Kartik Purnima 2021: इस दिन है कार्तिक मास की पूर्णिमा, इन कार्यों को करने से प्रसन्न होंगी मां लक्ष्मी
इस बार कार्तिक मास की पूर्णिमा 19 नवंबर 2021 दिन शुक्रवार को पड़ रही है। यदि इस दिन आप कुछ कार्य करते हैं तो आपको मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है। जिससे आपके घर में सुख समृद्धि व खुशहाली आती है। मां लक्ष्मी की कृपा से धन की प्राप्ति होती है।
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कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान करने की प्रथा है इसलिए बहते पानी में दीपदान जरूर करें। अगर ऐसा संभव नहीं है तो शिवजी के मंदिर में शिवलिंग पर शहद, गंगाजल, कच्चा दूध और पानी चढ़ाएं, फिर देसी घी के 5 दीपक जलाएं और यह दीपक शिवपरिवार के नाम से जलाएं। इसके साथ ही पीपल के वृक्ष के नीचे सुबह-शाम दीपक जलाना न भूलें। ऐसा करने से ग्रहदोष दूर होते हैं और घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
अगर आपकी कुंडली में चंद्रमा प्रतिकूल स्थिति में है तो चावल, दही, दूध आदि सफेद चीजों का दान करें, क्योंकि यह सभी चीजें चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करती हैं। ऐसा करने से चंद्रमा शुभ प्रभाव देता है और स्वास्थ्य व नेत्र उत्तम रहते हैं। वहीं शाम के समय चन्द्र देव को गंगालजल अर्पित कर खीर, मिश्री व मखाने का भोग लगाएं।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन माता तुलसी बैकुंठ धाम गई थीं और तुलसी को माता लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। इसलिए सुबह-शाम तुलसी के सामने दीपदान करें और उनकी आरती उतारें। हर रोज सुबह उनकी आरती करने के बाद जड़ की मिट्टी को अपने माथे पर लगाएं। ऐसा करने से आपको हर क्षेत्र में सफलता मिलेगी और हर समस्या से मुक्ति मिलेगी।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। इसलिए इस दिन सत्यनारायण की कथा, विष्णु पुराण, विष्णु सहस्त्रनाम या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। साथ ही विष्णु और माता लक्ष्मी को हलवा, खीर, मखाने, सिघांड़े आदि का भोग लगाएं। ऐसा करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और धन संबंधित समस्याओं का अंत होता है, साथ ही धन का मार्ग प्रशस्त होता है।
कार्तिक पूर्णिमा का पौराणिक महत्व
कार्तिक पूर्णिमा सिर्फ स्नान व दान के लिये ही नहीं बल्कि पौराणिक इतिहास के लिहाज से भी बहुत महत्व रखती है। पौराणिक ग्रंथों में बताया गया है कि इस दिन भगवान महादेव ने त्रिपुरासुर नामक असुर का वध किया था। इसी कारण इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। एक और पौराणिक उल्लेख के अनुसार बताया जाता है कि भगवान श्री हरि ने महाप्रलय के पूर्व एक मछली का अवतार लिया। उन्होंने अपने भक्त सत्यव्रत मनु को सूचित किया कि ठीक सात दिन बात महाप्रलय होने वाली है इसलिये वह समस्त महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों, बीजों, पशु-पक्षियों व सप्तऋषियों को इकट्ठा कर श्री हरि द्वारा भेजी नाव पर लेकर आये। इसी समय भगवान ब्रह्मा वेदों का ज्ञान दे रहे थे जिसे हयग्रीव ने चुरा लिया था। श्री मत्स्य नारायण ने ही हयग्रीव का उद्धार करते हुए वेदों के ज्ञान को वापस सुरक्षित रूप से ब्रह्मा जी को सौंप दिया। यही कारण है कि कार्तिक पूर्णिमा पर भगवान विष्णु की पूजा का भी विशेष महत्व होता है।
पूर्णिमा स्नान व दान का महत्व
कार्तिक पूर्णिमा पर कुशा स्नान व स्नान के बाद दान करने का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि स्नान के समय हाथ में कुशा रखनी चाहिए। जिन जातकों के लिये गंगा में स्नान करना संभव नहीं हो पा रहा हो वह स्वच्छ जल में गंगाजल मिलाकर भी स्नान कर सकते हैं। स्नान के पश्चात विष्णु भगवान की पूजा करें। गरीब व जरुरतमंद लोगों की मदद करें, दान दें, मौसमी फल, उड़द की काली दाल, चावल आदि भी दान किये जा सकते हैं। किसी भूखे को भोजन करवाना भी इस दिन श्रेष्ठ रहता है। चंद्रमा चूंकि इस दिन अपने पूर्ण रूप में होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचरण करता है इसलिये चंद्रमा को अर्घ्य भी जरूर देना चाहिए।
कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली के रूप में भी मनाया जाता है | देव दीपावली की पृष्ठभूमि पौराणिक कथाओं से भरी हुई है। इस कथा के मुताबिक भगवान शंकर ने देवताओं की प्रार्थना पर सभी को उत्पीड़ित करने वाले राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया था। इस खुशी में देवताओं ने दीपावली मनाई, जिसे आगे चलकर देव दीपावली के रूप में मान्यता मिली।