मंगलवार के दिन करें जटायु कृत इस स्तोत्र का पाठ, संकटों से मिलेगी मुक्ति
इस स्तोत्र के पाठ से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम प्रसन्न होते हैं। उनकी कृपा से शारीरिक और मानसिक कष्ट भी दूर होते हैं। जो साधक जटायु कृत श्रीराम स्तोत्र को एकाग्रचित्त से सुनता, अथवा पाठ करता है उसको सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है।
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Shri Ram Stotra Path: मंगलवार का दिन श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी को समर्पित है। इस दिन हनुमान भक्त हनुमान जी की पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत भी रखते हैं। मंगलवार के दिन हनुमान जी कि पूजा करने से कुंडली में स्थित मंगल दोष भी दूर होता है। हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए श्री राम की आराधना करनी चाहिए। मंगलवार के दिन स्नान ध्यान करके हनुमान जी की पूजा करने के साथ जटायु कृत श्रीराम स्तोत्र का पाठ भी करना चाहिए।
श्रीराम स्तोत्र पाठ के लाभ
मंगलवार के दिन भगवान श्रीराम संग हनुमान जी की पूजा करने से व्यक्ति को सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। साथ ही मान-सम्मान में वृद्धि होती है। श्री राम स्तोत्र का पाठ करे से यश और कीर्ति की भी प्राप्ति होती है। इस स्तोत्र के पाठ से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम प्रसन्न होते हैं। उनकी कृपा से शारीरिक और मानसिक कष्ट भी दूर होते हैं। जो साधक जटायु कृत श्रीराम स्तोत्र को एकाग्रचित्त से सुनता, अथवा पाठ करता है उसको सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है।
|| जटायुकृतं रामस्तोत्रम् ||
जटायुरुवाच
अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् ।
उपरमपरमं परात्मभूतं सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥
निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्षं क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् ।
नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ॥
त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं रविशतभासुरमीहितप्रदानम् ।
शरणदमनिशं सुरागमूले कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥
भवविपिनदवाग्निनामधेयं भवमुखदैवतदैवतं दयालुम् ।
दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं रवितनयासदृशं हरिं प्रपद्ये ॥
अविरतभवभावनातिदूरं भवविमुखैर्मुनिभिस्सदैव दृश्यम् ।
भवजलधिसुतारणाङ्घ्रिपोतं शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥
गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् ।
सुरवरदनुजेन्द्रसेविताङ्घ्रिं सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥
परधनपरदारवर्जितानां परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् ।
परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं रघुवरमम्बुजलोचनं प्रपद्ये ॥
स्मितरुचिरविकासिताननाब्जमतिसुलभं सुरराजनीलनीलम्।
सितजलरुहचारुनेत्रशोभं रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥
हरिकमलजशंभुरूपभेदात्त्वमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः ।
रविरिव जलपूरितोदपात्रेष्वमरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥
रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्गं शतपथगोचरभावनाविदूरम् ।
यतिपतिहृदये सदा विभातं रघुपतिमार्तिहरं प्रभुं प्रपद्ये ॥
इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः ।
उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं पदम् ॥
शृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् ।
स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥
इति राघवभाषितं तदा श्रुतवान् हर्षसमाकुलो द्विजः।
रघुनन्दनसाम्यमास्थितः प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम् ॥