कुंभ मेला 2019: अघोरी क्या वाकई बेहद डरावने होते हैं? जानें इनके बारे में सबकुछ
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गंगा नदी में डुबकी लगाने के लिए देश-विदेश से संगम किनारे पहुंचे तमाम संप्रदायों के हजारों साधु इकट्ठा हुए हैं। इन्हीं साधुओं में एक वर्ग ऐसा भी है जिसे लेकर आम जनमानस के बीच भय की स्थिति बनी रहती है। साधुओं के इस वर्ग को 'अघोरी समुदाय' कहते हैं। ऐसी अवधारणा है कि अघोरी श्मशान घाट में रहते हैं, जलती लाशों के बीच खाना खाते हैं और वहीं सोते हैं। इस तरह की बातें भी प्रचलित हैं कि अघोरी नग्न घूमते हैं, इंसानी मांस खाते हैं, खोपड़ी में खाना खाते हैं और दिन-रात गांजा पीते रहते हैं।
कौन होते हैं अघोरी ?
लंदन में 'स्कूल ऑफ अफ्रीकन एंड ओरिएंटल स्टडीज़' में संस्कृत पढ़ाने वाले जेम्स मैलिंसन बताते हैं, "अघोर दर्शन का सिद्धांत यह है कि आध्यात्मिक ज्ञान हासिल करना है और ईश्वर से मिलना है तो शुद्धता के नियमों से परे जाना पड़ेगा।" ऑक्सफ़र्ड में पढ़ाई करने वाले मैलिंसन एक महंत और गुरु भी हैं लेकिन उनके समुदाय में अघोरी समुदाय की प्रक्रियाएं वर्जित हैं।
कई अघोरी साधुओं के साथ बातचीत के आधार पर मैलिंसन कहते हैं, "अघोरियों का तरीका ये है कि स्वाभाविक वर्जनाओं का सामना करके उन्हें तोड़ दिया जाए। वे अच्छाई और बुराई के सामान्य नियमों को ख़ारिज करते हैं। आध्यात्मिक प्रगति का उनका रास्ता अजीबोगरीब प्रक्रियाओं, जैसे कि इंसानी मांस और अपना मल खाने जैसी चीज़ों से होकर गुज़रता है। लेकिन वो ये मानते हैं कि दूसरों द्वारा त्यागी गई इन चीज़ों का सेवन करके वे परम चेतना को प्राप्त करते हैं।"
अघोरियों का इतिहास
अगर अघोरी संप्रदाय के इतिहास की बात करें तो ये शब्द 18वीं शताब्दी में चर्चा का विषय बना। लेकिन इस संप्रदाय ने उन प्रक्रियाओं को अपनाया है जिसके लिए कपालिका संप्रदाय कुख्यात हुआ करता था। कपालिका संप्रदाय में इंसानी खोपड़ी से जुड़ी तमाम परंपराओं के साथ-साथ इंसान की बलि देने की भी प्रथा थी। लेकिन अब ये संप्रदाय अस्तित्व में नहीं है। हालांकि, अघोर संप्रदाय ने कपालिका संप्रदाय की तमाम चीजों को अपने जीवन में शामिल कर लिया है।
हिंदू समाज में ज़्यादातर पंथ और संप्रदाय तय नियमों के मुताबिक चलते हैं। संप्रदायों को मानने वाले संगठनात्मक ढंग से नियमों का पालन करते हैं। आम समाज से सरोकार बनाकर रखते हैं। लेकिन अघोरियों के साथ ऐसा नहीं है। इस संप्रदाय से जुड़े साधु अपने घर वालों से संपर्क खत्म कर देते हैं और बाहर वालों पर भरोसा नहीं करते हैं।
ऐसा माना जाता है कि ज्यादातर अघोरी तथाकथित छोटी जातियों से आते हैं। मैलिंसन बताते हैं, "अघोरी संप्रदाय में साधुओं के बौद्धिक कौशल में काफ़ी अंतर देखा जाता है। कुछ अघोरी इतनी तीक्ष्ण बुद्धि के थे कि राजाओं को अपनी राय दिया करते थे। एक अघोरी तो नेपाल के एक राजा का सलाहकार भी रहे हैं।"
अघोरियों पर एक किताब 'अघोरी: अ बायोग्राफ़िकल नॉवल' लिखने वाले मनोज ठक्कर बताते हैं कि लोगों के बीच उनके बारे में भ्रामक जानकारी ज़्यादा है। वह बताते हैं, "अघोरी बेहद ही सरल लोग होते हैं जो प्रकृति के साथ रहना पसंद करते हैं। वह किसी तरह की कोई डिमांड नहीं करते हैं।"
