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Samwad 2025: पिता के संघर्षों को याद कर भावुक हुए विजेंदर सिंह, अमर उजाला संवाद में युवाओं को दिया खास संदेश

Thu, 17 Apr 2025 05:38 PM IST
Mayank Tripathi स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Mayank Tripathi Updated Thu, 17 Apr 2025 05:38 PM IST
सार

'खिलाड़ियों की राह, आसान या मुश्किल' सत्र में लोगों को संबोधित करते हुए ओलंपिक पदक विजेता विजेंदर सिंह ने अपने पिता के संघर्षों को लेकर बात की। 

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Samwad 2025: Vijender Singh got emotional remembering his fathers struggles in Amar Ujala Samvad
विजेंदर सिंह - फोटो : Amar ujala

विस्तार

लखनऊ में अमर उजाला संवाद 2025 कार्यक्रम जारी है। इसमें कई बड़ी हस्तियां पहुंच रही हैं। इसी कड़ी में भारत के दिग्गज मुक्केबाज विजेंदर सिंह भी इस कार्यक्रम में पहुंचे। इस दौरान उन्होंने खेल और खिलाड़ियों को लेकर अपने विचार साझा किए। 'खिलाड़ियों की राह, आसान या मुश्किल' सत्र में लोगों को संबोधित करते हुए ओलंपिक पदक विजेता विजेंदर सिंह ने अपने पिता के संघर्षों को लेकर बात की। 
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ये भी पढ़ें: Samwad 2025: क्रिकेटर या पहलवान क्यों नहीं बने विजेंदर? बॉक्सर ने दिया जवाब, संवाद में सुनाया पुराना किस्सा    
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पिता के संघर्षों को याद कर भावुक हुए
कार्यक्रम के दौरान विजेंदर सिंह से उनके पिता के संघर्षों को लेकर सवाल किया गया। इस पर जवाब देते हुए बॉक्सर भावुक हो गए। उन्होंने कहा- संघर्ष के दिन बिल्कुल याद आते हैं। कहते हैं न कि वो जमीन नहीं भूलनी चाहिए जहां से आप आए हैं। मेहनत अब भी बाकी है, बहुत सारी चीजें करनी हैं जिंदगी में। 

युवाओं को दिया खास संदेश
इस दौरान विजेंदर ने युवाओं को खास संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि मेहनत के पथ पर चलते रहने से सफलता एक दिन जरूर मिलती है। बॉक्सर ने आगे कहा- जिंदगी आपको बहुत सारे मौके देती हैं, आप उन सब मौकों को पकड़िए, उन्हें जाने मत दीजिए। मौकों का सही तरीके से फायदा उठाइए और उन्हें व्यर्थ मत जाने दीजिए। पीछे देखेंगे तो आगे वाली ट्रेन छूट जाएगी। 
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बॉक्सिंग ही क्यों चुना? पहलवानी भी चुन सकते थे क्रिकेट भी चुन सकते थे?
संवाद के दौरान जब विजेंदर से उनके बॉक्सिंग करियर को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने इससे जुड़ा एक बहुत पुराना किस्सा सुनाया। उन्होंने कहा- बॉक्सिंग को इसलिए चुना क्योंकि मेरे दादा जी जो थे जब वो रिटायर हुए तो  वो बॉक्सिंग के ग्लव्स लेकर आए थे। वो 1972-73 में रिटायर हुए थे। तब वो बॉक्सिंग ग्लव्स लाए और तब हमें पता चला था कि बॉक्सिंग क्या होती है। तब हम गांव में प्रैक्टिस करते रहते थे। एक हाथ से ही करते रहते थे। फिर धीरे धीरे शौक जगा। भिवानी में एक बार जब घूमने गए तो वहां मैच देखा। बॉक्सिंग ने हमें चुना, हमने बॉक्सिंग को नहीं चुना। मैं दूसरे खेलों में भी गया, लेकिन वहां सफलता नहीं मिली। हॉकी भी खेला, लेकिन वहां सफलता नहीं मिली। जिम्नास्टिक भी कोशिश की, बास्केटबॉल भी ट्राई किया, लेकिन सफलता नहीं मिली, लेकिन बॉक्सिंग ने मुझे स्वीकार कर लिया और कहा कि तू इधर आ जा। तब से मैं उसी के साथ चलता गया और नहीं छोड़ा उसका साथ।

कॉलेज के दिनों से था मुक्केबाजी का शौक
29 अक्तूबर, 1985 में हरियाणा के भिवानी में जन्मे विजेंदर के पिता महिपाल सिंह बेनीवाल हरियाणा रोडवेज़ में बस ड्राइवर हैं। उनकी मां गृहणी हैं। विजेंद्र बेहद निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से जुड़े हैं। विजेंदर सिंह को कॉलेज के दिनों से ही मुक्केबाजी और कुश्ती का शौक था, वह इसकी प्रैक्टिस भिवानी बॉक्सिंग क्लब में करते थे। उन्होंने कोचिंग का प्रशिक्षण भारतीय बॉक्सिंग कोच गुरबक्श सिंह संधू से लिया है। 17 मई, 2011 को विजेंदर ने अर्चना सिंह को हमसफर बनाया। अर्चना दिल्ली की रहने वाली हैं और सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल हैं।

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2008 बीजिंग ओलंपिक में जीता था कांस्य
विजेंदर को साल 2009 में राजीव गांधी खेल रत्न से नवाजा गया था। उन्होंने 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा था। वे इन खेलों में पदक जीतने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज थे। विजेंदर बीजिंग ओलंपिक में पदक जीतने वाले दूसरे भारतीय एथलीट थे।

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