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Wimbledon 2019: किसी ने दिल जीते किसी ने मैदान

जयदीप कर्णिक, नई दिल्ली Updated Mon, 15 Jul 2019 02:50 PM IST
फेडरर और जोकोविच
फेडरर और जोकोविच - फोटो : सोशल मीडिया
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इंग्लैंड की फिजाओं में खेल के रोमांच को बाआसानी सूंघा जा सकता था। जहां लॉर्ड्स के मैदान में इंग्लैंड खुद अपने ही ईजाद किए खेल का विश्व खिताब जीतने को बेताब था, वहीं लॉर्ड्स के उस ऐतिहासिक क्रिकेट मैदान से महज 15 किलोमीटर दूर विम्बलडन में घास के मैदान पर रोजर फेडरर और नोवाक जोकोविच अपनी बादशाहत साबित करने के लिए भिड़ रहे थे।

क्या सचमुच जो जीता वही सिकंदर? 

1975 से अब तक क्रिकेट के 12 विश्व कप हो गए हैं, पर इंग्लैंड जीत के लिए तरसता रहा। न्यूजीलैंड पीछे से आकर ऊपर पहुंच गया था, पर दिल उसके साथ थे। खेल भी न्यूजीलैंड ने जीवट के साथ दिखाया। बात सुपर ओवर तक गई पर आखिर इंग्लैंड ने विश्व कप को चूम लिया। क्योंकि किसी को तो जीतना ही था। तकनीकी तौर पर न्यूजीलैंड की टीम हारी  ज़रूर, पर दिल जीत गई| खुद बेन स्टोक्स के चेहरे पर इस अधूरी जीत का मलाल देखा जा सकता था| 

वहीं घास के मैदान पर 4 घंटे 57 मिनट लंबे चले विम्बलडन के फाइनल में कई दिल थाम लेने वाले लम्हों से गुजरते हुए आखिर कप को जोकोविच ही चूम पाए। क्रिकेट और टेनिस रविवार के दोनों ही शीर्ष मुक़ाबलों ने इस कहावत को झुठलाने की कोशिश की - जो जीता वही सिकंदर!

जीत का स्वाद! 

नोवाक ने जीत के बाद जिस भाव से सेंटर कोर्ट की दूब को अपने होंठों से चूमते हुए हलक में उतारा, वो ये बताने के लिए काफी है के ये सर्बियाई चैम्पियन इस जीत से कितना रोमांचित है। ये सर्बियाई लड़ाका इस मैच को जिंदगी भर याद रखना चाहता था। वो चाहता था कि ये क्षण और ये जीत उसके लिए अविस्मरणीय बन जाए। इसीलिए उसने उस मैदान से घास को उठा कर चबा लिया ताकि वो सदा के लिए उसके रक्त और मज्जा का हिस्सा बन जाए! वो ऐसा करें भी क्यों ना....वो ग्रास कोर्ट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के मुंह से जीत छीन कर ले आए थे। जीत का ये स्वाद उन्होंने कितनी मेहनत से चखा ये तो दुनिया ने देखा। फेडेक्स के नाम से अपने चाहने वालों के दिलों पर राज करने वाले स्विट्जरलैंड के रोजर फेडरर की जीत के लिए मानो हर कोई इबादत कर रहा था। 

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सेंटर कोर्ट पर सिर झुका कर प्रार्थना कर रही उनकी पत्नी मिर्का की बुदबुदाहट में सभी की दुआए शामिल थीं। फेडेक्स खेले भी खूब। पूरे जीवट, दमखम और अनुभव के साथ। जब भी लगता कि आज उनका दिन नहीं .... वो पलट आते....पहले संघर्षपूर्ण सेट में हारने के बाद वो दूसरा सेट यूं जीते गोया वो बस जीतने के लिए ही बने हों। पर सामने जोकोविच थे। चीते की तरह चपल और उन्हीं की तरह भावनाओं पर अंकुश रखने में कामयाब....। 

जोकोविच ने मैच को कभी एकतरफा नहीं होने दिया। बल्कि 37 साल के रोजर को खूब थकाया। विम्बलडन के इस फाइनल में कई ड्यूस और टाईब्रेकर से होते हुए जब बात पांचवे सेट तक पहुंची, तब दोनों ही खिलाड़ियों की असली परीक्षा हुई। 35 शॉट्स वाली रैलियां और हर एक पॉइंट के लिए संघर्ष!! जब बात 12-12 गेम की बराबरी पर आई तो परीक्षण बस धैर्य का रह गया था।

खेल तो दोनों दिखा चुके थे। फेडरर तो खैर तभी हार गए थे जब उन्होंने दो चैंपियनशिप पॉइंट गंवा दिए। वो उनका मौका था। पर नोवाक ने साबित कर दिया कि आज उनका दिन है। वो जीत को अपने पास खींच लाए। टाई ब्रेकर में जीत गए। इन दोनों ही महान खिलाड़ियों ने रविवार को अपने खेल से टेनिस प्रेमियों को तृप्त कर दिया। जोकोविच कप ले गए और फेडरर दिल.....।

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