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Hindi News ›   Sports ›   Womens Day Special: Payal lost hands legs due to current, became worlds first archer without hands and legs

महिला दिवस विशेष: करंट ने उम्मीद छीनी, पर पायल का नहीं टूटा हौसला, बनीं बिना हाथ-पैर की विश्व की पहली तीरंदाज

Sat, 08 Mar 2025 08:47 AM IST
स्वप्निल शशांक हेमंत रस्तोगी, अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
हेमंत रस्तोगी, अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: स्वप्निल शशांक Updated Sat, 08 Mar 2025 08:47 AM IST
सार

पायल बिना बाजुओं की तीरंदाज शीतल देवी को हराकर राष्ट्रीय पैरा तीरंदाज चैंपियन बन चुकी हैं। यही नहीं ओडिशा के पुरी में सामान्य तीरंदाजों के बीच राष्ट्रीय रैंकिग टूर्नामेंट में 8वां स्थान हासिल कर सबको चौंका दिया।

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Womens Day Special: Payal lost hands legs due to current, became worlds first archer without hands and legs
पायल - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

महज सात वर्ष की उम्र में पायल नाग के जीवन में वह तूफान आया, जिसने उनकी जिंदगी को दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। राजमिस्त्री पिता रायपुर (छत्तीसगढ़) में एक बिल्डिंग में काम कर रहे थे और पायल इसी बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर खेल रही थीं। इसी दौरान वह बिजली की नंगी तारों की चपेट में आ गईं। डॉक्टरों ने उन्हें बचा तो लिया, लेकिन जीवन के लिए उन्हें अपने दोनों हाथ और पैर गंवाने पड़े। कुछ वर्ष बाद बालंगीर (ओडिशा) जिले की रहने वाली पायल के बारे में वहां के जिलाधिकारी को पता लगा तो उन्होंने उसे वहां के अनाथ आश्रम भेज दिया।
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उनकी जिंदगी में बदलाव मई, 2023 में तब आया जब माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड तीरंदाजी अकादमी में बिना बाजुओं की तीरंदाज शीतल देवी के कोच कुलदीव वेदवान ने उनकी सोशल मीडिया पर एक फोटो देखी। वह पायल को लेने बालंगीर पहुंच गए। बमुश्किल वह पायल को कटरा ला पाए। उन्होंने पायल के लिए दो विशेष उपकरण बनवाकर धनुष-बाण चलवाया और उन्हें बिना हाथ-पैर की दुनिया की पहली तीरंदाज बना दिया। आज वही पायल, शीतल को हराकर न सिर्फ राष्ट्रीय पैरा तीरंदाज चैंपियन बन चुकी हैं बल्कि उन्होंने बृहस्पतिवार को पुरी (ओडिशा) में सामान्य तीरंदाजों के बीच राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट में आठवां स्थान हासिल किया।
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शीतल और पायल - फोटो : Amar Ujala
अब एक ही सपना पैरालंपिक स्वर्ण जीतना
17 वर्षीय पायल अमर उजाला को 2015 की करंट लगने की घटना को बताते हुए भावुक हो जाती हैं। वह अपने को संभालते हुए कहती हैं कोच कुलदीप और श्राइन बोर्ड ने उन्हें नया जीवन दिया है। अब उनका एक ही सपना है देश के लिए पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का। कुलदीप बताते हैं कि पायल को बालंगीर से लाना आसान नहीं था। वह बेहद गरीब परिवार से हैं। उन्होंने जब अनाथ आश्रम को बताया को वह इस बच्ची को तीरंदाज बनाना चाहते हैं और कटरा ले जाना चाहते हैं तो आश्रम संचालकों ने उन्हें पायल को देने से मना कर दिया। तब उन्होंने वहां के जिलाधिकारी चंचल राणा से संपर्क किया। उन्होंने पायल को कटरा भेजने की अनुमति दी।

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शीतल और पायल - फोटो : Amar Ujala
पहली बार धनुष-बाण देखा तो बोलीं कैसे चलाऊंगी
कुलदीप के मुताबिक पायल जब कटरा आईं और उन्होंने दूसरे तीरंदाजों को धनुष-बाण चलाते देखा तो वह निराश हो गईं। उन्हें लगा कि वह कैसे धनुष-बाण चला पाएंगी। उनके तो हाथ और पैर ही नहीं हैं। कुलदीप बताते हैं उन्होंने पायल के पहले प्रोस्थेटिक पैर लगवाए और ऐसा उपकरण तैयार किया जिससे पायल को धनुष उठाने में कोई दिक्कत नहीं हो। दूसरा उपकरण वह शीतल के लिए पहले ही तैयार कर चुके थे। इन दोनों उपकरणों के सहारे उन्होंने शीतल की तरह पायल को तीरंदाजी शुरू कराई। इसी वर्ष जनवरी में जयपुर में हुई राष्ट्रीय पैरा तीरंदाजी में पायल ने रैंकिंग राउंड में शीतल को पीछे छोड़ा और ओलंपिक राउंड में शीतल को हराकर स्वर्ण भी जीत लिया।
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पायल - फोटो : payal_archer_-instagram
पायल कैसे चलाती हैं धनुष बाण
पायल दाहिने नकली पैर में धनुष को फंसाती हैं, फिर उसे ऐसे सीधा करती हैं, जैसे एक सामान्य तीरंदाज हाथ के धनुष को पकड़ता है। यह धनुष एक विशेष उपकरण के सहारे पैर में फंसाया जाता है। धनुष में तीन फंसाने के बाद वह दाहिने कंधे से तीर को खीचती हैं और प्रत्यंचा (रिलीजर) को छोड़ते हुए निशाना साधती हैं। कुलदीप बताते हैं कि उन्होंने ये उपकरण न्यूटन के लॉ को ध्यान में रखकर विशेष रूप से पायल और शीतल के लिए तैयार किए।
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