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Amar Ujala Samvad: शमशेर ने किया बड़ा खुलासा, बताया ओलंपिक सेमीफाइनल में आखिरी पांच सेकेंड में क्या गलती हुई
Mon, 02 Sep 2024 05:02 PM IST
Mayank Tripathi
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Mayank Tripathi
Updated Mon, 02 Sep 2024 05:02 PM IST
सार
Amar Ujala Samvad Gurugram : इस कार्यक्रम में भारतीय हॉकी टीम के फॉरवर्ड शमशेर सिंह ने भी शिरकत की। इस दौरान उन्होंने हॉकी से जुड़ी दिलचस्प घटनाओं पर बातचीत की। शमशेर टोक्यो ओलंपिक और फिर पेरिस ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा रह चुके हैं।
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शमशेर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
साइबर सिटी गुरुग्राम में सोमवार को होने वाले अमर उजाला के वैचारिक संवाद कार्यक्रम में देश की जानी मानी शख्सियतों, नीति नियंताओं, विचारकों और विशेषज्ञों के विचार जानने और उनसे रूबरू होने का मौका मिल रहा है। इस कार्यक्रम में खेल और फिल्म जगत की हस्तियों से लेकर राजनीति के पुरोधा जुट रहे हैं। इस कार्यक्रम में भारतीय हॉकी टीम के फॉरवर्ड शमशेर सिंह ने भी शिरकत की। इस दौरान उन्होंने हॉकी से जुड़ी कुछ दिलचस्प घटनाओं पर बातचीत की। शमशेर टोक्यो ओलंपिक और फिर पेरिस ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा रह चुके हैं।
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शमशेर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
यहां पढ़िए शमशेर सिंह से जुड़ी बातचीत के कुछ अंश...
सवाल: क्या फिजिक्स और गणित के नियम हॉकी के टर्फ पर काम आते हैं?
जवाब: जी बिल्कुल। जैसे स्पोर्ट्स में भी स्ट्रैटजी के हिसाब से चलना पड़ता है। सामने वाली टीम कैसी कर रही है। उनके कौन से खिलाड़ी कहां खेल रहे हैं। स्पोर्ट्स में भी स्ट्रैटजी का योगदान रहता ही है। फिजिक्स और मैथ्स लाइफ में योगदान देते ही रहते हैं।
सवाल: ओलंपिक सेमीफाइनल में आखिरी पांच सेकंड में खेल पलट गया। उसकी कसक आज भी है। कसक इसलिए भी क्योंकि आपके पास मौका था। क्या था वो पल और आप उन पांच सेकंड को कैसे याद रखते हैं?
जवाब: जैसे आप सभी को दुख होता है उस शॉट पर, लेकिन सबसे ज्यादा एक खिलाड़ी ही महसूस कर सकता है जब वह शॉट नहीं लगा। वो जो आखिरी तीन या चार सेकंड थे और बहुत कुछ दिमाग में चल रहा होता है, लेकिन ये है कि काफी दुख हुआ कि जो हमने मेडल का कलर चेंज करने की बात की थी और हम डिजर्व भी करते थे कि हम फाइनल खेलें क्योंकि बहुत अच्छा प्रदर्शन था हमारा पूरे टूर्नामेंट में, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। उसके बाद पूरी टीम हम इकट्ठे हुए और बात की कि जो हमें सेमीफाइनल में हार मिली है, उसको भूलकर हम ब्रॉन्ज मेडल जीतकर ही दम लेंगे। खाली हाथ नहीं जाना है हमें। जो गलतियां हमने सेमीफाइनल में की, वो गलती नहीं करेंगे और कांस्य पदक लेकर ही घर जाएंगे।
सवाल: क्या पढ़ाई का दबाव आप पर भी था? आपने ये फैसला कैसे किया कि पढ़ाई चुनूं या हॉकी चुनूं?
जवाब: इसमें परिवार का बहुत बड़ा रोल रहता है। पढ़ाई में आपको विकल्प मिल जाते हैं, लेकिन स्पोर्ट्स में आप एलीट लेवल पर जाओगे और कुछ हासिल करोगे तभी आपको आगे मौके मिलेंगे। तो एक दबाव रहता है, लेकिन यही है कि परिवार को अपने बच्चों का समर्थन करना चाहिए। जो भी वो करना चाहता है। बच्चों को भी जिस फील्ड में वो हैं, उसमें 100 प्रतिशत देना चाहिए। पूरा अपना फोकस देना चाहिए। मुझे लगता है कि कोई भी काम नामुमकिन नहीं है अगर आप ठान लेते हो तो। परिवार को इसमें जरूर समर्थन करना चाहिए, जिस भी फील्ड में बच्चा जाना चाहता है, उसमें उन्हें मदद करनी चाहिए।
सवाल: युवाओं से क्या कहना चाहेंगे?
