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Pithori Amavasya 2024: कुशाग्रहणी पिठोरी अमावस्या आज, जानिए महत्व और पूजाविधि
Mon, 02 Sep 2024 10:56 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 02 Sep 2024 10:56 AM IST
सार
कुशाग्रहणी पिठोरी अमावस्या, जिसे पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। यह अमावस्या भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को आती है।
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amavasya 2024
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Pithori Amavasya 2024: कुशाग्रहणी पिठोरी अमावस्या, जिसे पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। यह अमावस्या भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि को आती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद अमावस्या तिथि का आरंभ 2 सितंबर को सुबह 5 बजकर 21 मिनट से होगा। इस तिथि का समापन 3 सितंबर को सुबह 7 बजकर 24 मिनट पर होगा। भाद्रपद अमावस्या 2 सिंतबर को है। इस बार भाद्रपद की यह अमावस्या सोमवार के दिन पड़ रही है। सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या सोमवती अमावस्या कहलाती है, इससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन विशेष रूप से माताएं अपनी संतानों की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती हैं। इस अमावस्या का नाम "कुशाग्रहणी" इसलिए पड़ा क्योंकि इस दिन कुश नामक पवित्र घास का संग्रहण और पूजा का विशेष महत्व है।
ऐसे उत्पन्न हुई कुशा
मत्स्य पुराण के एक प्रसंग के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को पुनः स्थापित किया। उसके बाद उन्होंने अपने शरीर पर लगे पानी को झाड़ा तब उनके शरीर से बाल पृथ्वी पर गिरे और कुशा के रूप में बदल गए। इसके बाद कुशा को पवित्र माना जाने लगा। एक अन्य पौराणिक प्रसंग के अनुसार जब सीता जी पृथ्वी में समाई थीं, तो श्री रामजी ने जल्दी से दौड़ कर उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता जी के केश ही आ पाए। यह केशराशि ही कुशा के रूप में परिणत हो गई।
कुशाग्रहणी पिठोरी अमावस्या का महत्व
कुशाग्रहणी पिठोरी अमावस्या का धार्मिक और पौराणिक महत्व अत्यधिक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन मां पार्वती ने 64 योगिनियों के साथ मिलकर भगवान गणेश की पूजा की थी। इसी कारण से इसे पिठोरी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। "पिठोरी" शब्द का अर्थ है आटे की मूर्तियाँ, और इस दिन महिलाएँ आटे से बनी 64 योगिनियों की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा करती हैं। यह दिन पितरों की शांति और परिवार की समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।सनातन धर्म में सभी प्रकार के शुभ या धार्मिक कार्यों और अनुष्ठानों आदि में कुश का उपयोग किया जाता है। किसी को दान देते समय, सूर्यदेव को जल चढ़ाते समय और अन्य कई कार्यों में भी कुश का उपयोग किया जाता है। कहा भी गया है कि कुश के बिना की गई पूजा निष्फल हो जाती है- पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि:। कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया॥ इसीलिए कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन कुश ग्रहण करने का या कुश को इकट्ठा करने का विधान है।
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पूजा विधि
कुशाग्रहणी पिठोरी अमावस्या पर विशेष पूजा विधि का पालन करना चाहिए। इस दिन प्रातःकाल स्नान कर साफ वस्त्र धारण करने के बाद पूजा की शुरुआत करें। सबसे पहले कुश का संग्रहण करें। कुश को मंदिर में या पूजा स्थल पर स्थापित करें। इसके बाद 64 योगिनियों की प्रतीकात्मक मूर्तियाँ बनाएं। इन मूर्तियों की पूजा करते समय भगवान गणेश का ध्यान करें और उनसे अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें। इसके पश्चात पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करें। तर्पण के लिए तांबे या पीतल के पात्र में जल, दूध, तिल और कुश डालकर पितरों का आह्वान करें। पितरों के लिए जल अर्पित करते समय "ॐ पितृभ्यः नमः" मंत्र का जाप करें।
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ऐसे उत्पन्न हुई कुशा
मत्स्य पुराण के एक प्रसंग के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को पुनः स्थापित किया। उसके बाद उन्होंने अपने शरीर पर लगे पानी को झाड़ा तब उनके शरीर से बाल पृथ्वी पर गिरे और कुशा के रूप में बदल गए। इसके बाद कुशा को पवित्र माना जाने लगा। एक अन्य पौराणिक प्रसंग के अनुसार जब सीता जी पृथ्वी में समाई थीं, तो श्री रामजी ने जल्दी से दौड़ कर उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता जी के केश ही आ पाए। यह केशराशि ही कुशा के रूप में परिणत हो गई।
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कुशाग्रहणी पिठोरी अमावस्या का महत्व
कुशाग्रहणी पिठोरी अमावस्या का धार्मिक और पौराणिक महत्व अत्यधिक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन मां पार्वती ने 64 योगिनियों के साथ मिलकर भगवान गणेश की पूजा की थी। इसी कारण से इसे पिठोरी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। "पिठोरी" शब्द का अर्थ है आटे की मूर्तियाँ, और इस दिन महिलाएँ आटे से बनी 64 योगिनियों की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा करती हैं। यह दिन पितरों की शांति और परिवार की समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।सनातन धर्म में सभी प्रकार के शुभ या धार्मिक कार्यों और अनुष्ठानों आदि में कुश का उपयोग किया जाता है। किसी को दान देते समय, सूर्यदेव को जल चढ़ाते समय और अन्य कई कार्यों में भी कुश का उपयोग किया जाता है। कहा भी गया है कि कुश के बिना की गई पूजा निष्फल हो जाती है- पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि:। कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया॥ इसीलिए कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन कुश ग्रहण करने का या कुश को इकट्ठा करने का विधान है।
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पूजा विधि
कुशाग्रहणी पिठोरी अमावस्या पर विशेष पूजा विधि का पालन करना चाहिए। इस दिन प्रातःकाल स्नान कर साफ वस्त्र धारण करने के बाद पूजा की शुरुआत करें। सबसे पहले कुश का संग्रहण करें। कुश को मंदिर में या पूजा स्थल पर स्थापित करें। इसके बाद 64 योगिनियों की प्रतीकात्मक मूर्तियाँ बनाएं। इन मूर्तियों की पूजा करते समय भगवान गणेश का ध्यान करें और उनसे अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें। इसके पश्चात पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करें। तर्पण के लिए तांबे या पीतल के पात्र में जल, दूध, तिल और कुश डालकर पितरों का आह्वान करें। पितरों के लिए जल अर्पित करते समय "ॐ पितृभ्यः नमः" मंत्र का जाप करें।
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