{"_id":"5e23f78e8ebc3e4af95d8c6f","slug":"sirdi-sai-baba-temple-controversy-about-birth-place","type":"story","status":"publish","title_hn":"जन्मस्थान विवाद: कई चमत्कारों और विवादों से जुड़ा है शिरडी साई मंदिर, जानिए सबकुछ","category":{"title":"Religion","title_hn":"धर्म","slug":"religion"}}
जन्मस्थान विवाद: कई चमत्कारों और विवादों से जुड़ा है शिरडी साई मंदिर, जानिए सबकुछ
Mon, 20 Jan 2020 09:06 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 20 Jan 2020 09:06 AM IST
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sai baba
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शिरडी के साई एक बार फिर विवादों में हैं। ताजा मामला साई के जन्मस्थान को लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे द्वारा दिया गया बयान है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पाथरी को साई बाबा का जन्म स्थान बताते हुए इस जगह के विकास के लिए 100 करोड़ रुपये की राशि देने की बात कही। जिसके चलते यह विवाद पैदा हुआ। दरअसल साई के कुछ भक्त पाथरी को बाबा का जन्म स्थान मानते हैं वहीं शिरडी के भक्तों और लोगों का मानना है कि उनके जन्मस्थान को लेकर कोई सही जानकारी नहीं है। समय-समय पर शिरडी के साई मंदिर को लेकर कई तरह के विवाद और चमत्कार होते रहे हैं। आइए जानते हैं कौन हैं शिरडी के साई और उनसे जुड़ी सारी बातें.........
संत साई बाबा
संत साई बाबा को एक फकीर माना जाता है। साई बाबा कौन थे और उनका जन्म कहां हुआ था यह प्रश्न ऐसे हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है। साई ने कभी इन बातों का जिक्र नहीं किया। इनके माता-पिता कौन थे इसकी भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। बस एक बार अपने एक भक्त के पूछने पर साई ने कहा था कि, उनका जन्म 28 सितंबर 1836 को हुआ था। इसलिए हर साल 28 सितंबर को साई का जन्मोत्सव मनाया जाता है।
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फकीर से संत बनने की कहानी
ऐसा माना जाता है कि सन् 1854 में पहली बार साई बाबा शिरडी में दिखाई दिए। उस समय बाबा की उम्र लगभग 16 साल थी। शिरडी के लोगों ने बाबा को पहली बार एक नीम के वृक्ष के नीचे समाधि में लीन देखा। कम उम्र में सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास की जरा भी चिंता किए बगैर बालयोगी को कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ।
कैसा पड़ा साई नाम
कुछ दिनों तक शिरडी में रहकर साईं एक दिन किसी से कुछ कहे बिना अचानक वहां से चले गए। कुछ सालों के बाद साई फिर शिरडी में पहुंचे। खंडोबा मंदिर के पुजारी ने साईं को देखते ही कहा ‘आओ साई’ इस स्वागत संबोधन के बाद से ही शिरडी का फकीर ‘साई बाबा’ कहलाने लगा।
साई का शुरुआती जीवन
शिरडी के लोग शुरू में साई बाबा को पागल समझते थे लेकिन धीरे-धीरे उनकी शक्ति और गुणों को जानने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ती गयी। साई बाबा शिरडी के केवल पांच परिवारों से रोज दिन में दो बार भिक्षा मांगते थे। वे टीन के बर्तन में तरल पदार्थ और कंधे पर टंगे हुए कपड़े की झोली में रोटी और ठोस पदार्थ इकट्ठा किया करते थे। सभी सामग्रियों को वे द्वारका माई लाकर मिट्टी के बड़े बर्तन में मिलाकर रख देते थे। कुत्ते, बिल्लियां, चिड़िया निःसंकोच आकर खाने का कुछ अंश खा लेते थे, बची हुए भिक्षा को साई बाबा भक्तों के साथ मिल बांट कर खाते थे।
