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Parama Ekadashi Vrat Katha: ब्राह्मण सुमेध और पवित्रा पर हुई भगवान विष्णु की कृपा, पढ़ें संपूर्ण व्रत कथा
Thu, 11 Jun 2026 06:31 AM IST
Shweta Singh
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
Published by: Shweta Singh
Updated Thu, 11 Jun 2026 06:31 AM IST
सार
धन, सुख-समृद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाली परमा एकादशी की संपूर्ण कथा पढ़ें। जानें इस पावन व्रत का महत्व और धार्मिक लाभ।
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परमा एकादशी 2026
- फोटो : amar ujala
विस्तार
Parama Ekadashi Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। वैसे तो वर्षभर में आने वाली सभी एकादशियों का अपना अलग महत्व होता है, लेकिन पुरुषोत्तम मास में पड़ने वाली परमा एकादशी को विशेष फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजा और भगवान विष्णु का स्मरण करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है, आर्थिक कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में परमा एकादशी व्रत को अत्यंत पुण्यदायक और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है।
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परमा एकादशी व्रत कथा
अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी मानी गई है। इसके व्रत और कथा के श्रवण से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होते हैं तथा उसे सुख, समृद्धि और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्राचीन समय में कांपिल्य नगर में सुमेध नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी पवित्रा के साथ रहता था। दोनों धर्मनिष्ठ, सदाचारी और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। किंतु उनके जीवन में अत्यंत गरीबी थी। घर में भोजन तक का अभाव रहता था। कई-कई दिन उन्हें भूखे रहकर बिताने पड़ते थे।
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ब्राह्मण सुमेध अपनी पत्नी की दशा देखकर अत्यंत दुःखी रहता था। वह सोचता था कि किसी दूसरे देश में जाकर धन कमाए, जिससे परिवार का पालन-पोषण ठीक प्रकार से हो सके। एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा, "मैं परदेश जाकर धन अर्जित करना चाहता हूँ, क्योंकि यहां रहने से हमारी दरिद्रता समाप्त नहीं होगी।"
यह सुनकर पवित्रा ने विनम्रता से कहा, "हे स्वामी! मनुष्य को वही प्राप्त होता है जो उसके पूर्वजन्मों के कर्मों से निर्धारित होता है। यदि भाग्य में धन लिखा होगा तो वह यहीं मिल जाएगा। परदेश जाने से मुझे आपसे वियोग का दुःख सहना पड़ेगा। इसलिए आप यहीं रहकर भगवान की भक्ति करें।" पत्नी की बात सुनकर सुमेध ने परदेश जाने का विचार त्याग दिया। दोनों पति-पत्नी जैसे-तैसे जीवन व्यतीत करने लगे।
एक दिन उनके घर महान तपस्वी कौण्डिन्य ऋषि पधारे। घर में कुछ भी न होते हुए भी पवित्रा ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ उनका सत्कार किया। उसने यथाशक्ति भोजन और सेवा का प्रबंध किया। ऋषि उनकी सेवा-भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए। जब ऋषि भोजन करके विश्राम करने लगे, तब पवित्रा ने उनके चरणों में प्रणाम कर कहा, "भगवन्! हम अत्यंत निर्धन हैं। कृपया ऐसा कोई व्रत या उपाय बताइए जिससे हमारी दरिद्रता दूर हो जाए और हमारा कल्याण हो।"
कौण्डिन्य ऋषि ने कहा, "हे साध्वी! अधिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली परमा एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे धन, वैभव तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।"
ऋषि ने आगे बताया कि इस एकादशी के साथ पाँच दिनों तक किए जाने वाले पंचरात्रि व्रत का भी विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि भगवान विष्णु की पूजा, जप, दान और उपवास करने से मनुष्य का जीवन सफल हो जाता है।\
ऋषि के उपदेश के अनुसार सुमेध और पवित्रा ने परमा एकादशी का व्रत किया। उन्होंने पूरे मन से भगवान विष्णु का पूजन किया, रात्रि में जागरण किया और द्वादशी के दिन विधिपूर्वक पारण किया। व्रत के प्रभाव से शीघ्र ही उनकी दरिद्रता दूर होने लगी। उन्हें धन, अन्न और सुख-समृद्धि प्राप्त हुई। समाज में उनका सम्मान बढ़ा और उनका जीवन आनंदमय हो गया। अंत समय में दोनों को भगवान विष्णु के धाम की प्राप्ति हुई।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।