जवाब: एक बात की मुझे खुशी होती है कि जिस गांव से मैं आया हूं, पंजाब के अटारी से, वह पाकिस्तान के बॉर्डर से बस दो किलोमीटर की दूरी पर है। तो मैंने भी वहां से शुरुआत की। जब हमने टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीता, उसके बाद से हमारी हॉकी ग्राउंड है जो वहां आसपास से इतने सारे बच्चे 150 प्लस बच्चे खेल रहे हैं वहां पर। हॉकी का इतना ज्यादा क्रेज हो गया वहां पर। जो वो खेल रहे हैं तो वो नशे की तरफ देख भी नहीं सकते क्योंकि जब आप स्पोर्ट्स करते हो तो आपकी एनर्जी सही जगह पर लगती है। तो ड्रग्स के तरफ आपका ध्यान जा ही नहीं सकता। मैं पंजाब की बात कर रहा हूं। पंजाब अब धीरे धीरे स्पोर्ट्स की तरफ फिर से बढ़ने लगा है। स्पोर्ट्स ही एक ऐसा फील्ड है जिसमें आप आकर ड्रग्स को तो भूल ही जाओगे। धीरे-धीरे ग्राउंड्स बन रहे हैं, उसमें बच्चे खेलेंगे और पढ़ने वाले बच्चे पढ़ाई पर ध्यान देंगे तो पंजाब अब आगे बढ़ रहा है काफी।
सवाल: कोच की कितनी बड़ी भूमिका होती है स्ट्रैटजी बनाने में क्योंकि खेलता तो खिलाड़ी है अंत में?
जवाब: कोच की बहुत ज्यादा भूमिका रहती है चाहे वह कोई भी खेल हो। जैसे खिलाड़ियों को चुनने की। कोर ग्रुप में हमारे 33 खिलाड़ी होते हैं और उनमें से 16 खिलाड़ियों को चुनना होता है। कोच की बहुत भूमिका होती है क्योंकि कौन सा खिलाड़ी कैसा खेल रहा है वह कोच को ही पता होता है। शायद हमें कभी लगता है कि हमें सेलेक्ट नहीं किया गया, लेकिन टीम के लिए वो अच्छा ही होता है क्योंकि कोच का अलग नजरिया होता है। टोक्यो ओलंपिक में हमारे कोच ग्राहम रीड थे, जबकि पेरिस ओलंपिक में क्रेग फुल्टन हमारे कोच थे तो वो भी स्ट्रैटजी बनाने में माहिर हैं। हम तो खेलते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे से वही सबकुछ देखते हैं। जर्मनी के खिलाफ हार के बाद फुल्टन ने हमें बहुत प्रोत्साहित किया। बिहाइंड द सीन कोचिंग स्टाफ का बहुत अहम रोल होता है कि आपको किस स्ट्रैटजी से आपको नेक्स्ट मैच खेलना है और कौन सा खिलाड़ी कहां खेलेगा, तो कोच इसमें बहुत अहम किरदार निभाता है।
सवाल: क्या फिजिक्स और गणित के नियम हॉकी के टर्फ पर काम आते हैं?
जवाब: जी बिल्कुल। जैसे स्पोर्ट्स में भी स्ट्रैटजी के हिसाब से चलना पड़ता है। सामने वाली टीम कैसी कर रही है। उनके कौन से खिलाड़ी कहां खेल रहे हैं। स्पोर्ट्स में भी स्ट्रैटजी का योगदान रहता ही है। फिजिक्स और मैथ्स लाइफ में योगदान देते ही रहते हैं।
सवाल: ओलंपिक सेमीफाइनल में आखिरी पांच सेकंड में खेल पलट गया। उसकी कसक आज भी है। कसक इसलिए भी क्योंकि आपके पास मौका था। क्या था वो पल और आप उन पांच सेकंड को कैसे याद रखते हैं?