शिरडी साई बाबा के चमत्कार
साई बाबा ने अपने जीवनकाल में कई ऐसे चमत्कार दिखाए जिससे लोगों ने इनमें ईश्वर का अंश महसूस किया। इन्हीं चमत्कारों ने साई को भगवान का अवतार बना दिया। साई बाबा जब पहली बार शिरडी आए थे और तब वो एक नीम के पेड़ के नीचे विश्राम किया करते थे। आज इस जगह को शिरड़ी साई धाम में गुरु स्थान कहा जाता है। इस नीम के पेड़ की पत्ती को खाकर लोग चौंक जाते हैं। क्योंकि इस नीम के पेड़ की पत्तियां खाने पर मीठा स्वाद देती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस नीम के पेड़ की पत्तियां तब कड़वी ही थी, पर साई के दफ़्न होने के बाद मीठी हो गयी।
लक्ष्मी नामक एक स्त्री संतान सुख के लिए तड़प रही थी। एक दिन साई बाबा के पास अपनी विनती लेकर पहुंच गई। साई ने उसे उदी यानी भभूत दिया और कहा आधा तुम खा लेना और आधा अपने पति को दे देना। लक्ष्मी ने ऐसा ही किया। निश्चित समय पर लक्ष्मी गर्भवती हुई। साई के इस चमत्कार से वह साईं की भक्त बन गयी और जहां भी जाती साई बाबा के गुणगाती। साई के किसी विरोधी ने लक्ष्मी के गर्भ को नष्ट करने के लिए धोखे से गर्भ नष्ट करने की दवाई दे दी। इससे लक्ष्मी को पेट में दर्द एवं रक्तस्राव होने लगा। लक्ष्मी साई के पास पहुंचकर साईं से विनती करने लगी। साई बाबा ने लक्ष्मी को उदी खाने के लिए दिया। उदी खाते ही लक्ष्मी का रक्तस्राव रूक गया और लक्ष्मी को सही समय पर संतान सुख प्राप्त हुआ।
शिरडी साई बाबा के दरबार में हजारों सवाली अपनी मुरादें लेकर जाते हैं। मान्यता है कि भक्तों को उनके दर्शन मात्र से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। साई बाबा ने अपने जीवन काल में सदा लोगों की भलाई के लिए काम किया। भले ही उन्होंने फकीरी का जीवन जिया हो, लेकिन उन्होंने अपने आशीर्वाद से लोगों के जीवन का कल्याण किया। उनके चमत्कार की कई कहानियां सुनने को मिलेंगी उनमें कुछ कहानियों का जिक्र यहां किया जा रहा है।
जब तेल की जगह पानी से जल उठे दीये
साई बाबा रोजाना फकीरी की हालत में लोगों से भीख मांगा करते थे। ईश्वर के समक्ष दीया जलाने के लिए वे लोगों से तेल मांगते थे। एक दिन उन्हें किसी से तेल मिल न सका। तो उन्होंने दीयों में पानी भरा और जैसी ही उसमें आग लगाई तो दीये जल उठे। जब ये बात लोगों को पता चली तो वे बाबा के इस चमत्कार को देखकर हैरान हो गए। जिन लोगों ने उन्हें तेल देने से मना किया था वे बाबा के चरणों में नतमस्तक हो गए।
जब साई के आग्रह से बारिश थमी
एक बार साईं बाबा का भक्त बहुत दूर से सहपत्नी उनके दर्शन के लिए आया था। लेकिन दर्शन करने के बाद जब उसे घर जाना था तो बहुत तेज बारिश होने लगी। ऐसे में भक्त और उसकी पत्नी परेशान हो गईं। उन्हें घर पहुंचना आवश्यक था। ये देखकर साईं बाबा ने ईश्वर को याद किया और उनसे बारिश को रोक देने का आग्रह किया। कहा जाता है कि उनके आग्रह से बारिश एक झटके में थम गई।
बाबा ने जब बचायी एक बच्ची की जान
