Pitru Paksha 2021: जब मां सीता ने किया दशरथजी का श्राद्ध, किसको मिला श्राप? किसको मिला वरदान ?
शास्त्रों द्वारा मनुष्य के लिए तीन प्रकार के ऋण अर्थात कर्त्तव्य बताए गए हैं- देव ऋण, ऋषि ऋण तथा पितृ ऋण। स्वाध्याय द्वारा ऋषि ऋण से, यज्ञों द्वारा देव ऋण से और श्राद्ध तथा तर्पण द्वारा पितृ ऋण से मुक्ति पाने का रास्ता बतलाया गया है।
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पितृपक्ष प्रारंभ हो चुके हैं, इस दौरान हम अपने पूर्वजों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि हम आपके दर्शाए गए मार्ग का अनुसरण करेंगे। हमारे पूर्वज, देवताओं और हमारे मध्य सेतु का कार्य करते हैं और जब हम पितरों को श्राद्ध के दिनों में तृप्त कर देते हैं, तो देवों तक हमारी प्रार्थना बड़ी सुगमता से पहुंच जाती है। शास्त्रों द्वारा मनुष्य के लिए तीन प्रकार के ऋण अर्थात कर्त्तव्य बताए गए हैं- देव ऋण, ऋषि ऋण तथा पितृ ऋण। स्वाध्याय द्वारा ऋषि ऋण से, यज्ञों द्वारा देव ऋण से और श्राद्ध तथा तर्पण द्वारा पितृ ऋण से मुक्ति पाने का रास्ता बतलाया गया है।
वाल्मिकी रामायण में एक प्रसंग आता है कि माता सीता के द्वारा पिंडदान करने से राजा दशरथ की आत्मा को मोक्ष प्राप्त हुआ था। कथा के अनुसार वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता पितृ पक्ष के समय श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे। वहां श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु श्री राम और लक्ष्मण चले गए। उधर दोपहर हो गई, पिंडदान का समय निकलता जा रहा था और सीताजी की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। उसी समय दशरथजी की आत्मा ने उन्हें आभास कराया की पिंड दान का समय निकला जा रहा है। यह जानकर माता सीता असमंजस में पड़ गईं। समय के महत्व को समझते हुए उन्होंने निर्णय लिया कि वह स्वयं अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान करेंगी। उन्होंने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष और केतकी के फूल को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर विधि-विधान से स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे दिया। इस क्रिया के उपरांत जैसे ही उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की तो राजा दशरथ ने माता सीता का पिंड दान स्वीकार किया। माता सीता इस बात से प्रफुल्लित हुई कि उनकी पूजा दशरथजी ने स्वीकार कर ली है।
पर वह यह भी जानती थी कि प्रभु राम इस बात को नहीं मानेंगे क्योंकि पिंड दान पुत्र के बिना नहीं हो सकता है। थोड़ी देर बाद भगवान राम और लक्ष्मण सामग्री लेकर आए और पिंड दान के विषय में पूछा। तब माता सीता ने कहा कि समय निकल जाने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया। प्रभु राम को इस बात का विश्वास नहीं हो रहा था कि बिना पुत्र और बिना सामग्री के पिंडदान कैसे संपन्न और स्वीकार हो सकता है। तब सीता जी ने कहा कि यह फल्गू नदी, केतकी के फूल और वटवृक्ष मेरे द्वारा किए गए श्राद्धकर्म की गवाही दे सकते हैं। लेकिन फल्गू नदी और केतकी के फूल दोनों ने श्राद्धकर्म करने की बात को झूठा बता दिया। सिर्फ वटवृक्ष ने सत्य बात कही।
तब सीताजी ने दशरथजी का ध्यान करके उनसे ही गवाही देने की प्रार्थना की। दशरथजी ने सीताजी की प्रार्थना स्वीकार कर घोषणा की कि हाँ, सीता ने ही मुझे पिंडदान दिया है और उसे मैंने स्वीकार भी किया है। लेकिन दोनों गवाहों द्वारा झूठ बोलने पर सीता जी ने उनको क्रोधित होकर श्राप दिया कि फल्गू नदी- जा तू सिर्फ नाम की नदी रहेगी, तुझमें पानी नहीं रहेगा। इस कारण फल्गू नदी आज भी गया में सूखी रहती है।और केतकी के फूल को श्राप दिया कि तुझे पूजा में कभी नहीं चढ़ाया जाएगा।
वटवृक्ष को सीता जी का आशीर्वाद मिला कि उसे लंबी आयु प्राप्त होगी और वह दूसरों को छाया प्रदान करेगा तथा पतिव्रता स्त्री तेरा स्मरण करके अपने पति की दीर्घायु की कामना करेगी। यही कारण है कि केतकी के फूल को पूजा पाठ में वर्जित रखा गया है और फल्गू नदी के तट पर नदी में पानी के अभाव में आज भी सिर्फ बालू या रेत से पिंडदान दिया जाता है।