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यहां अजान के साथ गूंजता है मंदिर की घंटी का स्वर

Wed, 10 Apr 2013 02:16 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Wed, 10 Apr 2013 02:16 PM IST
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navchandi mele meerut

हिन्दू और मुसलमानों के बीच आपसी प्रेम और सद्भाव की भावना का जीता-जागता प्रमाण उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में देखने को मिलता है। मेरठ में हर साल होली के बाद दूसरे रविवार को एक मेला लगता है जिसे नवचंदी का मेला कहते हैं। यह मेला 7 अप्रैल से शुरू हो गया है।

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यहां पर देवी नौचंडी का मंदिर है जिसके विषय में माना जाता है कि इसकी स्थापना रावण और उनकी पत्नी मंदोदारी ने की थी। इन्होंने ही यहां नवरात्र में देवी की पूजा की शुरूआत की थी।
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1857 तक यहां सिर्फ एक दिन का मेला लगता था। लेकिन साल दर साल मेले की अवधि बढ़ती गयी और अब यहां एक महीने का मेला लगता है। मेरठ और आस-पास के क्षेत्रों में इस मेले को लेकर लोगों में खासा उत्साह देखने को मिलता है। इस मेले की खूबी है कि इसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही साथ-साथ जोश और उत्साह से शरीक होते हैं।
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इसकी वजह यह है कि यहां बाले शाह की मजार और नौचंडी देवी का मंदिर आस-पास है। नौचंडी देवी के विषय में मान्यता है कि यहां पर देवी सती का उरू भाग गिरा था इसलिए यह शक्तिपीठ के समान ही पुण्य स्थल है।

ग्यारहवी शताब्दी में अलाऊदीन खिलजी के सेनापति सैयद सलार मसूद ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया। स्थानीय लोगों ने इनका डटकर मुकाबला किया। नौचंडी देवी के मंदिर के पुजारी की बेटी ने सैयद सलार मसूद से युद्घ किया। इसने अपनी तलवार से सैयद सलार मसूद की उंगली काट दी।

कहते हैं कि इसके बाद सेनापति सैयद सलार मसूद का मन युद्ध से दूर हो गया और सेनापति पद छोड़कर फकीर बन गया और बाले शाह के नाम से जाना गया। बहराईच क्षेत्र में इन्होंने शरीर का त्याग किया। इसके बाद लोगों ने उस स्थान पर इनका मजार बनाया जहां इनकी उंगली कटकर गिरी थी। हर साल इनकी मजार पर नवरात्रा के दौरान उर्स का मेला लगने लगा।


यहां एक तरफ मजार पर बल्ले शाह की शान में कव्वाली गयी जाती है तो दूसरी ओर नौचंडी देवी के जयकारे गूंजते हैं। एक तरफ मंदिर की घंटी गूंजती है तो दूसरी ओर अजान का स्वर इसमें आध्यात्मिक रस घोलता है। हिन्दू और मुसलमानों के बीच जो सद्भाव और अध्यात्म का रूप नौचंदी मेला में दिखता है वह अन्य कहीं देखने को नहीं मिलता है। 

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