एक बार की बात है एक गांव में बच्ची कुएं के पास खेल रही थी, खेलते-खेलते बच्ची कुएं में गिर गई। जब वह कुएं में गिर गई तो लोगों को लगा कि बच्ची कुएं में डूब जाएगी। लोग दौड़कर आए लेकिन जब उन्होंने देखा की बच्ची कुएं में गिरी नहीं वह किसी के सहारे से लटकी हुई है। वो सहारा कोई नहीं, बल्कि स्वयं साईं बाबा थे। लोग बाबा का यह चमत्कार देखकर उनके प्रति नतमस्तक हो गए।
साई विवाद
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने समय- समय पर साई के बारे में अपनी बात रखी। साई पूजा का विरोध करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि यह सनातन धर्म के खिलाफ गहरी साजिश है। सनातनी मंदिरों में उनकी मूर्ति स्थापना और पूजा का उन्होंने विरोध किया। उन्होंने साई बाबा की पूजा का मुखर विरोध किया।
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संत साई बाबा
संत साई बाबा को एक फकीर माना जाता है। साई बाबा कौन थे और उनका जन्म कहां हुआ था यह प्रश्न ऐसे हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है। साई ने कभी इन बातों का जिक्र नहीं किया। इनके माता-पिता कौन थे इसकी भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। बस एक बार अपने एक भक्त के पूछने पर साई ने कहा था कि, उनका जन्म 28 सितंबर 1836 को हुआ था। इसलिए हर साल 28 सितंबर को साई का जन्मोत्सव मनाया जाता है।
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फकीर से संत बनने की कहानी
ऐसा माना जाता है कि सन् 1854 में पहली बार साई बाबा शिरडी में दिखाई दिए। उस समय बाबा की उम्र लगभग 16 साल थी। शिरडी के लोगों ने बाबा को पहली बार एक नीम के वृक्ष के नीचे समाधि में लीन देखा। कम उम्र में सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास की जरा भी चिंता किए बगैर बालयोगी को कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ।
कैसा पड़ा साई नाम
कुछ दिनों तक शिरडी में रहकर साईं एक दिन किसी से कुछ कहे बिना अचानक वहां से चले गए। कुछ सालों के बाद साई फिर शिरडी में पहुंचे। खंडोबा मंदिर के पुजारी ने साईं को देखते ही कहा ‘आओ साई’ इस स्वागत संबोधन के बाद से ही शिरडी का फकीर ‘साई बाबा’ कहलाने लगा।
साई का शुरुआती जीवन
शिरडी के लोग शुरू में साई बाबा को पागल समझते थे लेकिन धीरे-धीरे उनकी शक्ति और गुणों को जानने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ती गयी। साई बाबा शिरडी के केवल पांच परिवारों से रोज दिन में दो बार भिक्षा मांगते थे। वे टीन के बर्तन में तरल पदार्थ और कंधे पर टंगे हुए कपड़े की झोली में रोटी और ठोस पदार्थ इकट्ठा किया करते थे। सभी सामग्रियों को वे द्वारका माई लाकर मिट्टी के बड़े बर्तन में मिलाकर रख देते थे। कुत्ते, बिल्लियां, चिड़िया निःसंकोच आकर खाने का कुछ अंश खा लेते थे, बची हुए भिक्षा को साई बाबा भक्तों के साथ मिल बांट कर खाते थे।
शिरडी साई बाबा के चमत्कार
साई बाबा ने अपने जीवनकाल में कई ऐसे चमत्कार दिखाए जिससे लोगों ने इनमें ईश्वर का अंश महसूस किया। इन्हीं चमत्कारों ने साई को भगवान का अवतार बना दिया। साई बाबा जब पहली बार शिरडी आए थे और तब वो एक नीम के पेड़ के नीचे विश्राम किया करते थे। आज इस जगह को शिरड़ी साई धाम में गुरु स्थान कहा जाता है। इस नीम के पेड़ की पत्ती को खाकर लोग चौंक जाते हैं। क्योंकि इस नीम के पेड़ की पत्तियां खाने पर मीठा स्वाद देती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस नीम के पेड़ की पत्तियां तब कड़वी ही थी, पर साई के दफ़्न होने के बाद मीठी हो गयी।
