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सीख: नजरिया बदलने पर आसपास की दुनिया भी बदल जाती है
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
Updated Mon, 07 May 2018 02:58 PM IST
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स्नेहा एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती थी। लेकिन वह जो भी काम करती, उसकी मैनेजर को हमेशा उसमें कुछ-न-कुछ आपत्ति रहती थी। पिछले दो साल से स्नेहा का प्रमोशन भी उसकी मैनेजर ने रोक रखा था। एक दिन उसने अपनी मां को सारी बातें बताईं और कहा, मेरा मन करता है कि मैं अपनी मैनेजर को जहर दे दूं। स्नेहा की मां बोलीं, ठीक है, अगर तुम यही करना चाहती हो, तो मैं तुम्हारी मदद करूंगी। लेकिन तुम्हे मेरी सारी बात माननी होगी। स्नेहा बोली, मुझे आप पर पूरा विश्वास है। आप जो भी कहेंगी, मैं आंख बंद कर उसका पालन करूंगी।
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स्नेहा की मां उठीं और कुछ जड़ी-बूटी ले आईं और बोलीं, यह खास किस्म का जहर है। इसे रोज एक पत्ती अपनी मैनेजर की चाय में मिला देना। थोड़ा धीरे काम करेगा, लेकिन है बहुत असरदार। ध्यान रहे, तुम्हारा स्वभाव बहुत कोमल और प्रेम भरा रहना चाहिए। स्नेहा समझ गई और अपने ऑफिस वापस लौट गई। अगले दिन से रोज वह एक पत्ती अपने मैनेजर की चाय में मिलाने लगी। मैनेजर जो कुछ भी कहती, वह चुपचाप सुन लेती। धीरे-धीरे कई दिन बीत गए। स्नेहा ने अनुभव किया कि उसका अपनी मैनेजर के प्रति गुस्सा एकदम शांत हो गया था।
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स्नेहा के बदले स्वभाव से मैनेजर का गुस्सा भी शांत हो गया। एक दिन मैनेजर ने स्नेहा से कहा, आज अगर मेरी बेटी होती, तो वह तुम्हारी ही तरह होती। कुछ ही दिनों में दोनों में मां-बेटी जैसा प्रेम पनपने लगा। अब मैनेजर स्नेहा से पूछा बगैर कोई निर्णय नहीं लेती थीं। स्नेहा को एक साथ दो प्रमोशन भी मिले। स्नेहा अपनी मां के पास पहुंची और कहने लगी कि अब इस जहर का असर किस तरह उतारा जाए, क्योंकि अब मैं मैनेजर को मरते हुए नहीं देख सकती। स्नेहा की मां ने हंसते हुए कहा, बेटा जहर उस मैनेजर में नहीं, तुम्हारे मन में था। वे पत्तियां तो मैंने तुम्हारी मैनेजर की सेहत बेहतर करने के लिए दी थीं। जहर का इलाज तो कब का हो गया।
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