हिन्दू धर्म में देवों के समान ही पितरों को भी विशेष स्थान दिया गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवों से पहले पितरों की पूजा का विधान है। हिन्दू धर्म में जातक के जन्म से लेकर मृत्यु 16 संस्कार हैं औ सबसे अंत में मृत्यु उपरांत व्यक्ति का अंतिम संस्कार कर दिया जाता है।
Pitru Paksha 2019: क्या है पितृ पक्ष का महत्व? क्यों जरूरी है पुरखों का श्राद्ध
मान्यताओं के अनुसार जातक की मृत्यु के पश्चात भी कही ऐसे कार्य होते है जो रिश्तेदारों को, विशेषकर संतान को करने होते हैं। श्राद्ध कर्म भी उन्ही कर्मों में से एक है। श्राद्ध कर्म का हिन्दू मान्यताओं के अनुसार महत्व बहुत है। हिन्दू परम्पराओं के अनुसार पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का ये सबसे बड़ा पर्व है।
हर वर्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरे पखवाड़े में श्राद्ध कर्म करने का विधान है। इस वर्ष पितृ पक्ष का समय 13 सितम्बर से 28 सितम्बर का है।
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हिन्दू ग्रंथो में इस बात का वर्णन है की देवों से पहले पितरों की पूजा होनी चाहिए। ऐसा वर्णन हिन्दू ग्रंथों में है की जब पितृ खुश होंगे तभी देव भी खुश होंगे। भारतीय संस्कृति में हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया जाता की अपने से बड़ों का हमेशा सम्मान किया जाए और मरोणोपरांत् श्राद्ध कर्म किए जाए। मान्यता यह है की अगर श्राद्ध विधि अनुसार नहीं किए जाए तो जातक की आत्मा भटकते रहती है, जातक को मुक्ति नहीं मिल पाती।
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ज्योतिषशास्त्र के अनुसार भी पितृ पक्ष मे श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने को बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। पितरों का श्रद्धापूर्वक श्राद्ध नहीं किया जाए तो कही तरह के दोष, कही तरह की रुकावटें जीवन में आने लगती हैं। जैसे काम मे रुकावट आना, धन हानि होना, संतान की परेशानी होना। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पितरों की मुक्ति ही पितृदोष से दूर रख सकती है।
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भारतीय पौराणिक कथाओं में पितृ पक्ष मे श्राद्ध करने के विशेष फल बताए गए है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पितृ पक्ष में पूर्वज की मृत्यु की तिथि में ही उनका श्रद्धा करना उचित बताया गया है। अगर किसी पूर्वज की तिथि याद ना हो तो उसका श्राद्ध आश्विन अमावस्या के दिन किया जाना चाहिए।
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