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क्या आपने खुशी का वास्तविक मतलब समझा है?

स्वामी निरंजन योगी Updated Sat, 21 Dec 2013 05:03 PM IST
what is happiness
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व्यक्ति अपने हर उद्देश्य में सुख और प्रसन्नता की ही खोज करता है। हर किसी के मन में सुख की कामना होती है। पर खुशी या प्रसन्नता को परिभाषित नहीं किया जा सकता।



ज्यादा से ज्यादा यही कहा जा सकता है कि वह तमाम नकारात्मक संवेदनाओं का अभाव है। जीवन में आनंद और प्रसन्नता का मार्ग दिखानेवाले उपदेशों में अधिक अखरने वाली बात यह है कि वे आनंद की प्राप्ति को ही जीवन का ध्येय मानने पर विवश-सी करती हैं। हमारे धर्मों और आध्यात्मिक परम्पराओं ने हमारे मन में आनंद की ऐसी छवि गढ़ दी है जिससे हम नहीं निकल पा रहे हैं।


साधना या पद्धति का पालन करने वालों में अधिकांश का यह मानना है, ध्येय में सफल होने पर उन्हें आनंददायक पारलौकिक अनुभूतियों की प्राप्ति होगी। स्वर्ग की प्राप्ति, ध्यान, समाधि, आत्मज्ञान, निर्वाण आदि को हमने परमानंद से सम्बद्ध कर दिया है। जीवन के हर संघर्ष और दु:ख लिए सुखमय जीवन, ईश्वर-दर्शन की कामना, अनात्म की भावना को उत्तरदायी मानता हूं।

वास्तविकता में घट रही घटनाओं को साक्षी भाव से देखने से हमारे मानस और काया को शांति मिलती है, भले ही यह श्रमसाध्य प्रीतिकर हो। इसमें द्वैत नहीं होता। इसे आनंद भी कह सकते हैं पर इसमें कोई हिलोर नहीं है। किसी घोर वेदना से गुजरनेवाले व्यक्ति के भीतर भी ऐसी ही भावना उपज सकती है क्योंकि उसके सामने कोई विकल्प नहीं होते।

आपने ऐसे व्यक्ति के बारे में पढ़ा होगा, जो बड़े-से-बड़े दर्द को भी अपार शांति से झेल गया होगा। यदि आप उसे निर्मोही कहेंगे तो मैं उसे अनासक्त कहूंगा। उस व्यक्ति का वर्णन करने के लिए ये दो भिन्न दृष्टिकोण हैं जिसमें आप किसी एक में अधिक सकारात्मकता देख सकते हैं। जीवन अनुभवों की सतत धारा है।

आप इसमें बहकर डूब भी सकते हैं और इसके विपरीत तैरने की जद्दोजहद में स्वयं को नष्ट भी कर सकते हैं। दोनों ही स्थितियों में आपका मिटना तय है। यदि आप इसे केवल बहते हुए देखेंगे तो सुरक्षित रहेंगे। तब आप स्थिर रहेंगे, शांत रहेंगे, और अन्त:प्रज्ञ बनेंगे। उस दशा में आपके भीतर मौलिक बोध उपजेगा। आवश्यकता सिर्फ दर्शक बनने की है, जिसे न तो नाटक का निर्देशन करना है और न ही उसमें कूद पड़ना है। आप जागृत अवस्था में जो कुछ भी करेंगे वही आपका ध्यान बन जाएगा।

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