लक्ष्मी नामक एक स्त्री संतान सुख के लिए तड़प रही थी। एक दिन साई बाबा के पास अपनी विनती लेकर पहुंच गई। साई ने उसे उदी यानी भभूत दिया और कहा आधा तुम खा लेना और आधा अपने पति को दे देना। लक्ष्मी ने ऐसा ही किया। निश्चित समय पर लक्ष्मी गर्भवती हुई। साई के इस चमत्कार से वह साईं की भक्त बन गयी और जहां भी जाती साई बाबा के गुणगाती। साई के किसी विरोधी ने लक्ष्मी के गर्भ को नष्ट करने के लिए धोखे से गर्भ नष्ट करने की दवाई दे दी। इससे लक्ष्मी को पेट में दर्द एवं रक्तस्राव होने लगा। लक्ष्मी साई के पास पहुंचकर साईं से विनती करने लगी। साई बाबा ने लक्ष्मी को उदी खाने के लिए दिया। उदी खाते ही लक्ष्मी का रक्तस्राव रूक गया और लक्ष्मी को सही समय पर संतान सुख प्राप्त हुआ।
शिरडी साई बाबा के दरबार में हजारों सवाली अपनी मुरादें लेकर जाते हैं। मान्यता है कि भक्तों को उनके दर्शन मात्र से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। साई बाबा ने अपने जीवन काल में सदा लोगों की भलाई के लिए काम किया। भले ही उन्होंने फकीरी का जीवन जिया हो, लेकिन उन्होंने अपने आशीर्वाद से लोगों के जीवन का कल्याण किया। उनके चमत्कार की कई कहानियां सुनने को मिलेंगी उनमें कुछ कहानियों का जिक्र यहां किया जा रहा है।
जब तेल की जगह पानी से जल उठे दीये
साई बाबा रोजाना फकीरी की हालत में लोगों से भीख मांगा करते थे। ईश्वर के समक्ष दीया जलाने के लिए वे लोगों से तेल मांगते थे। एक दिन उन्हें किसी से तेल मिल न सका। तो उन्होंने दीयों में पानी भरा और जैसी ही उसमें आग लगाई तो दीये जल उठे। जब ये बात लोगों को पता चली तो वे बाबा के इस चमत्कार को देखकर हैरान हो गए। जिन लोगों ने उन्हें तेल देने से मना किया था वे बाबा के चरणों में नतमस्तक हो गए।
जब साई के आग्रह से बारिश थमी
एक बार साईं बाबा का भक्त बहुत दूर से सहपत्नी उनके दर्शन के लिए आया था। लेकिन दर्शन करने के बाद जब उसे घर जाना था तो बहुत तेज बारिश होने लगी। ऐसे में भक्त और उसकी पत्नी परेशान हो गईं। उन्हें घर पहुंचना आवश्यक था। ये देखकर साईं बाबा ने ईश्वर को याद किया और उनसे बारिश को रोक देने का आग्रह किया। कहा जाता है कि उनके आग्रह से बारिश एक झटके में थम गई।
बाबा ने जब बचायी एक बच्ची की जान
एक बार की बात है एक गांव में बच्ची कुएं के पास खेल रही थी, खेलते-खेलते बच्ची कुएं में गिर गई। जब वह कुएं में गिर गई तो लोगों को लगा कि बच्ची कुएं में डूब जाएगी। लोग दौड़कर आए लेकिन जब उन्होंने देखा की बच्ची कुएं में गिरी नहीं वह किसी के सहारे से लटकी हुई है। वो सहारा कोई नहीं, बल्कि स्वयं साईं बाबा थे। लोग बाबा का यह चमत्कार देखकर उनके प्रति नतमस्तक हो गए।
साई विवाद
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने समय- समय पर साई के बारे में अपनी बात रखी। साई पूजा का विरोध करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि यह सनातन धर्म के खिलाफ गहरी साजिश है। सनातनी मंदिरों में उनकी मूर्ति स्थापना और पूजा का उन्होंने विरोध किया। उन्होंने साई बाबा की पूजा का मुखर विरोध किया।