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टोक्यो ओलंपिक: गुरजंत सिंह की आंखों में खुशी के आंसू, बोले- पांच माह तक मैदान और कमरे के बीच ठहर गई थी जिंदगी 

Fri, 06 Aug 2021 07:57 AM IST
मुकेश कुमार झा हेमंत रस्तोगी, नई दिल्ली
हेमंत रस्तोगी, नई दिल्ली Published by: मुकेश कुमार झा Updated Fri, 06 Aug 2021 07:57 AM IST
सार

  • टोक्यो में तीन गोल करने वाले गुरजंत सिंह बोले लॉकडाउन के त्याग का फल टीम को मिला
  • खिलाड़ियो को कोरोना हुआ मन में डर था पर हिम्मत नहीं हारी

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Tokyo Olympics: Gurjant Singh says life had stopped between the field and the room for five months
गुरजंत सिंह - फोटो : ट्विटर

विस्तार

टोक्यो ओलंपिक में टीम इंडिया के लिए सिमरनजीत सिंह के साथ सर्वाधिक तीन फील्ड गोल दागने वाले अमृतसर के स्ट्राइकर गुरजंत सिंह की आंखों में खुशी के आंसू थामे नहीं थम रहे हैं। भावुक गुरजंत टोक्यो से अमर उजाला को बयां करते हैं कि आज पूरी टीम को उसके त्याग का फल मिल गया। ये उसी हॉकी टीम ने देश के लिए ओलंपिक में 41 साल बाद पदक जीता है जिसकी जिंदगी बंगलूरू साई सेंटर में पांच माह के लिए महज कमरे और हॉकी मैदान के बीच ठहर कर रह गई थी। एक के बाद एक टीम के खिलाड़ी कोरोना संक्रमित हो रहे थे। सभी के मन में डर भी था, लेकिन किसी ने हिम्मत नहीं हारी। शायद टीम को उसी के त्याग का फल मिला है।

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बंदिशों के बीच बना आपसी जुड़ाव टोक्यो में आया काम

गुरजंत के मुताबिक ऐसे कठिन समय में बंदिशों के बीच टीम जिस तरह साथ रही। उससे आपसी जुड़ाव और बढ़ गया। यह जुड़ाव टोक्यो में काम आया है। यही कारण था कि दूसरे मैच में ऑस्ट्रेलिया के हाथों 1-7 की करारी हार के बावजूद टीम विचलित नहीं हुई। गुरजंत खुलासा करते हैं कि इतनी बड़ी हार के बाद किसी भी टीम का आत्मविश्वास डगमगा सकता है, लेकिन हमारी पूरी टीम ने उस हार को मैदान पर छोडने का फैसला कर लिया। कोच ने जरूर मैच की कमियों को दूर कराया, लेकिन किसी ने भी इस मैच के बारे में न बात की और न किसी को जिम्मेदार ठहराया।

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ऑस्ट्रेलिया से मिली हार ने पैदा किया वापसी का जज्बा

गुरजंत यहां तक कहते हैं कि सच्चाई यह है कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मिली हार ने टीम को और मजबूत बना दिया। इस हार ने पूरी टीम को धरातल पर ला दिया। सभी को यह समझ में आ गया कि ओलंपिक आसान नहीं है और यहां पदक आसानी से नहीं मिलने वाला है। इस मजबूत मानसिक स्थिति ने ही वापसी का जज्बा पैदा कर टीम की ऐतिहासिक वापसी कराई। सेमीफाइनल में भी बेल्जियम के खिलाफ मिली 2-5 की हार को भी मैदान पर छोड़ दिया गया। टीम को मालूम था कि सेमीफाइनल की हार का मतलब यह नहीं है कि टूर्नामेंट से बाहर हो गए हैं। टीम के पास कांस्य जीतने का मौका था और इसे किसी भी कीमत पर टीम गंवाना नहीं चाहती थी। यही वजह थी कि टीम जर्मनी के खिलाफ 1-3 से पिछडने के बाद 5-3 की बढ़त ले पाई।

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यह पदक हॉकी की तस्वीर बदल देगा

गुरजंत को इस बात की खुशी है कि टीम के पदक जीतने के बाद देश में सिर्फ हॉकी की बात हो रही है। आज हॉकी के बारे में देश के 135 करोड़ लोगों में से अनगिनत ने देखा होगा। हॉकी को यही चाहिए।

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