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नए साल का जश्न मनाते समय जरूर याद रखें ये सबक
Tue, 01 Jan 2019 10:08 PM IST
Madhukar Mishra
डॉ. प्रणव पांड्या
डॉ. प्रणव पांड्या
Published by: Madhukar Mishra
Updated Tue, 01 Jan 2019 10:08 PM IST
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डॉ. प्रणव पंड्या
- फोटो : AmarUjala
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वर्ष का बदलना समय के उल्लास का सूचक है और उसका सही उपयोग कर लेना उससे भी सुखद पहलू है। नववर्ष 2019 दस्तक दे रहा है अनंत संभावनाओं के साथ। विश्व समुदाय का बहुत बड़ा वर्ग उसके स्वागत को तत्पर है। बहुत बड़ा इसलिए क्योंकि अनेक वर्ग ऐसे भी हैं, जो इन तिथियों को व्यवहार में तो अपनाते हैं, पर अंग्रेजी महीने के इस नवागमन को पाश्चात्य परम्परा का प्रतीक मानते हैं। वर्षों बीतने के बावजूद जेहन से अंगीकार आज तक नहीं कर पाये। इसके पीछे कोई प्रतिशोध या अन्यमनस्कता नहीं है, अपितु उनके अपने तर्क हैं, कसौटियां हैं, मान्यताएं, परम्पराएं हैं, जिन्हें वे भुला नहीं पाते। वे अपनी परम्परा से अपने नववर्ष का स्वागत करते, अपनाते, संकल्पित होते और गौरव के साथ उसे विदाई देते आ रहे हैं। हिजरी, संवत्, विक्रमी आदि ऐसे ही पर्याय हैं।
बीते साल का सबक...
जनवरी से प्रारम्भ होने वाले नववर्ष के पीछे कोई शास्त्रीय आधार भले ही न हो, परन्तु समय का नवागमन इसमें भी है। प्रत्येक काल हर व्यक्ति से सही ढंग से अपने नियोजन की अपेक्षा रखता है। सही उपयोग करने वाले को पारितोषिक और दुरुपयोग करने वाले को दंड देने से वह नहीं चूकता, समय का यह नियम भी है। अभी-अभी विदा ले रहा 2018 इस तथ्य का ज्वलंत प्रमाण है। समुद्री तूफान, भुकम्प, बाढ़, महामारी, एक-एक कर प्रकोप दर्शाया और वर्षों की मानवीय उद्दंडता को चुकता करता गया। बड़े-बड़े राजनीतिक खिलाड़ियों के हौसले पस्त किए। प्रशासन के तेवर ढीले किये। कट्टरता को रौंदा, तो महाशक्तियों के बड़बोलेपन को तोड़ने से भी नहीं चूका। समय की कसौटी है कि कोई भी कालांश प्राणि समुदाय को अपने बीच उदासीन, आलसी, प्रमादी नहीं रखना चाहता। न वह चाहता है कि व्यक्ति अजनबी बन कर उसके बीच रहे, अपितु वह हर किसी को अपने कदम से कदम मिलाकर चलाना चाहता है और बदले में अपने अक्षय अनुदान का कोष लुटाता है।
किस धुन में हैं हम...
आज मानव ने अपनी मान्यताएं बदल दी हैं। वह समय को अपने अनुसार चलाना चाहता है। समय की अनन्त विशालता को अपनी मदहोशी, संकीर्णता, अजनबीपन में सिमट कर हर्षित होने का स्वप्न देखता है। इसीलिए उसे सभी 365 दिन साथ-साथ विताने के बावजूद अंत में खाली हाथ ही रहना पड़ता है और होश में आने तक सब कुछ निकल चुका होता है। इस संदर्भ में एक कथानक है। एक अजनबी किसी अनजाने देश में पहुंचा, उस देश की भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाजों से वह अपरिचित था। उसने लोगों को किसी विशाल भवन से आते-जाते देखा, तो वह भी प्रवेश हो गया। तरह-तरह के पकवानों को देखकर समझा, कोई दावत का आयोजन है। सजी टेबिलों में से एक पर जा बैठा और भोजन का आनन्द लेने लगा। बैरे दौड़-दौड़ कर भोजन परोस ही रहे थे। अजनबी ने खूब छककर खाया। भोजन के बाद बैरे ने उस अजनबी को बिल थमाया, तो वह मन ही मन यह सोचते हुए उठा कि कितने सज्जन ये लोग हैं कि न केवल आगंतुकों को भोजन कराते हैं, अपितु सम्मान-पत्र भी देते हैं। बैरे ने अपनी भाषा में पैसे की माँग दोहराई, पर वह तो अपनी धुन में ही मस्त था। सहयोग के लिए धन्यवाद देता आगे बढ़ गया।
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कहीं हाथ से न निकल जाए समय...
