{"_id":"112c93e6-4826-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"radha-krishna-banke-bihari-vrindavan","type":"story","status":"publish","title_hn":"राधा कृष्णा का युगल रूप हैं बांके बिहारी ","category":{"title":"Religion","title_hn":"धर्म","slug":"religion"}}
राधा कृष्णा का युगल रूप हैं बांके बिहारी
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
Updated Mon, 17 Dec 2012 02:15 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आज वृंदावन के बांके बिहारी
विज्ञापन
मंदिर में बांके बिहारी का प्रकटोत्सव मनाया जा रहा है। मार्गशीर्ष मास की पंचमी
तिथि को बिहारी जी के प्रकट होने के कारण इस दिन को बिहारी पंचमी के नाम से भी जाना
जाता है। बांके बिहारी के प्रकट होने के संदर्भ में कथा है कि संगीत सम्राट तानसेन
के गुरू स्वामी हरिदास जी भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इन्होंने अपने संगीत
को भगवान को समर्पित कर दिया था। वृंदावन में स्थित श्री कृष्ण की रासस्थली निधिवन
में बैठकर भगवान को अपने संगीत से रिझाया करते थे।
भगवान की भक्त में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण इनके सामने आ जाते। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को लार करने लगते। एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं।
इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदल गये और गाने लगे 'भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे। प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न टरि है तैसे।। अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे। श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।।'
हरिदास जी ने कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूं। आपको लंगोट पहना दूंगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहां से लाकर दूंगा। भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया।
बांके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बांके बिहारी के विग्रह में राधा कृष्ण दोनों ही समाये हुए हैं अतः इनके दर्शन से एक साथ राधा कृष्ण के दर्शन का लाभ मिलता है। मान्यता है कि यह विग्रह साक्षात श्री कृष्ण की प्रतिमूर्ति हैं। जो भी श्री कृष्ण के इस विग्रह का दर्शन करता है उसकी मनोकामन पूरी होती है। भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त के कष्टों को दूर कर देते हैं।
भगवान की भक्त में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण इनके सामने आ जाते। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को लार करने लगते। एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं।
इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदल गये और गाने लगे 'भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे। प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न टरि है तैसे।। अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे। श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।।'
हरिदास जी ने कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूं। आपको लंगोट पहना दूंगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहां से लाकर दूंगा। भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया।
बांके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बांके बिहारी के विग्रह में राधा कृष्ण दोनों ही समाये हुए हैं अतः इनके दर्शन से एक साथ राधा कृष्ण के दर्शन का लाभ मिलता है। मान्यता है कि यह विग्रह साक्षात श्री कृष्ण की प्रतिमूर्ति हैं। जो भी श्री कृष्ण के इस विग्रह का दर्शन करता है उसकी मनोकामन पूरी होती है। भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त के कष्टों को दूर कर देते हैं।