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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   Sawan 2023 Shiv Hriday Stotra Path Lyrics benefits for marriage

Shiv Hriday Stotra: सावन में जरूर करें शिव हृदय स्तोत्र का पाठ, मिलेगा मनचाहा जीवनसाथी और दूर होंगे सभी कष्ट

Wed, 12 Jul 2023 01:22 PM IST
आशिकी पटेल धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आशिकी पटेल Updated Wed, 12 Jul 2023 01:22 PM IST
सार

Shiv Hriday Stotra Path : यदि आप भी शीघ्र विवाह की कामना करते हैं या मनचाहा जीवनसाथी पाना चाहते हैं तो सावन में शिव हृदय स्तोत्र पाठ जरूर करें। इस स्तोत्र को बहुत चमत्कारी माना जाता है।

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Sawan 2023 Shiv Hriday Stotra Path Lyrics benefits for marriage
सावन में जरूर करें शिव हृदय स्तोत्र का पाठ - फोटो : iStock

विस्तार

Shiv Hriday Stotra Path In Sawan 2023: सभी देवों में भगवान शिव का स्वरूप सबसे निराला है। शिव जी को न सिर्फ मनुष्य भक्ति भाव से पूजते हैं, बल्कि ये सभी देवी-देवताओं के आराध्य और पूजनीय हैं। इसलिए इन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है। इनकी पूजा से व्यक्ति को जीवन में समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। सुयोग्य जीवनसाथी की कामना के लिए भी शिव जी की पूजा की जाती है। इनकी पूजा से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। ऐसे में यदि आप भी शीघ्र विवाह की कामना करते हैं या मनचाहा जीवनसाथी पाना चाहते हैं तो सावन में शिव हृदय स्तोत्र पाठ जरूर करें। इस स्तोत्र को बहुत चमत्कारी माना जाता है। कहा जाता है कि इसका प्रभाव कभी खाली नहीं जाता है। शिव हृदय स्तोत्र इस प्रकार है- 

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Sawan 2023 Shiv Hriday Stotra Path Lyrics benefits for marriage
सावन में जरूर करें शिव हृदय स्तोत्र का पाठ - फोटो : iStock
शिव हृदय स्तोत्र पाठ के लाभ 
  • नियमित रूप से शिव हृदय स्तोत्र के पाठ से मन चाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है। संकट दूर हो जाते हैं। 
  • मान्यता है कि शिव हृदय स्तोत्र का पूरे सावन के दौरान पाठ करने से भगवान शिव की कृपा बरसती है।
  • जो व्यक्ति शिव शिव हृदय स्तोत्र का पाठ करता है उसे भगवान शिव के हृदय में स्थान प्राप्त होता है। 
  •  इस पाठ से जीवन की हर बाधा से छुटकारा मिल जाता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।  
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Sawan 2023 Shiv Hriday Stotra Path Lyrics benefits for marriage
सावन में जरूर करें शिव हृदय स्तोत्र का पाठ - फोटो : iStock

श्री शिव हृदय स्तोत्रम् ।
ओं प्रणवो मे शिरः पातु मायाबीजं शिखां मम ।
प्रासादो हृदयं पातु नमो नाभिं सदाऽवतु ॥ 1 ॥

लिङ्गं मे शिवः पायादष्टार्णं सर्वसन्धिषु ।
धृवः पादयुगं पातु कटिं माया सदाऽवतु ॥ 2 ॥

नमः शिवाय कण्ठं मे शिरो माया सदाऽवतु ।
शक्त्यष्टार्णः सदा पायादापादतलमस्तकम् ॥ 3 ॥

सर्वदिक्षु च वर्णव्याहृत् पञ्चार्णः पापनाशनः ।
वाग्बीजपूर्वः पञ्चार्णो वाचां सिद्धिं प्रयच्छतु ॥ 4 ॥

लक्ष्मीं दिशतु लक्ष्यार्थः कामाद्य काममिच्छतु ।
परापूर्वस्तु पञ्चार्णः परलोकं प्रयच्छतु ॥ 5 ॥

मोक्षं दिशतु ताराद्यः केवलं सर्वदाऽवतु ।
त्र्यक्षरी सहितः शम्भुः त्रिदिवं सम्प्रयच्छतु ॥ 6 ॥

सौभाग्य विद्या सहितः सौभाग्यं मे प्रयच्छतु ।
षोडशीसम्पुटतः शम्भुः सर्वदा मां प्ररक्षतु ॥ 7 ॥

