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जोश, जुनून और दीवानगी की दुनिया फुटबॉल है!

Sun, 03 Jun 2018 07:49 PM IST
प्रकाश पुरोहित, वरिष्ठ पत्रकार, नई दिल्ली
प्रकाश पुरोहित, वरिष्ठ पत्रकार, नई दिल्ली Updated Sun, 03 Jun 2018 07:49 PM IST
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FIFA world cup 2018: world of sparkle, passion and craze is football
फीफा वर्ल्ड कप 2018

बस कुछ ही दिनों की तो बात है, फिर तो ऐसा लगने लगेगा जैसे पूरी दुनिया ही फुटबॉल में तब्दील हो गई हो। क्योंकि खेल के अलावा भी बहुत कुछ है फुटबॉल। यहां जोश है, जुनून है और दीवानगी है। विश्व कप में शामिल होना तो जैसे ख्वाब का सच हो जाना है। ऐसे न जाने कितने हजार दीवाने विश्व कप के दौरान आते हैं और बार-बार आने का ख्वाब देखते हैं।

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जील के रियो डि जेनेरो स्टेडियम में फुटबॉल विश्व कप का फाइनल मैच खेला जा रहा था। एक तरफ ब्राजील, दूसरी ओर उरुग्वे। ब्राजील का पलड़ा भारी समझा जा रहा था। ब्राजील में जश्न की तैयारियां शुरू हो गई थीं कि बस पंद्रह मिनट ही तो बचे हैं। कोई भी टीम एक भी गोल नहीं कर सकी थी। ब्राजील ने जैसे तय कर लिया था कि गोल नहीं होने देना है। इस चक्कर में उसकी टीम ने हमले भी कम कर दिए। बस, यहीं चूक हो गई। हाफ टाइम तक ब्राजील और उरुग्वे की टीम एक-एक गोल से बराबरी पर थीं और मैच खत्म होने के ठीक ग्यारह मिनट पहले उरुग्वे ने गोल कर दिया। सन्नाटा छा गया और ब्राजील 1-2 से मैच हार गया। यह 1950 के विश्व कप की बात है। 
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उस समय उसी स्टेडियम में 19 साल का एक युवक भी मैच देख रहा था। जब मैच खत्म होने में सिर्फ दो मिनट बचे थे, युवक उठ खड़ा हुआ। उसके ठीक पास बैठी एक लड़की भी उठ गई। लड़का निराश होकर जैसे ही चलने लगा... लड़की ने उसका हाथ पकड़ा और वह भी साथ चलती हुई स्टेडियम से बाहर आ गई। हाथ पकड़े-पकड़े वे पूरी रात शहर की सड़कों पर भटकते रहे। आपस में कोई बात भी नहीं की दोनों ने, बल्कि शायद एक-दूसरे की तरफ देखा भी नहीं। दोनों एक-दूसरे को न जानते थे न पहचानते थे।
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यह भी नहीं मालूम था कि नाम क्या है? सुबह होने को आई, लड़की ने इशारे से कहा, 'मेरा घर आ गया।' लड़के ने हाथ छोड़ दिया और लड़की घर में चली गई, यह कहते हुए कि जल्दी मिलेंगे। लड़की ने देखा, लड़का वहीं खड़ा रहा। वह कहीं नहीं गया। उससे मिलने का इंतजार कर रहा था, उसके घर के आगे। बस, उस दिन उन दोनों ने फुटबॉल स्टेडियम में जो हाथ पकड़ा था, आज 68 साल बाद भी थामे हुए हैं।

गेब्रियल और सिल्वा की ऐसी दीवानगी देखी नहीं...

FIFA world cup 2018: world of sparkle, passion and craze is football
गेब्रियल सिल्वा

ये फुटबॉल से प्रेम की कहानी गेब्रियल और सिल्वा की है, जिन्हें 2014 में उसी स्टेडियम में, उसी गैलरी में बुलाकर सम्मानित किया गया था, फाइनल मुकाबले से ठीक पहले। पूरा स्टेडियम पैरों पर खड़ा था और तालियां बजा रहा था। इसलिए कहा गया है कि फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं है, वह न जाने कितनी कहानियां और घटनाएं अपने में समेटे  हुए है। खेल के अलावा भी बहुत कुछ है फुटबॉल, जिसकी वजह से दुनिया इसकी दीवानी है।

विश्व कप में शामिल होना, तो जैसे ख्वाब का सच हो जाना है। ऐसे न जाने कितने हजारों दीवाने वहां आते हैं, जो अपनी चार साल की सारी कमाई इस मौके पर फूंककर चले जाते हैं। पश्चिम बंगाल, कोलकाता के पन्नालाल चटर्जी (81) और उनकी पत्नी चैताली (78), जो पेंशनयाफ्ता हैं और अब तक नौ विश्व कप देख चुके हैं। पेंशन से ही पैसे बचाते हैं और चार साल की कमाई एक माह में 'फुटबॉल' पर फूंक देते हैं। एक और दीवाना है केरल का, जो चाय की गुमटी चलाता है।

