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मनप्रीत की कहानी: 13 साल की उम्र में पिता को खोया, मां भी हुईं लकवाग्रस्त फिर भी नहीं मानी हार; अब जीता कांस्य

Fri, 25 Sep 2026 04:57 PM IST
मयंक त्रिपाठी स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, आइची नागोया Published by: मयंक त्रिपाठी Updated Fri, 25 Sep 2026 04:57 PM IST
सार

13 साल की उम्र में पिता को खोने और कुछ साल बाद मां के लकवाग्रस्त होने के बावजूद मनप्रीत कौर ने खेल का साथ नहीं छोड़ा और लगातार संघर्ष करती रहीं। प्रतिबंध और लंबे उतार-चढ़ाव के बाद अब 36 साल की उम्र में उन्होंने एशियन गेम्स में 17.17 मीटर के प्रयास से कांस्य पदक जीतकर अपनी वापसी को यादगार बना दिया।

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Manpreet Kaurs Inspiring Journey: From Losing Her Father at 13 to Winning Asian Games Bronze
मनप्रीत कौर - फोटो : IANS

विस्तार

उम्र 36 साल, जिंदगी में एक के बाद एक मुश्किलें और खेल के मैदान में वर्षों का संघर्ष... लेकिन पंजाब की मनप्रीत कौर ने हार नहीं मानी। एशियाई खेलों में शुक्रवार को महिला गोला फेंक स्पर्धा में 17.17 मीटर का थ्रो कर कांस्य पदक जीतने वाली मनप्रीत की कहानी सिर्फ एक पदक की नहीं, बल्कि मुश्किल हालात के बीच अपने सपने को जिंदा रखने की कहानी है। मनप्रीत ने चीन की सोंग जियुआन के 19.40 मीटर और झांग लिनरू के 18.14 मीटर के बाद तीसरा स्थान हासिल किया। इस पदक के साथ उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि उम्र या परिस्थितियां किसी खिलाड़ी के हौसले से बड़ी नहीं होतीं।
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13 साल की उम्र में पिता को खो दिया
पंजाब के पटियाला जिले के सहौली गांव में जन्मी मनप्रीत तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं। जब वह महज 13 साल की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया। परिवार पर यह पहला बड़ा संकट था, लेकिन मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। साल 2006 में उनकी मां लकवाग्रस्त हो गईं। उस दौर में परिवार की जिम्मेदारियां भी थीं और मनप्रीत के सामने अपने भविष्य का सवाल भी। इसके बावजूद उन्होंने खेल को अपने जीवन से दूर नहीं होने दिया।
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परिवार से मिला खेल का संस्कार
मनप्रीत को खेलों में रुचि अपने पिता और परिवार के दूसरे सदस्यों से मिली। उनके कई रिश्तेदार खेलों से जुड़े थे। एक चचेरा भाई विश्वविद्यालय स्तर पर 100 मीटर दौड़ में हिस्सा लेता था, जबकि दूसरा चक्का फेंक में खेलता था। उनकी भाभी भी गोला फेंक खिलाड़ी थीं। मनप्रीत ने शुरुआत में करीब एक साल तक 100 मीटर दौड़ की तैयारी की। लेकिन उनके साथ प्रशिक्षण करने वाले भाई ने उनकी क्षमता को देखते हुए उन्हें गोला फेंक में हाथ आजमाने की सलाह दी। इसके बाद उन्होंने अपना खेल बदल लिया और यहीं से उनके लंबे सफर की शुरुआत हुई।
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2006 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रखा कदम
मनप्रीत ने 2006 में मकाऊ में हुई एशियाई जूनियर चैंपियनशिप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदार्पण किया। उन्होंने गोला फेंक में 12.41 मीटर के प्रयास के साथ आठवां स्थान हासिल किया। इसके बाद उन्होंने लगातार आगे बढ़ना जारी रखा। 2007 में दक्षिण एशियाई जूनियर चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। 2016 के दक्षिण एशियाई खेलों में भी उन्होंने 17.94 मीटर के प्रयास के साथ स्वर्ण अपने नाम किया।

शानदार प्रदर्शन के बाद लगा प्रतिबंध, फिर की वापसी
  • मनप्रीत के करियर का एक कठिन दौर 2017 में आया। उन्होंने उस साल शानदार प्रदर्शन करते हुए एशियाई ग्रां प्री में 18.86 मीटर का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था और एशियाई चैंपियनशिप में भी स्वर्ण पदक जीता था। 
  • लेकिन बाद में प्रतिबंधित पदार्थों से जुड़े चार उल्लंघनों के कारण उन पर चार साल का प्रतिबंध लगा। इसके चलते उनके पदक और राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी उनसे छिन गए। यह उनके खेल करियर के सबसे कठिन दौर में से एक था।
  • प्रतिबंध खत्म होने के बाद उन्होंने फिर मैदान पर वापसी की। वापसी के बाद 2023 की एशियाई चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीता। उसी साल हांगझोउ एशियाई खेलों में वह पांचवें स्थान पर रही थीं।

2026 में फिर पोडियम पर पहुंचीं
मनप्रीत ने 2026 में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार अच्छा प्रदर्शन किया। राष्ट्रमंडल खेलों में 17.49 मीटर के प्रयास के साथ वह चौथे स्थान पर रही थीं और पदक से मामूली अंतर से चूक गई थीं। लेकिन एशियाई खेलों में उन्होंने इस बार कोई मौका नहीं गंवाया। 17.17 मीटर के प्रयास के साथ उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम किया। उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 18.06 मीटर है, जो उन्होंने 2022 में हासिल किया था।

खिलाड़ी के साथ रेलवे में जिम्मेदारी भी संभाल रहीं
मनप्रीत की जिंदगी अब सिर्फ खेल के मैदान तक सीमित नहीं है। वह भारतीय रेलवे के पटियाला लोकोमोटिव वर्क्स में मुख्य कार्यालय अधीक्षक के पद पर कार्यरत हैं। उनके पति करमजीत सिंह भी विश्वविद्यालय स्तर के गोला फेंक खिलाड़ी रहे हैं और उनके प्रशिक्षक भी हैं। दोनों की एक बेटी है।

13 साल की उम्र में पिता को खोने से लेकर मां की बीमारी, खेल में शुरुआती संघर्ष, अंतरराष्ट्रीय सफलता, प्रतिबंध और फिर वापसी तक मनप्रीत ने कई उतार-चढ़ाव देखे। नागोया में जीता गया यह कांस्य पदक इसलिए उनके लिए सिर्फ एक और पदक नहीं है, बल्कि वर्षों तक जारी रहे उस संघर्ष का नतीजा है, जिसमें उन्होंने परिस्थितियों को अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया।
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