जवाब: जैसे आप सभी को दुख होता है उस शॉट पर, लेकिन सबसे ज्यादा एक खिलाड़ी ही महसूस कर सकता है जब वह शॉट नहीं लगा। वो जो आखिरी तीन या चार सेकंड थे और बहुत कुछ दिमाग में चल रहा होता है, लेकिन ये है कि काफी दुख हुआ कि जो हमने मेडल का कलर चेंज करने की बात की थी और हम डिजर्व भी करते थे कि हम फाइनल खेलें क्योंकि बहुत अच्छा प्रदर्शन था हमारा पूरे टूर्नामेंट में, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। उसके बाद पूरी टीम हम इकट्ठे हुए और बात की कि जो हमें सेमीफाइनल में हार मिली है, उसको भूलकर हम ब्रॉन्ज मेडल जीतकर ही दम लेंगे। खाली हाथ नहीं जाना है हमें। जो गलतियां हमने सेमीफाइनल में की, वो गलती नहीं करेंगे और कांस्य पदक लेकर ही घर जाएंगे।
सवाल: क्या पढ़ाई का दबाव आप पर भी था? आपने ये फैसला कैसे किया कि पढ़ाई चुनूं या हॉकी चुनूं?
जवाब: इसमें परिवार का बहुत बड़ा रोल रहता है। पढ़ाई में आपको विकल्प मिल जाते हैं, लेकिन स्पोर्ट्स में आप एलीट लेवल पर जाओगे और कुछ हासिल करोगे तभी आपको आगे मौके मिलेंगे। तो एक दबाव रहता है, लेकिन यही है कि परिवार को अपने बच्चों का समर्थन करना चाहिए। जो भी वो करना चाहता है। बच्चों को भी जिस फील्ड में वो हैं, उसमें 100 प्रतिशत देना चाहिए। पूरा अपना फोकस देना चाहिए। मुझे लगता है कि कोई भी काम नामुमकिन नहीं है अगर आप ठान लेते हो तो। परिवार को इसमें जरूर समर्थन करना चाहिए, जिस भी फील्ड में बच्चा जाना चाहता है, उसमें उन्हें मदद करनी चाहिए।
सवाल: युवाओं से क्या कहना चाहेंगे?
जवाब: एक बात की मुझे खुशी होती है कि जिस गांव से मैं आया हूं, पंजाब के अटारी से, वह पाकिस्तान के बॉर्डर से बस दो किलोमीटर की दूरी पर है। तो मैंने भी वहां से शुरुआत की। जब हमने टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीता, उसके बाद से हमारी हॉकी ग्राउंड है जो वहां आसपास से इतने सारे बच्चे 150 प्लस बच्चे खेल रहे हैं वहां पर। हॉकी का इतना ज्यादा क्रेज हो गया वहां पर। जो वो खेल रहे हैं तो वो नशे की तरफ देख भी नहीं सकते क्योंकि जब आप स्पोर्ट्स करते हो तो आपकी एनर्जी सही जगह पर लगती है। तो ड्रग्स के तरफ आपका ध्यान जा ही नहीं सकता। मैं पंजाब की बात कर रहा हूं। पंजाब अब धीरे धीरे स्पोर्ट्स की तरफ फिर से बढ़ने लगा है। स्पोर्ट्स ही एक ऐसा फील्ड है जिसमें आप आकर ड्रग्स को तो भूल ही जाओगे। धीरे-धीरे ग्राउंड्स बन रहे हैं, उसमें बच्चे खेलेंगे और पढ़ने वाले बच्चे पढ़ाई पर ध्यान देंगे तो पंजाब अब आगे बढ़ रहा है काफी।
सवाल: कोच की कितनी बड़ी भूमिका होती है स्ट्रैटजी बनाने में क्योंकि खेलता तो खिलाड़ी है अंत में?