चार साल सिर्फ इसलिए कमाता है कि फुटबॉल विश्व कप देख सके! ऐसे ही एक और दीवाने हैं नागपुर के उद्योगपति ओमप्रकाश मूंदड़ा, जो घर फूंक तमाशा देखते हैं और 1980 से आज तक के सभी फुटबॉल विश्व कप के गवाह रहे हैं। ये वहां वॉलंटियर बन कर जाते हैं। पत्नी प्रेम भी उनके साथ हर बार साथ रहती हैं। दुनियाभर में ऐसा दूसरा खेल नहीं है (जी हां, ओलिंपिक भी नहीं), जहां दीवाने इस तादाद में पहुंचते हैं और लोगों की यही दीवानगी फीफा (फेडरेशन इंटरनेशनल फुटबॉल एसोसिएशन) को समानांतर सरकार का रुतबा देती है। यहां आने वाला सिर्फ अपनी भाषा जानता है और लगभग गूंगा हो जाता है, मगर फुटबॉल ही उन्हें जुबान देती है। ऐसी दीवानगी देखी नहीं...गेब्रियल और सिल्वा फुटबॉल की वजह से कभी मिले थे, आज भी दोनों का दिल इस खेल में बसता है।
  
जिस तरह हमारे यहां कुंभ में भक्ति और श्रद्धा नजर आती है, वैसा ही भाव फुटबॉल के विश्व कप में भी नजर आता है। चीख, हताशा और विजयी हुंकार की कोई भाषा नहीं होती है। फुटबॉल-कुंभ के दीवाने सही मायने में घर फूंक तमाशा देखते हैं। इतने महंगे टिकट होते हैं, फिर भी अपनी पसंद या देश की टीम खेल रही होती है, तो ये जेब उलटने को भी तैयार रहते हैं। अभी-अभी खबर मिली है कि विश्व कप के फाइनल मैच की टिकटें तीन लाख रुपये तक में बिक गईं। भारत से ही करीब दस हजार लोग जा रहे हैं, जबकि भारतीय टीम का वहां नामो-निशान भी नहीं है।

पूरी दुनिया से फुटबॉल के दीवाने देते हैं हाजिरी

FIFA world cup 2018: world of sparkle, passion and craze is football
फीफा वर्ल्ड कप 2018

कुल जमा 32 देश ही खेलते हैं विश्व कप में, लेकिन पूरी दुनिया से फुटबॉल के दीवाने वहां हाजिरी देने आ जाते हैं। अनुमान है कि दस लाख लोग इस बार के विश्व कप को देखने पहुंचेंगे। कुछ निपट 'अकेलेराम' की तरह आते हैं और बाकी टीम बनाकर साथ-साथ चलते हैं, मैच देखते हैं। फैशन में दम नहीं होता है कि किसी को इतना दीवाना बना दे कि हर हाल में फुटबॉल का एक मैच देखने के लिए वह सब कुछ गंवाकर घर से निकल पड़े। यह असर तो पैशन का ही है कि नई पीढ़ी भी पूरे चार साल इसलिए कमाती है कि एक माह में फुटबॉल के नाम पर उसे फूंक दे। तमाम दिक्कतें भी पेश आती हैं, मगर इनके हौसले कभी पस्त नहीं होते। ठोकरों में रहने वाली फुटबॉल इस एक महीने में 'ताज’ बन जाती है, जिसके लिए फुटबॉल के दीवाने दर-दर की ठोकरें खाने से भी बाज नहीं आते हैं। 

दक्षिण अफ्रीका में कैनी और उसकी मां से मुलाकात हुई थी, जो अमेरिका से आई थीं। पिता को छुट्टी नहीं मिली, इसलिए मां-बेटी ही चली आईं फुटबॉल देखने। संतोखी हैं तो जापान के, मगर अमेरिका में काम करते हैं। उनकी एक जेब में जापान और दूसरी जेब में अमेरिकी झंडा रहता है। एक बार उन्होंने कहा था, 'हमारे तो दो देश हैं। बस, दुआ यही करते हैं कि इनके बीच कहीं टक्कर न हो जाए, वरना मजबूरन जापान का ही झंडा निकालना पड़ेगा।'

