जब पंडित जी की राग माला ने कर दिया था दीवाना

Lucknow Updated Thu, 13 Dec 2012 05:30 AM IST
लखनऊ। प्रख्यात सितार वादक पं. रविशंकर करीब 23 साल पहले तरुण कलाकारों के बुलावे पर लखनऊ आए थे। भातखण्डे संगीत संस्थान के विद्यार्थियों द्वारा 1989 में बनाई गई संस्था ‘आकर्षण’ ने 24 एवं 25 अप्रैल को लखनऊ में समारोह आयोजित किया था। पं. रविशंकर ने इसमें 25 अप्रैल को सितार वादन किया था, जिसमें उन्होंने राग माला बजायी थी। यह लखनऊ में उनका आखिरी कार्यक्रम था। इसके पहले उन्होंने 24 अप्रैल को नगर की विभिन्न प्रतिभाओं को अपने हाथों से पुरस्कार प्रदान किए थे।
लखनऊ में उनके इस आखिरी कार्यक्रम के नेपथ्य में कुछ ऐसी बातें भी रहीं जो पं. रविशंकर के व्यक्तित्व तथा संगीत के प्रति उनकी प्रतिबद्धता एवं समर्पण की परिचायक भी थी। कहने की जरूरत नहीं कि रविशंकर राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी लोकप्रिय थे और उनका पारिश्रमिक भी काफी अधिक था। संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष शिशिर कपूर ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि पंडित जी उस समय ढाई लाख रुपये पारिश्रमिक लेते थे। हमारे पास इतना पैसा नहीं था, लेकिन जब हमने उन्हें बताया कि यह संगीत के तरुण विद्यार्थियों की संस्था ‘आकर्षण’ है और हम बड़े आदर के साथ उन्हें सुनने को उत्सुक हैं तो वे महज 40 हजार रुपये में कार्यक्रम करने को तैयार हो गए। इस धनराशि में संगतकारों का पारिश्रमिक भी शामिल था। हमारे पास उनके आभार के लिए शब्द नहीं थे।
कपूर बताते हैं कि पंडित जी एक दिन पहले ही लखनऊ आ गए थे। वे राजकीय अतिथि थे और राजभवन में ठहरे थे। 24 को बली प्रेक्षागृह में सम्मान समारोह आयोजित किया गया। बाद में 25 अप्रैल को रवीन्द्रालय में उनका कार्यक्रम हुआ। पं. रविशंकर ने उस समय राग यमन और फिर राग माला बजायी थी। राग माला में उन्होंने 12 राग बजाये थे। करीब साढ़े तीन घंटे चले कार्यक्रम में श्रोता मंत्रमुग्ध थे। भातखण्डे संगीत संस्थान के प्राचार्य सुरेंद्र शंकर अवस्थी हमारी संस्था के संरक्षक थे। पंडित जी भातखण्डे संस्थान भी गए थे। कपूर बताते हैं कि 1990 में हम दिल्ली स्थित उनके आवास गए थे और उन्हें 78वें जन्मदिवस पर संस्था की ओर से स्मृति चिह्न भेंट किया था। ये स्मृति चिह्न लखनऊ के प्रसिद्ध कलाकार एनएल राय ने बनाया था। कपूर बताते हैं कि जब प्रसिद्ध कथक गुरु दुर्गालाल का लखनऊ में निधन हुआ था, उन्होंने मेरे पिता केके कपूर को फोन किया था और दोनो लोगों के सहयोग से दुर्गालाल का पार्थिव शरीर दिल्ली गया था।
पं. रविशंकर ने 1989 से पहले भी कई कार्यक्रम लखनऊ में किए थे। 1976 और 1977 में उत्तर दक्षिण कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन (उडको) नामक संस्था ने उनके कार्यक्रम कराए थे। उडको से जुड़े अनिल शुक्ल और नवीन तिवारी बताते हैं कि उडको के तानसेन त्यागराज समारोह में पंडित जी ने कार्यक्रम प्रस्तुत किए थे। वरिष्ठ तबला वादक पीएन माथुर कहते हैं कि उडको का एक कार्यक्रम एनबीआरआई के उद्यान में हुआ था, लेकिन आंधी-पानी के चलते पंडित जी को कार्यक्रम अधूरा ही छोड़ना पड़ा।
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आज भी रोमांचित करते हैं वे पल
यह मेरा सौभाग्य है कि पं. रविशंकर के हाथों मुझे पुरस्कार मिला। वे आकर्षण संस्था के समारोह में आए थे और अपने कार्यक्रम के एक दिन पहले 24 अप्रैल 1989 को उन्होंने बली प्रेक्षागृह में मुझे पुरस्कार दिया था। संस्था ने संगीत नाटक अकादमी की संगीत प्रतियोगिता में श्रेष्ठ आने वाले युवा संगीत कलाकारों को सम्मानित किया था। मैं जब बहुत छोटा था और एक बार पं. रविशंकर का चित्र देखते हुए मैंने पिता जी से कहा था कि मैं भी इनके साथ फोटो खिंचवाना चाहता हूं। पिता ने कहा था कि कुछ ऐसा करो कि तुम्हारी उनके साथ फोटो खींचे। जब वे मुझे पुरस्कार दे रहे थे और उन्हें मेरे पिता के बारे में पता चला तो उन्होंने कहा था कि तुम कामेश्वर के बेटे हो? प्रेक्षागृह में प्रसिद्ध तबला वादक गुदई महाराज बैठे थे। उन्होंने भी कहा था कि ये मेरा पोता है। मुझे आज भी वे पल याद हैं। उनके सामने पहुंचकर और उनके हाथों से पुरस्कार लेते हुए मैं रोमांचित हो उठा था।
- रत्नेश मिश्र, तबला वादक

विश्व में फैलाया भारतीय संगीत का जादू
पं. रविशंकर के निधन का समाचार जानकर गहरा धक्का लगा है। उनका संगीत में महान योगदान है। भारतीय संगीत के जादू को उन्होंने पश्चिमी दुनिया में फैलाया है, जिसके कारण भारतीय संगीतकार दुनिया भर में अपने कार्यक्रम कर रहे हैं। उनका निधन गहरी क्षति है।
- प्रो. श्रुति सडोलीकर, कुलपति-भातखण्डे संगीत संस्थान

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