जवाब: कोच की बहुत ज्यादा भूमिका रहती है चाहे वह कोई भी खेल हो। जैसे खिलाड़ियों को चुनने की। कोर ग्रुप में हमारे 33 खिलाड़ी होते हैं और उनमें से 16 खिलाड़ियों को चुनना होता है। कोच की बहुत भूमिका होती है क्योंकि कौन सा खिलाड़ी कैसा खेल रहा है वह कोच को ही पता होता है। शायद हमें कभी लगता है कि हमें सेलेक्ट नहीं किया गया, लेकिन टीम के लिए वो अच्छा ही होता है क्योंकि कोच का अलग नजरिया होता है। टोक्यो ओलंपिक में हमारे कोच ग्राहम रीड थे, जबकि पेरिस ओलंपिक में क्रेग फुल्टन हमारे कोच थे तो वो भी स्ट्रैटजी बनाने में माहिर हैं। हम तो खेलते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे से वही सबकुछ देखते हैं। जर्मनी के खिलाफ हार के बाद फुल्टन ने हमें बहुत प्रोत्साहित किया। बिहाइंड द सीन कोचिंग स्टाफ का बहुत अहम रोल होता है कि आपको किस स्ट्रैटजी से आपको नेक्स्ट मैच खेलना है और कौन सा खिलाड़ी कहां खेलेगा, तो कोच इसमें बहुत अहम किरदार निभाता है।
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शमशेर सिंह
- फोटो : shamsher_31
हालांकि, शमशेर का हॉकी की राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने का सफर आसान नहीं रहा है। उन्हें काफी संघर्ष और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। कई लोगों के लिए खेल सिर्फ पहचान बनाने का जरिया नहीं होता, बल्कि देश के प्रति जुनून और जिंदगी जीने का जरिया होता है। भारत में जहां क्रिकेट में पैसा, ग्लैमर, पहचान और अच्छे भविष्य की गारंटी है, उस स्थिति में हॉकी या किसी दूसरे खेल के प्रति द्वेष होना आम बात है। इन खेलों से प्यार करना और उसे अपनी जिंदगी बना लेना आसान नहीं होता, लेकिन शमशेर सिंह ने न सिर्फ हॉकी से प्यार किया, बल्कि देश को ऊंचाइयों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने हॉकी को चुना और सामने आई हर कठिनाइयों का डटकर सामना किया।
शमशेर सिंह
- फोटो : shamsher_31
शमशेर सिंह भारतीय टीम में फॉरवर्ड पोजिशन पर खेलते हैं। शमशेर का जन्म 29 जुलाई 1997 को अमृतसर जिले के अटारी के एक गांव में हुआ था। शमशेर के पिता हरदेव सिंह एक किसान थे और मां हाउसवाइफ। अटारी गांव भारत-पाकिस्तान के अमृतसर बॉर्डर पर है। शुरू में हॉकी खेलना शमशेर का बस शौक था। धीरे-धीरे उनका इस खेल के प्रति लगाव बढ़ता गया। 11 साल की उम्र में वह जालंधर आए जहां उन्हें सुरजीत सिंह अकेडमी में खेलने का मौका मिला। वब वहां छह साल तक प्रैक्टिस और ट्रेनिंग करते रहे। शमशेर चाहते थे कि वह किसी तरह नेशनल खेलें ताकी सरकारी नौकरी मिल जाए और परिवार की आर्थिक मदद कर सकें।
शमशेर सिंह
- फोटो : shamsher_31
शमशेर की मां बताती हैं कि शमशेर उन्हें कई बार तड़के सुबह तीन बजे उठाने को कहते थे। हालांकि, कभी कभी बेटे को चैन से सोता देख मां उन्हें उठाती नहीं थीं। जब ऐसा होता था तो शमशेर दुखी हो जाते थे। उनका खेल और अपने सपने की प्रति इतना दृढ़ संकल्प देख उनकी मां हैरान रह गई थीं। शमशेर पढ़ाई में भी अच्छे थे। साल 2016 में शमशेर ने बतौर मिडफील्डर जूनियर अंतरराष्ट्रीय टीम के लिए डेब्यू किया। जूनियर टीम के साथ उन्होंने तीन दौरे किए। उन्होंने 2019 पुरुष रेडी स्टेडी टोक्यो हॉकी टूर्नामेंट में राष्ट्रीय सीनियर टीम के लिए अंतरराष्ट्रीय डेब्यू किया। शमशेर को नहीं लगता था कि वह कभी टीम इंडिया में शामिल हो पाएंगे, लेकिन उनकी मेहनत ने यह भी मुमकिन कर दिया। अपने डेब्यू के बाद शमशेर ने कहा, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं इस स्तर तक पहुंच पाऊंगा। मैंने कई वर्षों तक बहुत मेहनत की। हमें बचपन में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। मेरे परिवार ने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा। मैं जो हूं उन्हीं की वजह से हूं।' शमशेर 2019 से लगातार भारतीय टीम का हिस्सा रहे हैं। वह दो ओलंपिक कांस्य पदक के अलावा 2023 हांगझोऊ एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम का भी हिस्सा रहे थे।