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मेडिकल स्टोर में लटके ताले, दवाओं को तरसे मरीज
Lucknow
Updated Sat, 11 May 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। सीतापुर से आए रामसेवक का बेटा ट्रॉमा सेंटर में जिंदगी-मौत के बीच जूझ रहा है। तीन दिन से भर्ती बेटे का इलाज कहने को तो केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर मेें हो रहा था लेकिन दवाओं और जांचों के लिए उसे बाजार के ही चक्कर लगाने पड़ रहे थे। दो दिन तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ा लेकिन शुक्रवार को दवा दुकानों की बंदी भारी पड़ गई। डॉक्टरों की लिखीं दवाएं वेलफेयर सोसाइटी की दुकानों पर मिली नहीं और बाजार में हड़ताल के कारण दुकानें बंद थीं।
सीतापुर के राम सेवक ही नहीं केजीएमयू से लेकर शहर के बाकी अस्पतालों में भर्ती अधिकतर मरीज शुक्रवार को दवाओं के लिए पर्चे लिए भटकते रहे। डॉक्टरों की बाहर से दवाएं लिखने की आदत शुक्रवार को मरीजों पर भारी पड़ गई। ब्रांड नेम से दवाएं लिखने के कारण वेलफेयर सोसाइटी की दुकानों से भी मरीजों के परिजनों को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। परिजन एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के क्षेत्रों में दवा के पर्चे लिए घूमते रहे। केजीएमयू परिसर में खुली दवा की दुकान भी मरीजों की जरूरत को पूरा नहीं कर पायी। किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी से लेकर बलरामपुर, सिविल, डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल, झलकारी बाई और डफरिन महिला अस्पताल तक के मरीज एक-एक गोली के लिए तरस गए। सबसे ज्यादा दिक्कत निजी क्लीनिक चलाने वाले चिकित्सकों को हुई। फीस लेकर बाहर की दवाएं लिखने के कारण इन चिकित्सकों के पास आने वाले मरीज खासे परेशान हुए। अमीनाबाद के थोक दवा बाजार में भी सन्नाटा पसरा रहा। अस्पतालों के आसपास स्थित मेडिकल स्टोर पर दवा के लिये भटकते हुए लोगों की काफी भीड़ मौजूद रही। डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के आस-पास कई मेडिकल स्टोर हैं, लेकिन ज्यादातर में ताला लटका रहा। कुछ मेडिकल स्टोर खुले भी तो हड़ताल समर्थकों ने उन्हें बंद करा दिया। कमलापुर से आए विक्रांत और चिनहट के कमल ने बताया कि दवा ले ही रहे थे कि दुकान बंद करा दी गई। बलरामपुर अस्पताल के बाहर कई मेडिकल स्टोर के बाहर दवा लेने वालों की भीड़ दिखी। दवा ले रहे अजीम ने बताया कि सुबह से इंतजार कर रहे हैं, जानकारी मिली कि दुकान खुलेगी। इसी वजह से घंटों इंतजार कर रहे हैं।
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सीतापुर के राम सेवक ही नहीं केजीएमयू से लेकर शहर के बाकी अस्पतालों में भर्ती अधिकतर मरीज शुक्रवार को दवाओं के लिए पर्चे लिए भटकते रहे। डॉक्टरों की बाहर से दवाएं लिखने की आदत शुक्रवार को मरीजों पर भारी पड़ गई। ब्रांड नेम से दवाएं लिखने के कारण वेलफेयर सोसाइटी की दुकानों से भी मरीजों के परिजनों को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। परिजन एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के क्षेत्रों में दवा के पर्चे लिए घूमते रहे। केजीएमयू परिसर में खुली दवा की दुकान भी मरीजों की जरूरत को पूरा नहीं कर पायी। किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी से लेकर बलरामपुर, सिविल, डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल, झलकारी बाई और डफरिन महिला अस्पताल तक के मरीज एक-एक गोली के लिए तरस गए। सबसे ज्यादा दिक्कत निजी क्लीनिक चलाने वाले चिकित्सकों को हुई। फीस लेकर बाहर की दवाएं लिखने के कारण इन चिकित्सकों के पास आने वाले मरीज खासे परेशान हुए। अमीनाबाद के थोक दवा बाजार में भी सन्नाटा पसरा रहा। अस्पतालों के आसपास स्थित मेडिकल स्टोर पर दवा के लिये भटकते हुए लोगों की काफी भीड़ मौजूद रही। डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के आस-पास कई मेडिकल स्टोर हैं, लेकिन ज्यादातर में ताला लटका रहा। कुछ मेडिकल स्टोर खुले भी तो हड़ताल समर्थकों ने उन्हें बंद करा दिया। कमलापुर से आए विक्रांत और चिनहट के कमल ने बताया कि दवा ले ही रहे थे कि दुकान बंद करा दी गई। बलरामपुर अस्पताल के बाहर कई मेडिकल स्टोर के बाहर दवा लेने वालों की भीड़ दिखी। दवा ले रहे अजीम ने बताया कि सुबह से इंतजार कर रहे हैं, जानकारी मिली कि दुकान खुलेगी। इसी वजह से घंटों इंतजार कर रहे हैं।
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