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जिस व्रत के पुण्य से भीमसेन को मिला स्वर्ग में स्थान
राकेश/इंटरनेट डेस्क
Updated Tue, 18 Jun 2013 04:01 PM IST
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ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह एकादशी व्रत बहुत ही कठिन माना जाता है क्योंकि इस समय तेज गर्मी पड़ती है। इस पर व्रत के दौरान पानी पीने की भी मनाही रहती है। व्रती चाहे तो जल से केवल आचमन कर सकता है।
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इस वर्ष यह एकादशी 19 तारीख और 20 तारीख को है। लेकिन जो लोग व्रत रखना चाहते हैं उन्हें 20 जून को व्रत रखना चाहिए। 19 तारीख को एकादशी 8 बजकर 45 मिनट से शुरू हो रही है। शास्त्रों के अनुसार जिस दिन एकादशी तिथि में सूर्योदय होता है उसी दिन व्रत रखना चाहिए। भले ही उस दिन कुछ समय के लिए ही एकादशी तिथि हो।
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निर्जला एकादशी व्रत कथा
निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं क्योंकि यही एक मात्र एकादशी है जिसे भीमसेन ने किया था। इस एकादशी के विषय में कथा है कि एक बार भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास से कहा कि दौपदी एवं मेरे सभी भ्राता सभी एकादशी का व्रत रखते हैं। लेकिन मैं भूखा नहीं रह सकता। आप कोई उपाय बताएं जिससे मेरी भी मुक्ति हो सके।
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भीम के प्रश्न को सुनकर वेदव्यास ने कहा कि तुम सभी एकादशी नहीं कर सकते तो ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी करो। इस दिन दोनों समय भोजन और जल का त्याग करना। इस एकादशी के व्रत से सभी एकादशी का पुण्य मिल जाएग और तुम्हें स्वर्ग में स्थान मिल जाएगा। भीमसेन ने इस एकादशी का व्रत रखा और इस दिन से यह भीमसेनी एकादशी कहलाने लगी।
व्रत का महत्व
कहा जाता है कि मृत्यु के समय जब यमराज शरीर से प्राण निकालते हैं तब व्यक्ति को बहुत कष्ट होता है। जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखता व्यक्ति को मृत्यु काल में इस कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता। इस एकादशी के व्रत से सभी तीर्थों में स्नान का पुण्य मिल जाता है। व्रत करने के बाद दूसरे दिन व्यक्ति को ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा एवं दान देना चाहिए। इससे करोड़ों गाय के दान का पुण्य मिलता है।