एवं द्वादश भेदानि विद्यायाः सर्वदाऽवतु ।
सर्वमन्त्रस्वरूपश्च शिवः पायान्निरन्तरम् ॥ 8 ॥

यन्त्ररूपः शिवः पातु सर्वकालं महेश्वरः ।
शिवस्यपीठं मां पातु गुरुपीठस्य दक्षिणे ॥ 9 ॥

वामे गणपतिः पातु श्रीदुर्गा पुरतोऽवतु ।
क्षेत्रपालः पश्चिमे तु सदा पातु सरस्वती ॥ 10 ॥

आधारशक्तिः कालाग्निरुद्रो माण्डूक सञ्ज्ञितः ।
आदिकूर्मो वराहश्च अनन्तः पृथिवी तथा ॥ 11 ॥

एतान्मां पातु पीठाधः स्थिताः सर्वत्र देवताः ।
महार्णवे जलमये मां पायादमृतार्णवः ॥ 12 ॥

रत्नद्वीपे च मां पातु सप्तद्वीपेश्वरः तथा ।
तथा हेमगिरिः पातु गिरिकानन भूमिषु ॥ 13 ॥

मां पातु नन्दनोद्यानं वापिकोद्यान भूमिषु ।
कल्पवृक्षः सदा पातु मम कल्पसहेतुषु ॥ 14 ॥

भूमौ मां पातु सर्वत्र सर्वदा मणिभूतलम् ।
गृहं मे पातु देवस्य रत्ननिर्मितमण्डपम् ॥ 15 ॥

आसने शयने चैव रत्नसिंहासनं तथा ।
धर्मं ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं चाऽनुगच्छतु ॥ 16 ॥

अथाऽज्ञानमवैराग्यमनैश्वर्यं च नश्यतु ।
सत्त्वरजस्तमश्चैव गुणान् रक्षन्तु सर्वदा ॥ 17 ॥

मूलं विद्या तथा कन्दो नालं पद्मं च रक्षतु ।
पत्राणि मां सदा पातु केसराः कर्णिकाऽवतु ॥ 18 ॥

मण्डलेषु च मां पातु सोमसूर्याग्निमण्डलम् ।
आत्माऽत्मानं सदा पातु अन्तरात्मान्तरात्मकम् ॥ 19 ॥

पातु मां परमात्माऽपि ज्ञानात्मा परिरक्षतु ।
वामा ज्येष्ठा तथा श्रेष्ठा रौद्री काली तथैव च ॥ 20 ॥

कलपूर्वा विकरणी बलपूर्वा तथैव च ।
बलप्रमथनी चापि सर्वभूतदमन्यथ ॥ 21 ॥

मनोन्मनी च नवमी एता मां पातु देवताः ।
योगपीठः सदा पातु शिवस्य परमस्य मे ॥ 22 ॥

श्रीशिवो मस्तकं पातु ब्रह्मरन्ध्रमुमाऽवतु ।
हृदयं हृदयं पातु शिरः पातु शिरो मम ॥ 23 ॥

शिखां शिखा सदा पातु कवचं कवचोऽवतु ।
नेत्रत्रयं पातु हस्तौ अस्त्रं च रक्षतु ॥ 24 ॥

ललाटं पातु हृल्लेखा गगनं नासिकाऽवतु ।
राका गण्डयुगं पातु ओष्ठौ पातु करालिकः ॥ 25 ॥

जिह्वां पातु महेष्वासो गायत्री मुखमण्डलम् ।
तालुमूलं तु सावित्री जिह्वामूलं सरस्वती ॥ 26 ॥

वृषध्वजः पातु कण्ठं क्षेत्रपालो भुजौ मम ।
चण्डीश्वरः पातु वक्षो दुर्गा कुक्षिं सदाऽवतु ॥ 27 ॥

स्कन्दो नाभिं सदा पातु नन्दी पातु कटिद्वयम् ।
पार्श्वौ विघ्नेश्वरः पातु पातु सेनापतिर्वलिम् ॥ 28 ॥

ब्राह्मीलिङ्गं सदा पायादसिताङ्गादिभैरवाः ।
रुरुभैरव युक्ता च गुदं पायान्महेश्वरः ॥ 29 ॥

चण्डयुक्ता च कौमारी चोरुयुग्मं च रक्षतु ।
वैष्णवी क्रोधसम्युक्ता जानुयुग्मं सदाऽवतु ॥ 30 ॥

