इस एकादशी का व्रत करने वाले को यमदूत नहीं ले जाते नर्क
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पद्म पुराण में बताया गया है कि मार्गशीर्ष मास की शुक्लपक्ष की एकादशी के दिन जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए एकादशी का व्रत रखते हैं उनके पुण्य की तुलना कठिन तप और दान से बढ़कर है। जो व्यक्ति यह व्रत करता है उसे वाजपेय नामक यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है।
इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के कई जन्मों के पाप कट जाते हैं और मोक्ष की यात्रा का मार्ग सहज हो जाता। यही कारण है कि यह एकादशी मोक्षदा एकादशी के नाम से जानी जाती है। 2015 में यह पुण्यदायिनी एकादशी 21 तारीख सोमवार के दिन है।
मोक्षदा एकादशी व्रत की कथा
महाराज युधिष्ठिर को इस एकादशी के पुण्य और कथा के बारे में बताते हुए भगवान श्री कृष्ण कहते है। वैखानस नाम के एक राजा थे। उनके राज्य में सभी सुख शांति से रहते थे। एक रात राजा ने सपने में देखा कि उनके पिता नर्क में यातनाएं भोग रहे हैं।
राजा से अपने पिता की यह दशा देखी नहीं गई। सुबह उठते ही वह पर्वत ऋषि के पास पहुंचे। राजा ने सपने के बारे में ऋषि को बताया। ऋषि ने ध्यान लगाकर देखा तो पाया कि वास्तव में राजा के पिता नर्क में हैं।
इन्होंने राजा से बताया कि वह मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत रखें और इसके पुण्य को अपने पिता को दें। राजा ने ऐसा ही किया कुछ दिनों बाद इनके पिता फिर सपने में आए और बताया कि अब वह नर्क से मुक्त हो चुके हैं।
व्रत न भी करें तो मोक्षदा एकादशी के दिन यह काम जरूर करें
मोक्षदा एकादशी के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने कुरूक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था। इसलिए इस एकादशी के दिन भग्वद्गीता का पाठ जरूर करना चाहिए क्योंकि यह तिथि गीता जंयती भी है।
श्रीमद्भगवद्गीता में अठारह अध्याय हैं। इनमें ग्यारहवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को विश्वरूप के दर्शन का वर्णन किया गया है। इस अध्याय में बताया गया है कि अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त देखा। श्री कृष्ण में ही अर्जुन ने भगवान शिव, ब्रह्मा एवं जीवन मृत्यु के चक्र को भी देखा।
इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अपने परब्रह्म रुप को व्यक्त करते हैं जिसे देखकर अर्जुन का मोह भंग हो गया और वह युद्ध करने के लिए तैयार हो गए। इसलिए इस अध्याय का नियमित पाठ बड़ा ही उत्तम फलदायी माना गया है।