बैरे ने यह हरकत देखकर उसे पकड़कर मैंनेजर के पास ले गया। वह अजनबी बेहिचक था। मैंनेजर उसकी हरकतों से आगबबूला हो राजा के पास पहुँचा। राजा ने जब उस अजनबी को दंडित करने का आदेश दिया, तब भी वह अविचलित-आह्लादित था। उसके माथे पर कोई सिकन न देख बुद्धिमान राजा समझ गया कि यह अपने में मदहोश, अज्ञानी और मूढ़ है। राजा के आदेशानुसार उसकी पीठ पर मैं धूर्त हूं की पट्टी बांधी गयी, घोड़े पर बिठाकर उसे सारे नगर में घुमाया जा रहा था। नगर वाले ताने दे रहे थे, बच्चे हुल्लड़ मचा रहे थे, फिर भी वह मस्त था। अजनबी न केवल प्रसन्न था, अपितु इसे अपना सम्मान समझ रहा था। इस तरह वह अपने आँकलन के अनुसार पूरे राजकीय सम्मान के साथ अपने वतन विदा हुआ मान रहा था। अजनबी ने अपने नगर जाकर इस सम्मान की गाथा सबको आतुरता से सुनाने लगा। जनसाधारण उसे अपना नेता मानने की होड़ में थे। समकक्षी ईर्ष्या की आहें भर रहे थे। कुछ विद्वानोंं ने सुना, तो उसकी दयनीयता पर तरस आया। उन्होंने उस अजनबी को जब वस्तु स्थिति से अवगत कराया, तो वह सिर धुन-धुन कर पछताने लगा, पर तब तक सबकुछ हाथ से निकल चुका था।
आज हमारी भी यही स्थिति है। काश हम समझ पाते, तो नववर्ष जैसे पवित्र अवसर को कोरी ग्रीटिंग्स, हो-हुल्लड़, भीड़भरी मदहोशी में न गवाकर, वर्ष भर के 365 दिनों की सकारात्मक योजनाएं बनाते, उपयोग करते और इस प्रकार जीवन को धन्य बनाते।
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बीते साल का सबक...
जनवरी से प्रारम्भ होने वाले नववर्ष के पीछे कोई शास्त्रीय आधार भले ही न हो, परन्तु समय का नवागमन इसमें भी है। प्रत्येक काल हर व्यक्ति से सही ढंग से अपने नियोजन की अपेक्षा रखता है। सही उपयोग करने वाले को पारितोषिक और दुरुपयोग करने वाले को दंड देने से वह नहीं चूकता, समय का यह नियम भी है। अभी-अभी विदा ले रहा 2018 इस तथ्य का ज्वलंत प्रमाण है। समुद्री तूफान, भुकम्प, बाढ़, महामारी, एक-एक कर प्रकोप दर्शाया और वर्षों की मानवीय उद्दंडता को चुकता करता गया। बड़े-बड़े राजनीतिक खिलाड़ियों के हौसले पस्त किए। प्रशासन के तेवर ढीले किये। कट्टरता को रौंदा, तो महाशक्तियों के बड़बोलेपन को तोड़ने से भी नहीं चूका। समय की कसौटी है कि कोई भी कालांश प्राणि समुदाय को अपने बीच उदासीन, आलसी, प्रमादी नहीं रखना चाहता। न वह चाहता है कि व्यक्ति अजनबी बन कर उसके बीच रहे, अपितु वह हर किसी को अपने कदम से कदम मिलाकर चलाना चाहता है और बदले में अपने अक्षय अनुदान का कोष लुटाता है।
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किस धुन में हैं हम...
