले ही अब तक अपने को बचाकर रखा है परंतु देश को आजादी मिलने से पहले संगम नगरी एवं आसपास के इलाके में हैजा जैसी महामारी एवं अकाल के चपेट में आकर हर वर्ष हजारों की संख्या में लोग काल के मुंह में चले जाते थे।
1899 में गंगापार क्षेत्र में मऊआइमा में प्लेग जैसी महामारी फैलने से कस्बे और आसपास के क्षेत्र में सैकड़ों की संख्या में लोग शिकार हो गए। इलाहाबाद के आसपास में हैजा, चेचक (छोटी माता) के प्रभाव में आकर बड़ी संख्या में लोग महामारी का शिकार हो गए। 1920 के आसपास पूरे जिले में चेचक का प्रभाव रहा। इसके साथ ही जिले में महामारी के साथ समय-समय पर पड़े भीषण अकाल में हजारों मौत के मुंह में चले गए।
मुंबई से आए प्लेग से बीमार बुनकरों के कारण पूरा मऊआइमा, फूलपुर क्षेत्र प्लेग जैसी महामारी की चपेट में आ गया। इसमें हजारों की संख्या में लोग इस महामारी में मारे गए। इस बीमारी ने पूरे गंगापार क्षेत्र को प्रभावित किया, इस बीमारी से जिले के लोगों को उबरने में लोगों को कई वर्ष लग गए। देश को आजाद हुए अभी चार वर्ष ही हुए थे कि 1951 में अप्रैल में इलाहाबाद शहर में प्लेग फैल गया। इसका प्रभाव धीरे-धीरे गांव तक फैल गया।
प्लेग जैसी बीमारी के चलते जिले में आसपास के कौशांबी, फतेहपुर एवं प्रतापगढ़ में हजारों की संख्या में लोग मौत के मुंह में चले गए। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. बद्री नारायण का कहना है कि 1920 के आसपास इलाहाबाद में चेचक (छोटी माता) जैसी जानलेवा बीमारी बहुत तेजी से फैली थी, इसकी चपेट में आकर बड़ी संख्या में बच्चे मौत के मुंह में चले गए थे। उन्होंने बताया कि तत्कालीन इलाहाबाद जिले में शामिल और वर्तमान में कौशांबी के कड़ा में स्थित शीतला माता के मंदिर में छोटी माता की पूजा का प्रचलन स्थानीय लोगों में बहुत अधिक था।