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कुत्तों से क्यों डरते हैं कांवड़िए?
राकेश/इंटरनेट डेस्क
Updated Thu, 01 Aug 2013 05:25 PM IST
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सावन का महीना चल रहा है। भोले के भक्त कांवड़ में गंगा का जल लेकर शिव जी का जलभिषेक करने निकल पड़े हैं।
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लेकिन गंगा का जल लेकर शिवालय तक पहुंचने के मार्ग में कांवड़ियों को कई चीज बातों का ध्यान रखना पड़ता है। मार्ग में साज-श्रृंगार की चीजों का प्रयोग करना वर्जित होता है।
कांवड़ियों के लिए कांवड़ शिव स्वरूप होता है इसलिए इसे जमीन पर नहीं रखा जाता है।
यही कारण है कि मार्ग में जहां भी कांवड़िया ठहरते हैं कांवड़ को किसी ऊंचे स्थान पर रखते हैं ताकि भूमि से कांवड़ का स्पर्श नहीं हो। लेकिन कांवड़ियों को सबसे ज्यादा सावधान कुत्तों से रहना पड़ता है।
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मान्यता है कि कुत्ते का स्पर्श होते ही कांवड़ में रखा जल अशुद्घ हो जाता है जो भोले बाबा पर नहीं चढ़ाया जा सकता है।
ऐसी स्थिति आने पर कांवड़िये को वापस लौटना पड़ता है और फिर से कांवड़ में जल भरकर यात्रा शुरू करनी पड़ती है। कांवड़ को ऊंचे स्थान पर रखने के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है।
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शास्त्रों में कुत्ते को काल भैरव का वाहन कहा गया है। भैरव बाबा शिव के संहारक रूप हैं और इनकी प्रकृति तमसिक होने के कारण इन्हें अपवित्र माना जाता है और इन्हें यज्ञ भाग से वंचित रखा गया है।
कुत्ते का स्पर्श होने पर माना जाता है कि भैरो ने गंगा जल का स्पर्श कर लिया है इसलिए गंगा जल अशुद्घ हो गया। अशुद्घ जल शिव को नहीं चढ़ता है इसलिए कांवड़ियों को पुनः कांवड़ में जल भरना पड़ता है।