फुटबॉल के दीवाने कोई सुविधाजनक जिंदगी नहीं जीते हैं। बैक-पैकर्स में ठहरते हैं, पिज्जा, नूडल्स, बर्गर खाते हैं और ज्यादातर समय पैदल चलते हैं। कपड़ों की ये जरा भी परवाह नहीं करते हैं। वैसे तो हर उम्र के दीवाने यहां आते हैं, मगर युवा ज्यादा होते हैं। ये खेल के सारे आंकड़े और बारीकियां समझते हैं। जब ब्राजील ने साउथ अफ्रीका पर पहला गोल दागा था, तो देखने वाले अचंभे में थे कि क्या कमाल का गोल किया है, पर पास बैठे स्पेन के दीवाने ने धीरे से कहा था, 'ये फ्लूक है।' बाद में कमेंटेटरों ने भी इस बात को माना कि इस तरह का गोल किया नहीं जाता, हो जाता है। साथ ही वहां, बेचा जाने वाला सामान किसी दुकान या शोरूम में आपको देखे से भी नहीं मिलेगा, मगर गलियों में चोरी-छिपे बेचने और खरीदने वाले नजर आ ही जाते हैं। कई तो अपने साथ ले जाने के लिए यह सस्ता सामान खरीद लेते हैं। खुद नहीं पहनते कि कहीं पकड़े गए, तो जेल कौन जाएगा।

ओलंपिक तो एक शहर में ही होता है, मगर फुटबॉल के लिए तो पूरा देश ही फुटबॉल हो जाता है। ऐसे में कोई किसी शहर में आज आता है, तो रात को ही दूसरे शहर के लिए चल देता है। जहां-जहां उनकी टीम खेल रही होती है, दीवानों की यह टोली वहां पहुंच जाती है। कुछ देश खासकर हॉलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जापान, स्पेन, ब्राजील के लोग तो गाना-बजाना करते हुए स्टेडियम पहुंचते हैं। उनके साथ अपना बैंड होता है और उस पर बजने वाली धुन ही उनके आने का पता बता देती है।

कुछ कायदे, कुछ नियम

FIFA world cup 2018: world of sparkle, passion and craze is football
फीफा अंडर-17 विश्वकप - फोटो : FIFA

ठसक के साथ आयोजन करना फीफा को ही आता है कि उस देश की सरकार के मंत्री भी बगैर टिकट स्टेडियम में नहीं आ सकते और मुफ्त पास की बात भूल ही जाइए। सख्ती का तो ये आलम रहता है कि स्टेडियम में यदि आप किसी उत्पाद का परचा या बैनर ही दिखा दें, तो जेल की हवा खानी पड़ सकती है। साउथ अफ्रीका में, तो ऑरेंज ब्रिगेड को रातों-रात इसलिए रवाना कर दिया गया था कि वह विश्व कप की प्रायोजक कंपनी की विरोधी थी और अपना प्रचार कर रही थी।

यूं समझ सकते हैं कि फुटबॉल विश्व कप के दौरान पूरे देश की कमान फीफा के हाथ में आ जाती है और मेजबान देश की सरकार सिर्फ कठपुतली बनकर रह जाती है। देशों से आए राष्ट्र प्रमुखों के हवाई जहाज को रातभर भी ठहरने की इजाजत नहीं मिलती है। पूरे देश में फीफा का तय सामान ही बिकता है, जो कि यकीनन बहुत महंगा होता है। नकली टी-शर्ट, टोपी, स्कार्फ बनाने वालों की तो खैर नहीं, पहनने वालों को भी हथकड़ी पहनने के लिए तैयार रहना पड़ता है।
 
फीफा की धरती, फीफा का आसमान
 विश्व कप में फीफा की अपनी सत्ता होती है, जो उस देश की सरकार के समानांतर चलती है। फीफा के काम में मदद करने के अलावा वहां की सरकार के हाथ में कुछ नहीं होता है। यहां तक कि फीफा के अपने न्यायाधीश होते हैं, जो हाथों हाथ फैसले कर देते हैं, जिसकी सुनवाई फिर किसी कोर्ट में नहीं होती। सबसे ज्यादा सख्ती टिकटों पर होती है। यहां तक कि यदि आपको मैच नहीं देखना है, तो आप अपना टिकट न तो किसी को बेच सकते हैं, न ही दे सकते हैं। फीफा की टिकट खिड़की पर ही जाकर टिकट वापस करना होता है। 

फीफा के नियम-कायदों के हिसाब से आप सड़कों पर टिकट खरीद-बेच नहीं सकते हैं। इसकी भी काट फुटबॉल के कालाबाजारियों ने ढूंढ निकाली है। जैसे ही हवाई जहाज इस शहर से उस शहर के लिए जमीन से ऊपर उडऩे लगता है, ये ब्लैक-मार्केटियर हाथ में मैच के टिकट लेकर विमान के अंदर उसी तरह आवाज लगाकर बेचने लगते हैं, जैसे हमारे यहां रेलों में साबुन-कंघे बेचे जाते हैं। फीफा का नियम जमीन पर लागू है, इसलिए आसमान में छूट का फायदा ये लोग उठा लेते हैं। अब हर विमान में फीफा की पुलिस तो बैठने से रही। बता दें कि 2018 फीफा विश्व कप फुटबॉल का नाम एडिडास टेलस्टार18 है। 1970 से एडिडास कंपनी फीफा विश्व कप को फुटबॉल मुहैया कराती आ रही है। 

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