उन्मत्तयुक्ता वाराही जङ्घायुग्मं प्ररक्षतु ।
कपालयुक्ता माहेन्द्री गुल्फौ मे परिरक्षतु ॥ 31 ॥

चामुण्डा भीषणयुता पादपृष्ठे सदाऽवतु ।
संहारेणयुता लक्ष्मी रक्षेत् पादतले उभे ॥ 32 ॥

पृथगष्टौ मातरस्तु नखान् रक्षन्तु सर्वदा ।
रक्षन्तु रोमकूपाणि असिताङ्गादिभैरवाः ॥ 33 ॥

वज्रहस्तश्च मां पायादिन्द्रः पूर्वे च सर्वदा ।
आग्नेय्यां दिशि मां पातु शक्ति हस्तोऽनलो महान् ॥ 34 ॥

दण्डहस्तो यमः पातु दक्षिणादिशि सर्वदा ।
निरृतिः खड्गहस्तश्च नैरृत्यां दिशि रक्षतु ॥ 35 ॥

प्रतीच्यां वरुणः पातु पाशहस्तश्च मां सदा ।
वायव्यां दिशि मां पातु ध्वजहस्तः सदागतिः ॥ 36 ॥

उदीच्यां तु कुबेरस्तु गदाहस्तः प्रतापवान् ।
शूलपाणिः शिवः पायादीशान्यां दिशि मां सदा ॥ 37 ॥

कमण्डलुधरो ब्रह्मा ऊर्ध्वं मां परिरक्षतु ।
अधस्ताद्विष्णुरव्यक्तश्चक्रपाणिः सदाऽवतु ॥ 38 ॥

ओं ह्रौं ईशानो मे शिरः पायात् ।
ओं ह्रैं मुखं तत्पुरुषोऽवतु ॥ 39 ॥

ओं ह्रूं अघोरो हृदयं पातु ।
ओं ह्रीं वामदेवस्तु गुह्यकम् ॥ 40 ॥

ओं ह्रां सद्योजातस्तु मे पादौ ।
ओं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः पातु मे शिखाम् ॥ 41 ॥

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Sawan 2023 Shiv Hriday Stotra Path Lyrics benefits for marriage
सावन में जरूर करें शिव हृदय स्तोत्र का पाठ - फोटो : iStock

फलश्रुति
अनुक्तमपि यत् स्थानं तत्सर्वं शङ्करोऽवतु ।
इति मे कथितं नन्दिन् शिवस्य हृदयं परम् ॥ 42 ॥

मन्त्रयन्त्रस्थ देवानां रक्षणात्मकमद्भुतम् ।
सहस्रावर्तनात्सिद्धिं प्राप्नुयान्मन्त्रवित्तमः ॥ 43 ॥

शिवस्य हृदयेनैव नित्यं सप्ताभिमन्त्रितम् ।
तोयं पीत्वेप्सितां सिद्धिं मण्डलाल्लभते नरः ॥ 44 ॥

वन्ध्या पुत्रवती भूयात् रोगी रोगात् विमुच्यते ।
चन्द्र सूर्यग्रहे नद्यां नाभिमात्रोदके स्थितः ॥ 45 ॥

मोक्षान्तं प्रजेपेद्भक्त्या सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ।
रुद्रसङ्ख्या जपाद्रोगी नीरोगी जायते क्षणात् ॥ 46 ॥

उपोषितः प्रदोषे च श्रावण्यां सोमवासरे ।
शिवं सम्पूज्य यत्नेन हृदयं तत्परो जपेत् ॥ 47 ॥

कृत्रिमेषु च रोगेषु वातपित्तज्वरेषु च ।
त्रिसप्तमन्त्रितं तोयं पीत्वाऽरोग्यमवाप्नुयात् ॥ 48 ॥

नित्यमष्टोत्तरशतं शिवस्य हृदयं जपेत् ।
मण्डलाल्लभते नन्दिन् सिद्धिदं नात्र संशयः ॥ 49 ॥

किं बहूक्तेन नन्दीश शिवस्य हृदयस्य च ।
जपित्वातु महेशस्य वाहनत्वमवाप्स्यसि ॥ 50 ॥

इति श्रीलिङ्गपुराणे उत्तरभागे वामदेवनन्दीश्वरसंवादे शिव हृदय स्तोत्र निरूपणं नाम अष्टषष्टितमोध्यायः समाप्तः।

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