"वह हर चीज को ईश्वर के अंश के रूप में देखते हैं। वह न तो किसी से नफ़रत करते हैं और न ही किसी चीज को खारिज करते हैं। इसीलिए वे किसी जानवर और इंसानी मांस के बीच भेदभाव नहीं करते हैं। इसके साथ ही जानवरों की बलि उनकी पूजा पद्धति का एक अहम अंग है।" "वे गांजा पीते हैं लेकिन नशे में रहने के बाद भी अपने बारे में उन्हें पूरा ख्याल रहता है"
अघोरी संप्रदाय को मानने वाले काफी कम लोग
मैलिंसन और ठक्कर दोनों ही विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे काफी कम लोग हैं जो अघोरी पद्धति का सही ढंग से पालन कर रहे हैं। वे मानते हैं कि कुंभ में जुटने वाले साधु अक्सर स्वघोषित अघोरी होते हैं और किसी तरह की कोई दीक्षा नहीं लेते हैं। इसके साथ ही कुछ लोग अघोरियों की तरह वेश बनाकर पर्यटकों का मनोरंजन करते हैं।
संगम में स्नान करने आए लोग उन्हें भोजन और पैसे देते हैं। हालांकि, ठक्कर मानते हैं, "अघोरी किसी से पैसे नहीं लेते हैं और वह सभी के कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं। वे इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि कोई संतान-प्राप्ति के लिए आशीर्वाद मांग रहा है या घर बनाने के लिए।"
किस भगवान की पूजा करते हैं अघोरी
अघोरी सामान्यत: हिंदू देवता शिव की पूजा करते हैं, जिन्हें विनाश का देवता कहा जाता है। इसके साथ ही वह शिव की पत्नी शक्ति की भी पूजा करते हैं। ठक्कर कहते हैं, "ज्यादातर लोग मौत से डरते हैं। श्मशान घाट मौत का प्रतीक होते हैं। लेकिन अघोरियों की शुरुआत यहीं से होती है। वे लोग आम लोगों के मूल्यों और नैतिकता को चुनौती देना चाहते हैं।"
समाज सेवा में शामिल
अघोरी साधुओं को समाज में सामान्यता: स्वीकार्यता हासिल नहीं है। लेकिन बीते कुछ सालों में इस समुदाय ने समाज की मुख्य धारा में शामिल होने की कोशिश की है। कई जगहों पर अघोरियों ने लेप्रसी (कोढ़) को रोकने के लिए अस्पतालों का निर्माण किया है और उनका संचालन भी कर रहे हैं।
मिनेसोटा आधारित मेडिकल कल्चरल और एंथ्रोपॉलिजिस्ट रॉन बारेट ने इमोरी रिपोर्ट के साथ इंटरव्यू में बताते हैं, "अघोरी उन लोगों के साथ काम कर रहे हैं जिन्हें समाज में अछूत समझा जाता है। एक तरह से लेप्रसी ट्रीटमेंट क्लीनिकों ने श्मशान घाट की जगह ले ली है। और अघोरी बीमारी के डर पर जीत हासिल कर रहे हैं।"
सामान्यत: ये माना जाता है कि अघोरी समाज से अलग-थलग रहते हैं। लेकिन, कुछ अघोरी साधु फोन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा सार्वजनिक स्थानों पर जाते समय कुछ अघोरी साधु कपड़े भी पहनते हैं।
गे सेक्स की स्वीकृति नहीं
दुनिया भर में एक अरब से भी ज्यादा लोग हिंदू धर्म का पालन करते हैं। लेकिन ये सभी लोग एक तरह की मान्यताओं पर भरोसा नहीं करते हैं। हिंदू धर्म में कोई पैगंबर या किताब नहीं है जिसका सभी लोग पालन करते हों। ऐसे में अघोरियों की संख्या का आकलन लगाना मुश्किल है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अघोरियों की संख्या हजारों में होनी चाहिए।
कुछ अघोरियों ने सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार किया है कि उन्होंने मृत शरीरों के साथ सेक्स किया है। लेकिन वे गे सेक्स को स्वीकार्यता नहीं देते हैं। ख़ास बात यह है कि जब अघोरियों की मौत हो जाती है तो उनके मांस को दूसरे अघोरी नहीं खाते हैं। उनका सामान्य तौर पर दफनाकर या जलाकर अंतिम संस्कार किया जाता है।