Geoffrey Hinton: खुद की बनाई AI तकनीक से चिंतित हैं जेफ्री हिंटन, इसलिए मान रहे हैं AI को बड़ा खतरा
गॉडफादर ऑफ एआई कहे जाने वाले जेफ्री हिंटन का नाम कई दिनों से ट्रेंड कर रहा है। हाल ही में जेफ्री हिंटन ने एआई से जुड़ी चिंताओं को खुलकर सामने रखने के लिए गूगल से इस्तीफा दे दिया है।
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खतरों से आगाह करते हुए स्टीफन हॉकिन्स ने कहा था - "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का संपूर्ण विकास पूरी मानव जाति के लिए खतरा साबित हो सकता है। एआई बड़ी तेजी से खुद को डिजाइन करके कुछ भी कर सकने में सक्षम होंगे। इंसान धीमे जैविक विकास के कारण कई अर्थों में सीमित हैं। वे इन मशीनों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकेंगे। वे पीछे हो जाएंगे।"
चैटजीपीटी जैसे एआई लैंग्वेज मॉडल टूल्स के दस्तक के साथ अब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। चीजें काफी तेजी से बदलने लगी हैं। डिजिटल गॉड कही जाने वाली यह तकनीक नई संभावनाओं के साथ नए खतरों को भी अपने साथ लेकर आ रही है।
इसी बीच गॉडफादर ऑफ एआई कहे जाने वाले जेफ्री हिंटन का नाम कई दिनों से ट्रेंड कर रहा है। हाल ही में जेफ्री हिंटन ने एआई से जुड़ी चिंताओं को खुलकर सामने रखने के लिए गूगल से इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा देने के बाद हिंटन ने बताया कि उन्हें इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि जिस तकनीक (Artificial Intelligence) पर उन्होंने लंबे समय से काम किया। उससे आने वाले समय में दुनिया को बड़ा खतरा होने वाला है।
अपने एक इंटरव्यू में जेफ्री हिंटन ने कहा कि उन्हें डर है आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक का विकास इंसानी बुद्धिमत्ता को पीछे कर देगा। दुनियाभर में मिस-इंफॉर्मेशन को फैलाने के लिए इस तकनीक का बढ़ चढ़कर उपयोग किया जाएगा।
विकास के कालखंड में ऐसी कई खोजे हुईं, जिनके खोजकर्ता ने इस बात का स्वीकार किया कि यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी। परमाणु बम के जनक ओपेनहाइमर और रिचर्ड फाइनमेन भी उनमें से एक थे। हालांकि, दुनिया हमेशा आगे की ओर बढ़ती है। यही वजह थी, जिसके चलते जेफ्री हिंटन ने कहा कि अगर मैं यह खोज नहीं करता, तो कोई और करता लेकिन ये होता जरूर। इसे कोई रोक नहीं सकता था।
कौन हैं जेफ्री हिंटन
एआई के गॉड फादर कहे जाने वाले जेफ्री हिंटन का जन्म 6 दिसंबर 1947 को विम्बलडन, लंदन में हुआ था। हिंटन ने 1970 में कैम्ब्रिज से एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी में BA की डिग्री हासिल की। 1978 में उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में पीएचडी की डिग्री को लिया। इसके बाद जेफ्री हिंटन ने कई विश्वविद्यालयों में काम किया।
किन नई खोजों को दिया अंजाम
इसी बीच जेफ्री हिंटन बैकप्रोपेगेशन नामक एक शानदार तकनीक की खोज करते हैं। इस टेक्नोलॉजी की मदद से मशीन खुद से सीखकर अपने प्रदर्शनों में सुधार कर सकती थी।
जेफ्री हिंटन से जुड़ा एक रोचक किस्सा है। जेफ्री जब हाई स्कूल में पढ़ते थे। उस दौरान उनके दोस्त ने बताया कि दिमाग एक होलोग्राम की तरह काम करता है। ऐसे में हमारे मस्तिष्क में जो यादें बनती हैं। वो किसी एक स्थान पर न रहने कि बजाए न्यूरॉन्स के जरिए पूरे दिमाग में फैली होती हैं। इस एक बात ने जेफ्री हिंटन को जीवन में एक नई दिशा दे दी।
जेफ्री हिंटन को पता था कि जिस तरह हमारे मस्तिष्क में न्यूरल नेटवर्क काम करते हैं। हमारी यही काबिलियत मशीनों को भी दी जा सकती है। क्या हो अगर मस्तिष्क की कार्यविधि को मशीनों में सिमुलेट कर दिया जाए? इसी को लेकर उन्होंने DNN रिसर्च इनकॉर्पोरेशन नामक एक कंपनी को शुरू किया। यहां उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप लर्निंग न्यूरल नेटवर्क के ऊपर कई शानदार काम किए।
जेफ्री हिंटन की DNN रिसर्च कंपनी के न्यूरल नेटवर्क और ईमेज प्रोसेसिंग पर शानदार काम को देखते हुए साल 2013 में गूगल ने इसे अपने अधिग्रहण में ले लिया। इसके बाद से डॉक्टर हिंटन गूगल के साथ मिलकर काम करने लगे।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ऊपर रिचर्च करने के लिए गूगल ने अपना एक खास डिविजन बना रखा है। इस डिवीजन में एक टीम है, जिसका नाम गूगल ब्रेन है। यहीं पर जेफ्री हिंटन एआई पर रिसर्च का काम कर रहे थे।
