Space: अंतरिक्ष में बढ़ता कबाड़ बन रहा स्पेस ट्रैफिक जाम, क्या भविष्य में 'नो एंट्री जोन' बन जाएगा स्पेस
आज के समय पृथ्वी की कक्षा में हजारों की संख्या में निष्क्रिय उपग्रह, रॉकेट और अंतरिक्ष यानों के अवशेष मंडरा रहे हैं, जो कि काफी खतरनाक है।
विस्तार
अक्तूबर 4, 1957 को सोवियत संघ ने दुनिया की पहली सैटेलाइट स्पूतनिक 1 को अंतरिक्ष में लॉन्च किया। यह मानवता के इतिहास में एक बहुत बड़ा कदम था। यहीं से अंतरिक्ष अन्वेषण के एक नए युग की शुरुआत हुई, तब से लेकर अब तक 68 साल गुजर चुके हैं और इन 68 सालों के इतिहास में स्पेस में खोजबीन करने के सिलसिले में कई अंतरिक्ष अभियान भेजे जा चुके हैं। इन मिशनों के जरिए न केवल हमने चांद, मंगल, शुक्र, शनि आदि ग्रहों को एक्सप्लोर किया है बल्कि पृथ्वी की कक्षाओं में हजारों सैटेलाइटों को भी लॉन्च किया।
इन्हीं सैटेलाइटों पर हमारा सूचना तंत्र निर्भर है। हालांकि, विभिन्न स्पेस मिशनों और हजारों की संख्या में सैटेलाइटों को लॉन्च करने की प्रक्रिया में हमने अंतरिक्ष को भी काफी प्रदूषित किया है। आज के समय पृथ्वी की कक्षा में हजारों की संख्या में निष्क्रिय उपग्रह, रॉकेट और अंतरिक्ष यानों के अवशेष मंडरा रहे हैं, जो कि काफी खतरनाक है।
अंतरिक्ष मानवता का भविष्य है। हम आने वाले सालों में चंद्रमा, मंगल और दूसरे ग्रहों पर कॉलोनी बसाने की योजना बना रहे हैं। वहीं अंतरिक्ष में बढ़ता प्रदूषण भविष्य के स्पेस मिशनों को बाधित कर सकता है।
साल 1978 में नासा के वैज्ञानिक डोनाल्ड केसलर ने केसलर सिंड्रोम नाम के अनोखे सिद्धांत के बारे में बताया था। इस सिद्धांत के मुताबिक पृथ्वी की कक्षा में एक समय ऐसा आएगा जब काफी ज्यादा मात्रा में निष्क्रिय सैटेलाइटें, रॉकेट और अंतरिक्ष यान के मलबे इकट्ठे हो जाएंगे। इसके बाद इनके आपस में टकराने से और भी ज्यादा कचरा उत्पन्न होगा।
इससे होगा यह कि पृथ्वी की कक्षा मलबों के कचरे से इतना ज्यादा भर जाएगी कि अंतरिक्ष अभियानों को भेजना काफी मुश्किल भरा काम हो जाएगा। यही नहीं इसके कई गंभीर प्रभाव पृथ्वी पर देखने को मिल सकते हैं।
जीपीएस, मोबाइल इंटरनेट, सैटेलाइट टीवी जैसी सेवाएं बाधित हो सकती हैं। पृथ्वी के सूचना तंत्र को क्षति पहुंच सकती है। यही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन और उसमें मौजूद एस्ट्रोनॉट की जान पर भी खतरा आ सकता है।