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Kartik Purnima 2025: त्रिपुरासुर वध से मत्स्य अवतार तक, जानिए कार्तिक पूर्णिमा से जुड़ी कथाएं और परंपराएं

Wed, 05 Nov 2025 06:08 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 05 Nov 2025 06:08 AM IST
सार

कार्तिक पूर्णिमा शुभ मुहूर्त  के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का संहार किया था। इस विजय से प्रसन्न होकर देवताओं ने उनकी स्तुति की और भगवान विष्णु ने उन्हें ‘त्रिपुरारी’ नाम से संबोधित किया।

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Kartik Purnima 2025 Importance Significance Dev Diwali Lord Shiva And Tripurasur Story In Hindi
कार्तिक पूर्णिमा - फोटो : amar ujala

विस्तार

Kartik Purnima 2025: सनातन परंपराओं में कार्तिक पूर्णिमा का दिन अत्यंत पवित्र माना गया है। यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी दिव्य ऊर्जा का संचार करता है। इस तिथि पर स्नान, दान और दीपदान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन देवताओं ने स्वयं दीपावली मनाई थी, इसलिए इसे देव दीपावली कहा जाता है। पंचांग के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा की तिथि 4 नवंबर को रात 10 बजकर 36 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 5 नवंबर को शाम 6 बजकर 48 मिनट पर होगा।
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त्रिपुरासुर का वध-शिव बने त्रिपुरारी
कार्तिक पूर्णिमा शुभ मुहूर्त  के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का संहार किया था। इस विजय से प्रसन्न होकर देवताओं ने उनकी स्तुति की और भगवान विष्णु ने उन्हें ‘त्रिपुरारी’ नाम से संबोधित किया। कहा जाता है कि प्रदोष काल में महादेव ने अर्धनारीश्वर रूप धारण कर त्रिपुरासुर का वध किया। इसी दिन देवताओं ने काशी में दीपावली मनाई, जो आज भी देव दीपावली के रूप में प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन काशी में दीपदान करने से पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त होता है।
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मत्स्य अवतार-वेदों की रक्षा हेतु विष्णु का दिव्य रूप
भगवान विष्णु के दस अवतारों में पहला अवतार मत्स्य अवतार माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रलय काल में जब समस्त सृष्टि जल में विलीन हो गई, तब भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन मत्स्य रूप धारण कर वेदों की रक्षा की थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस मास में नारायण मत्स्य रूप में जल में निवास करते हैं और पूर्णिमा के दिन बैकुंठ धाम लौट जाते हैं।
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पांडवों का दीपदान-पितरों की तृप्ति के लिए गंगा स्नान
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव अपने परिजनों की मृत्यु से अत्यंत दुखी थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें पितरों की आत्मा की शांति हेतु उपाय बताया। इस पर पांडवों ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन गढ़ मुक्तेश्वर में पवित्र गंगा स्नान कर तर्पण और दीपदान किया। तब से ही गढ़ मुक्तेश्वर में इस पर्व पर स्नान और दीपदान की परंपरा प्रचलित हुई।

देवी तुलसी का विवाह-शालिग्राम के संग दिव्य मिलन
पौराणिक कथा के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवी तुलसी का भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप से विवाह हुआ था। यह विवाह कार्तिक पूर्णिमा तक मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करने से अनेक गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है। तुलसी विवाह के पश्चात ही विवाहोत्सवों का शुभारंभ भी होता है।

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ब्रह्मा जी का अवतरण-पुष्कर तीर्थ का दिव्य महत्व
कार्तिक पूर्णिमा के दिन ब्रह्मा जी का अवतरण पवित्र पुष्कर सरोवर में हुआ था। इसी कारण यह स्थान आज भी ब्रह्मा जी की आराधना का प्रमुख केंद्र है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु पुष्कर में स्नान कर ब्रह्मा मंदिर में पूजा-अर्चना और दीपदान करते हैं। ऐसा करने से देव कृपा और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

देवताओं की दीपावली-लक्ष्मी-नारायण की महाआरती का दिन
कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागे। उनके जागरण पर समस्त देवी-देवताओं ने हर्ष मनाया और लक्ष्मी-नारायण की महाआरती कर दीप प्रज्वलित किए। यह दिन देवताओं की दीपावली के रूप में मनाया जाता है। इसी परंपरा के अनुसार मनुष्य भी इस दिन दीपदान, व्रत-पूजन कर देव दीपावली का उत्सव मनाते हैं।
 
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