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जिस व्रत से प्रेत योनि और भयंकर पापों से मुक्ति मिलती है

Sat, 31 May 2014 07:20 PM IST
Updated Sat, 31 May 2014 07:20 PM IST
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Lent to salvation

पद्मपुराण में एक ऐसे व्रत का उल्लेख किया गया है जिससे प्रेत योनी में गया व्यक्ति भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है। अगर अपने जीवन काल में मनुष्य इस व्रत को करता रहे तो उसे प्रेत योनी में जाने का कष्ट नहीं उठाना पड़ता है। इस व्रत का नाम है अचला एकादशी।

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ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष में आने वाली इस एकादशी को अपरा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी के दिन भगवान श्री कृष्ण के साथ बलदेव जी की पूजा करने का भी विधान है।
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शास्त्रों में कहा गया है कि जो भी व्यक्ति इस दिन व्रत रखकर कृष्ण और बलदेव जी की पूजा करता है उसे अपने जीवन काल में किए कई भयंकर पापों से भी मुक्ति मिल जाती है।

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अपरा एकादशी व्रत कथा महत्व

Lent to salvation

अपरा एकादशी व्रत के विषय में कथा है कि प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। इनके छोटा भाई वज्रध्वज जो पापी और अधर्मी था। इसने एक एक रात अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी। इसके बाद महीध्वज के मृत शरीर को जंगल में ले जाकर पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ दिया।

अकाल मृत्यु होने के कारण धर्मात्मा राजा को भी प्रेत यानि में जाना पड़ा। राजा प्रेत रुप में पीपल पर रहने लगा और उस रास्ते से आने जाने वालों को परेशान करने लगा। एक दिन सौभाग्य से उस रास्ते धौम्य नामक ॠषि गुजरे। ऋषि ने जब प्रेत को देखा तो अपने तपोबल से सब हाल जान लिया।

ॠषि ने राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने का विचार किया और प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। संयोग से उस समय ज्येष्ठ मास की एकादशी तिथि भी थी। ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत किया और एकदशी के पुण्य को राजा को अर्पित कर दिया। इस पुण्य से राजा प्रेत योनि से मुक्त हो गया और दिव्य देह धारण करके स्वर्ग चला गया।

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