आज मानव ने अपनी मान्यताएं बदल दी हैं। वह समय को अपने अनुसार चलाना चाहता है। समय की अनन्त विशालता को अपनी मदहोशी, संकीर्णता, अजनबीपन में सिमट कर हर्षित होने का स्वप्न देखता है। इसीलिए उसे सभी 365 दिन साथ-साथ विताने के बावजूद अंत में खाली हाथ ही रहना पड़ता है और होश में आने तक सब कुछ निकल चुका होता है। इस संदर्भ में एक कथानक है। एक अजनबी किसी अनजाने देश में पहुंचा, उस देश की भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाजों से वह अपरिचित था। उसने लोगों को किसी विशाल भवन से आते-जाते देखा, तो वह भी प्रवेश हो गया। तरह-तरह के पकवानों को देखकर समझा, कोई दावत का आयोजन है। सजी टेबिलों में से एक पर जा बैठा और भोजन का आनन्द लेने लगा। बैरे दौड़-दौड़ कर भोजन परोस ही रहे थे। अजनबी ने खूब छककर खाया। भोजन के बाद बैरे ने उस अजनबी को बिल थमाया, तो वह मन ही मन यह सोचते हुए उठा कि कितने सज्जन ये लोग हैं कि न केवल आगंतुकों को भोजन कराते हैं, अपितु सम्मान-पत्र भी देते हैं। बैरे ने अपनी भाषा में पैसे की माँग दोहराई, पर वह तो अपनी धुन में ही मस्त था। सहयोग के लिए धन्यवाद देता आगे बढ़ गया।
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कहीं हाथ से न निकल जाए समय...
बैरे ने यह हरकत देखकर उसे पकड़कर मैंनेजर के पास ले गया। वह अजनबी बेहिचक था। मैंनेजर उसकी हरकतों से आगबबूला हो राजा के पास पहुँचा। राजा ने जब उस अजनबी को दंडित करने का आदेश दिया, तब भी वह अविचलित-आह्लादित था। उसके माथे पर कोई सिकन न देख बुद्धिमान राजा समझ गया कि यह अपने में मदहोश, अज्ञानी और मूढ़ है। राजा के आदेशानुसार उसकी पीठ पर मैं धूर्त हूं की पट्टी बांधी गयी, घोड़े पर बिठाकर उसे सारे नगर में घुमाया जा रहा था। नगर वाले ताने दे रहे थे, बच्चे हुल्लड़ मचा रहे थे, फिर भी वह मस्त था। अजनबी न केवल प्रसन्न था, अपितु इसे अपना सम्मान समझ रहा था। इस तरह वह अपने आँकलन के अनुसार पूरे राजकीय सम्मान के साथ अपने वतन विदा हुआ मान रहा था। अजनबी ने अपने नगर जाकर इस सम्मान की गाथा सबको आतुरता से सुनाने लगा। जनसाधारण उसे अपना नेता मानने की होड़ में थे। समकक्षी ईर्ष्या की आहें भर रहे थे। कुछ विद्वानोंं ने सुना, तो उसकी दयनीयता पर तरस आया। उन्होंने उस अजनबी को जब वस्तु स्थिति से अवगत कराया, तो वह सिर धुन-धुन कर पछताने लगा, पर तब तक सबकुछ हाथ से निकल चुका था।
आज हमारी भी यही स्थिति है। काश हम समझ पाते, तो नववर्ष जैसे पवित्र अवसर को कोरी ग्रीटिंग्स, हो-हुल्लड़, भीड़भरी मदहोशी में न गवाकर, वर्ष भर के 365 दिनों की सकारात्मक योजनाएं बनाते, उपयोग करते और इस प्रकार जीवन को धन्य बनाते।