आपको इस बारे में पता होना चाहिए कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ऊपर कई क्षेत्रों में रिसर्च चल रही है। उन्हीं में से एक का नाम डीप लर्निंग है। डीप लर्निंग में ही न्यूरल नेटवर्क आता है, जहां जेफ्री हिंटन ने कई खोजों को अंजाम दिया। इस क्षेत्र में हिंटन द्वारा की गई रिसर्च ने दुनिया भर में खूब सुर्खियां बटोरी। आज के समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बाजार में उनकी रिसर्च पर कई प्रोडक्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है। वॉयस एंड इमेज रिक्गनिशन सॉल्यूशन उनमें से एक है।
क्या है वॉयस रिक्गनिशन सॉल्यूशन
वॉयस रिक्गनिशन सॉल्यूशन एक खास तरह की तकनीक है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग की मदद से व्यक्ति की आवाज की विशिष्टताओं को पहचानकर उसे शब्दों में लिखने के लिए किया जाता है। आज के समय स्पीच टू टेक्स्ट, वर्चुअल असिस्टेंट जैसी तकनीकों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है।
इमेज रिक्गनिशन सॉल्यूशन
वहीं इमेज रिक्गनिशन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग की मदद से किसी चित्र के खास पहलुओं की पहचान की जाती है। इसमें इमेज का शेप, कलर, साइज, टैक्सचर जैसी चीजें शामिल हैं। आज के समय इस तकनीक का उपयोग फेसियल रिक्गनिशन, किसी वस्तु की पहचान करने और सेल्फ ड्राइविंग कार में किया जा रहा है।
इन खतरों को लेकर चिंतित हैं जेफ्री हिंटन
मिसइंफॉर्मेशन
निकट भविष्य में समाज के अंदर ध्रुवीकरण को बढ़ाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को इस्तेमाल में लाया जा सकता है। एआई तकनीक की मदद से डीपफेक वीडियोज और इमेज को बनाकर फेक न्यूज फैलाए जाएंगे। ऐसे में इस तकनीक के उपयोग से किसी एक संप्रदाय को दूसरे संप्रदाय के लोगों के खिलाफ भड़काया जा सकता है। गलत सूचनाओं के जरिए लोगों के बीच गलत धारणाओं को पैदा किया जा सकता है।
मंशा पर सवाल
अगर किसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का निर्माण गलत मंशा को ध्यान में रखकर किया जाए, तो क्या होगा? उदाहरण के तौर पर अगर किसी एआई प्रोग्राम को गलत डाटा सेट के साथ ट्रेन किया जाए, तो वह किसी खास संप्रदाय, ग्रुप या व्यक्ति विशेष के लिए पूर्वाग्रहों से भरा होगा। इससे समाज में कई तरह की समस्याएं देखने को मिल सकती हैं।
रोजगार
आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ चढ़कर उपयोग होने वाला है। कंटेंट राइटिंग, स्क्रिप्ट राइटिंग, इमेज डिजाइनिंग, डाटा एनालिसिस से लेकर कई जरूरी काम ऑटोमेट होने वाले हैं। इस कारण बड़े पैमाने पर लोगों के ऊपर रोजगार का संकट आ सकता है।
सरकार को दखल देने की है जरूरत
एआई का जिस तेजी से विकास हो रहा है। ऐसे में सरकार को इस क्षेत्र में अब देखल देने की जरूरत है। आने वाले वक्तों में एआई से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार को ऐसे मापदंडों को निश्चित करने की जरूरत है, जिससे उस तरह के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को बाजार में आने से रोका जा सके, जो इंसानी मूल्यों के साथ तालमेल न रखते हों। सरकार को ऐसे कड़े कानून बनाने होंगे, जिनकी मदद से एआई से जुड़े दुरुपयोगों को रोका जा सके।
इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी वो क्या चीजें हैं, जिनके चलते आने वाले समय इंसानों को बड़े खतरे का सामना करना पड़ सकता है। उस पर सही दिशा से काम करने की जरूरत है।
जेफ्री हिंटन एआई द्वारा संचालित होने वाले ऑटोनोमस हथियारों से काफी चिंतित हैं। अगर यह तकनीक गलत हाथों में चली जाती है, तो इसके कई विनाशकारी परिणाम देश दुनिया को भुगतने पड़ सकते हैं।
साल 2015 में Neil Blomkamp की चेपी नामक एक शानदार फिल्म रिलीज हुई। फिल्म में एक ऐसे भविष्य की कहानी को दिखाया गया है, जहां मशीनीकृत रोबोट द्वारा पुलिस का काम किया जा रहा है। इसी बीच एक्टर देव पटेल उनमें से एक रोबोट को चुराकर उसमें कुछ खास तरह की प्रोग्रामिंग करते हैं। अल्गोरिदम कुछ इस तरह सेट होते हैं कि चेपी नामक यह रोबोट संवेदनशील हो जाता है। इसमें इंसानों की तरह खुद के होने और महसूस करने की क्षमता आ जाती है। शुरुआत में यह रोबोट एक छोटे बच्चे की तरह किसी चीज को देखकर डर जाता है। धीरे-धीरे यह रोबोट इंसानों की तरह ही चीजों को तेजी से जानना समझना और उनका विश्लेषण करना शुरू करता है। नतीजा यह निकलता है कि एक समय के बाद चेपी इंसानी चेतना को निकालकर उसको रोबोट में ट्रांसफर कर देता है। खैर यह एक फिल्मी कहानी है, लेकिन संभावनाएं अनंत हैं...