Sawan 2021: आखिर क्यों करते हैं शिवलिंग की आधी परिक्रमा? जानें शिव आराधना से जुड़े नियम

अनीता जैन ,वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 28 Jul 2021 12:53 PM IST

सार

शिवलिंग को भगवान शंकर का ही रूप माना जाता है,लेकिन ग्रंथों में इनकी पूजा और परिक्रमा के कुछ नियम बताए गए हैं,जिससे ये जल्दी ही प्रसन्न होते हैं।
sawan 2021: शिवलिंग के नीचे का भाग,जहां से शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल बाहर आता है,वह पार्वती भाग माना जाता है।
sawan 2021: शिवलिंग के नीचे का भाग,जहां से शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल बाहर आता है,वह पार्वती भाग माना जाता है।
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विस्तार

Sawan Puja Vidhi 2021 : सनातन धर्म में भगवान शिव को जल्दी ही प्रसन्न होने वाला देव माना गया है। शिवजी तो मात्र जल, फूल, बेलपत्र और भांग-धतूरा से ही प्रसन्न हो जाते हैं एवं अपने भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण कर देते हैं। शिवलिंग को भगवान शंकर का ही रूप माना जाता है,लेकिन ग्रंथों में इनकी पूजा और परिक्रमा के कुछ नियम बताए गए हैं,जिससे ये जल्दी ही प्रसन्न होते हैं। यदि नियमों का उल्लंघन किया जाए तो शिव पूजा के फल नहीं मिलते और भोलेनाथ रुष्ट होते हैं। शिवलिंग के नीचे का भाग,जहां से शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल बाहर आता है,वह पार्वती भाग माना जाता है।
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क्या हैं शिवलिंग परिक्रमा का नियम
सामान्य रूप से सभी देवी और देवताओं की प्रतिमा की परिक्रमा पूरी की जाती है, लेकिन शिवलिंग की परिक्रमा कभी पूरी नहीं करनी चाहिए। शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा आधी करनी चाहिए। हालांकि, शिव प्रतिमा की परिक्रमा पूरी की जा सकती है। शिवलिंग की परिक्रमा आधा कर वापस हो लेना चाहिए। शिवलिंग की परिक्रमा आधा करने के साथ ही दिशा का भी ध्यान करना चाहिए। शिवलिंग की परिक्रमा बाईं ओर से शुरू करनी चाहिए। साथ ही जलहरी तक जाकर वापस लौट कर दूसरी ओर से परिक्रमा करनी चाहिए। विपरीत दिशा में लौट दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।


क्यों करते है परिक्रमा?
हम अपने इष्ट देवी-देवता की मूर्ति की विविध शक्तियों की प्रभा या तेज को परिक्रमा करके प्राप्त कर सकते हैं। उनका यह तेजदान विघ्नों, संकटों, विपत्तियों का नाश करने में समर्थ होता है। परंपरा के अनुसार पूजा-पाठ, अभिषेक या दर्शन के उपरांत परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए। परिक्रमा शुरू करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए, साथ ही परिक्रमा वहीं खत्म करें जहां से शुरू की गई थी। ध्यान रखें कि परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नहीं मानी जाती। परिक्रमा के दौरान मन में निंदा, बुराई, दुर्भावना, क्रोध, तनाव आदि विकार न आने दें। जूते-चप्पल निकालकर नंगे पैर ही परिक्रमा करें।    

जलहरी को न लांघें
शिवलिंग की जलहरी को भूल कर नहीं लांघना चाहिए। मान्यता के अनुसार ऐसा करना अशुभ माना जाता है। शिवलिंग की जलहरी को ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक  माना गया है। यदि परिक्रमा करते हुए इसे लांघा जाए तो मनुष्य को शारीरिक परेशानियों के साथ ही शारीरिक ऊर्जा की हानि का भी सामना करना पड़ता है। शिवलिंग की पूर्ण परिक्रमा से शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। इसी वजह से शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह का कष्ट उत्पन्न होता है। शिवलिंग की अर्ध चंद्राकार प्रदक्षिणा ही करनी चाहिए।

तब लांघी जा सकती है जलहरी
शास्त्रों के अनुसार कई स्थितियों में जलहरी को लांघने का दोष नहीं माना गया है। जैसे तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढंके हुए जलहरी को लांघने से दोष नहीं लगता है।

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