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शिक्षक दिवस विशेष: संन्यासी जिसके दर्शन से अभिभूत हो राधाकृष्णन बने महान शिक्षक

डॉ. प्रणव पण्ड्या Updated Wed, 05 Sep 2018 11:28 AM IST
Teachers Day 2018 how to Sarvepalli Radhakrishnan inspire to became great teacher
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दार्शनिक, शिक्षक, स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता के रूप में महान विभूतियों में सिरमौर माने जाने वाले डॉ. राधाकृष्णन का जन्म मद्रास शहर से चालीस मील दूर तिरुंत्तरी गाँव में 5 सितम्बर,1888 ई. को हुआ था। बारह वर्ष की उम्र तक वे अपने गाँव में ही रहे। धर्म शास्त्रों के प्रकाण्ड विद्वान पिता वीर स्वामी के सान्निध्य में रहकर अक्षर ज्ञान प्राप्त किया तथा शास्त्रों का अध्ययन भी। परिवार ने उन्हें धर्मनिष्ठा, जिज्ञासा, ईश्वर अनुरक्ति तथा धर्मानुराग की जो भावनाएँ विरासत में दी, वे ही उन्हें एक सामान्य बालक से महान दार्शनिक और आदर्श राष्ट्रपति तक पहुँचा सकीं। मिशनरी स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने के कारण राधाकृष्णन ने भारतीय धर्म शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने के साथ ईसाई धर्म व पाश्चात्य जीवन दर्शन का परिचय भी प्राप्त किया।
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बैल्लोर के वूरहीज कॉलेज में एम. ए. की शिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् वे मद्रास के क्रिश्चिन कॉलेज से जुड़ गये। उन दिनों ईसाई शिक्षण संस्थाओं का एक मात्र उद्देश्य था छात्रों के मन में हिन्दू धर्म तथा भारतीय संस्कृति के प्रति घृणा-वितृष्णा उपजाना तथा ईसाई धर्म और पाश्चात्य सभ्यता के रंग में रँगना था। राधाकृष्णन के सामने भी ऐसी परिस्थितियाँ आई, जब उनकी आस्थाओं पर चोट पहुँचती परन्तु उनका व्यक्तित्व उस पक्की मूर्ति के समान बन गया था, जो कितनी ही आँधियाँ और कितनी ही तूफान आने पर निखरती है।

आर्थिक स्थिति खराब होने पर भी उन्होंने ज्ञान साधना को भी एक पवित्र तपश्चर्या बना लिया। वे छात्रों को ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च चलाते थे। उन्हीं दिनों मद्रास में स्वामी विवेकानन्द का आगमन हुआ। उनके प्रवचनों ने युवक राधाकृष्णन को बड़ा प्रभावित किया और धर्म के प्रति उनकी निष्ठा, जिज्ञासा व विचार पूर्ण हो गए। उन्होंने कहा है ‘उनके अद्भुत साहस और अद्भुत वाग्मिता ने हिन्दू धर्म के प्रति मेरे इस अभिभाव को जाग्रत् किया, जिस पर ईसाई मिशनरियों द्वारा बार-बार आघात किया जा रहा था।’ स्वामी विवेकानन्द जी से ही प्रभावित होकर उन्होंने बी.ए. के बाद भी दर्शन शास्त्र ही लिया। एम.ए. में शोध विषय के लिए उन्होंने वेदान्त को चुना ओर इस विषय पर उच्च कोटि का शोध निबंध लिखकर एम.ए. पास किया। उस समय उनकी उम्र मात्र 20 वर्ष की थी। इस निबंध को देखकर उनके अध्यापक श्री ए.जी. हाग ने अलग से एक प्रमाण पत्र भी दिया था। उसी वर्ष उनकी नियुक्ति मद्रास प्रेसिडेन्सी कॉलेज में हो गई। वे तर्क शास्त्र के प्राध्यापक (असि० प्रोफेसर) बने और छात्रों को पढ़ाने लगे। उनका एक ही लक्ष्य था- विश्व में भारतीय तत्वदर्शन का परिचय देना।
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