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जब ध्यानचंद की हॉकी तुड़वा कर हुई जांच, चुंबक होने की थी आशंका
amarujala.com-presented by: शरद मिश्र
Updated Sat, 23 Sep 2017 05:31 PM IST
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ध्यानचंद
- फोटो : sportskeeda
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के पास जब एक बार गेंद आ जाती थी तो उनसे गेंद छुड़ाना असंभव होता था। विपक्षी खिलाड़ी उनसे गेंद हासिल नहीं कर पाते थे। ध्यानचंद की ऐसी हॉकी प्रतिभा को देखकर सभी दंग रह जाते थे। जब भी गेंद उनकी स्टिक पर आ जाती थी तो वह गोल पोस्ट में ही सीधे जाती थी।
नीदरलैंड में एक बार ध्यानचंद हॉकी खेल रहे थे। इस दौरान कुछ लोगों को आशंका हुई कि ध्यानचंद की हॉकी में चुंबक हो सकता है। लिहाजा आनन फानन में उनकी स्टिक को तुड़वा कर उसकी जांच की गई। लोगों को स्टिक में गोंद लगने का भी शक था। जांच में हालांकि लोगों की सारी आशंकाएं झूठी ही साबित हुई। ध्यानचंद की स्टिक में किसी प्रकार का चुंबक नहीं पाया गया।
पढ़ें:- स्मृति शेष: जानिए हॉकी के जादूगर कब कहलाने लगे ध्यानचंद
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ध्यानचंद को बचपन में हॉकी के प्रति कोई रुचि नहीं थी। दिल्ली में जब वे ब्राह्मण रेजीमेंट में सिपाही के तौर पर सेवारत थे तब मेजर तिवारी ने उन्हें हॉकी के लिए प्रेरित किया। कालांतर में ध्यानचंद हॉकी के पर्याय बन गए। हालांकि अंतिम दौर में ध्यानचंद को देश में काफी उपेक्षाओं का सामना करना पड़ा। या यूं कहें कि ध्यानचंद के भाग्य में शायद चमकती आभा नहीं थी। तभी तो वह आर्थिक तंगी से जूझते रहे। देश की सरकार हमेशा उनसे रूठी रही। यहां तक ध्यानचंद के नाम पर बने स्टेडियम भी आज खस्ता हाल में है। लखनऊ और झांसी में उनके नाम से स्टेडियम बने हैं। लेकिन उनके निर्माण के बाद वहां उचित रख रखाव की कोई बेहतर व्यवस्था नहीं है। यह स्टेडियम आज भी खस्ता हाल में हैं।
ध्यानचंद को भारत रत्न दिलाने के लिए हस्ताक्षर करें यहां- goo.gl/hYuwMF
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नीदरलैंड में एक बार ध्यानचंद हॉकी खेल रहे थे। इस दौरान कुछ लोगों को आशंका हुई कि ध्यानचंद की हॉकी में चुंबक हो सकता है। लिहाजा आनन फानन में उनकी स्टिक को तुड़वा कर उसकी जांच की गई। लोगों को स्टिक में गोंद लगने का भी शक था। जांच में हालांकि लोगों की सारी आशंकाएं झूठी ही साबित हुई। ध्यानचंद की स्टिक में किसी प्रकार का चुंबक नहीं पाया गया।
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ध्यानचंद को बचपन में हॉकी के प्रति कोई रुचि नहीं थी। दिल्ली में जब वे ब्राह्मण रेजीमेंट में सिपाही के तौर पर सेवारत थे तब मेजर तिवारी ने उन्हें हॉकी के लिए प्रेरित किया। कालांतर में ध्यानचंद हॉकी के पर्याय बन गए। हालांकि अंतिम दौर में ध्यानचंद को देश में काफी उपेक्षाओं का सामना करना पड़ा। या यूं कहें कि ध्यानचंद के भाग्य में शायद चमकती आभा नहीं थी। तभी तो वह आर्थिक तंगी से जूझते रहे। देश की सरकार हमेशा उनसे रूठी रही। यहां तक ध्यानचंद के नाम पर बने स्टेडियम भी आज खस्ता हाल में है। लखनऊ और झांसी में उनके नाम से स्टेडियम बने हैं। लेकिन उनके निर्माण के बाद वहां उचित रख रखाव की कोई बेहतर व्यवस्था नहीं है। यह स्टेडियम आज भी खस्ता हाल में हैं।
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