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नित्य काशी में स्नान करते हैं भगवान दत्तात्रेय
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
Updated Thu, 27 Dec 2012 01:00 PM IST
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आज भगवान दत्तात्रेय की
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जयंती है। दत्तात्रेय ऋषि अत्रि और देवी अनुसूया के पुत्र हैं। ब्रह्माण्ड पुराण की
कथा के अनुसार देवी अनुसूया के पतिव्रत से प्रसन्न होकर त्रिदेव यानी ब्रह्मा,
विष्णु एवं महेश ने उनके घर पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। इस वरदान के
फलस्वरूप ब्रह्मा चन्द्रमा रूप में, शिव जी ऋषि दुर्वासा के रूप में तथा भगवान
विष्णु दत्तात्रेय के रूप में अवतरित हुए। श्रीमद्भागवत में भी इस कथा का उल्लेख
मिलता है।
चन्द्रमा एवं ऋषि दुर्वासा ने तपस्या पर जाने से पूर्व अपना तेज और बल दत्तात्रेय को प्रदान कर दिया। इसके कारण दत्तात्रेय में ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश एकाकार हो गये। पुराण के अनुसार भगवान दत्तात्रेय जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हैं और आज भी योगबल से संसार में भ्रमण करते हैं। मान्यता है कि दत्तात्रेय प्रतिदिन प्रातः काशी में गंगा-स्नान करते हैं। कोल्हापुर में नित्य जप और माहुरीपुरमें भिक्षा ग्रहण करते हैं। सह्याद्रि की कन्दराओं में यह विश्राम किया करते हैं। इसी मान्यता के कारण काशी स्थिति मणिकर्णिकाघाट की दत्तपादु को इनके भक्त पूजनीय स्थान मानते हैं।
तन्त्र शास्त्रके मूल ग्रन्थ रुद्रयामल के हिमवत् खण्ड में इस बात का उल्लेख किया गया है कि दत्तात्रेय भगवान सच्चे मन से ध्यान करने मात्र से भक्तों के कष्ट दूर करते हैं। इसलिए इन्हें स्मृतिगामी भी कहा जाता है। इनके विषय में मान्यता है कि यह प्रातः काल में ब्रह्मा रूप में रहते हैं। दोपहर में विष्णु रूप में तथा शाम के समय शिव रूप में विराजते हैं।
भगवान दत्तात्रेय की तस्वीरों में उनके साथ एक गाय और चार कुत्ते दिखाये जाते हैं। मान्यता है कि जब यह अनुसूया के घर अवतरित हुए तब धरती ने गाय एवं वेदों ने कुत्ते का स्वरूप धारण कर लिया और अपने संरक्षण के लिए दत्तात्रेय के साथ रहने लगे।
चन्द्रमा एवं ऋषि दुर्वासा ने तपस्या पर जाने से पूर्व अपना तेज और बल दत्तात्रेय को प्रदान कर दिया। इसके कारण दत्तात्रेय में ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश एकाकार हो गये। पुराण के अनुसार भगवान दत्तात्रेय जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हैं और आज भी योगबल से संसार में भ्रमण करते हैं। मान्यता है कि दत्तात्रेय प्रतिदिन प्रातः काशी में गंगा-स्नान करते हैं। कोल्हापुर में नित्य जप और माहुरीपुरमें भिक्षा ग्रहण करते हैं। सह्याद्रि की कन्दराओं में यह विश्राम किया करते हैं। इसी मान्यता के कारण काशी स्थिति मणिकर्णिकाघाट की दत्तपादु को इनके भक्त पूजनीय स्थान मानते हैं।
तन्त्र शास्त्रके मूल ग्रन्थ रुद्रयामल के हिमवत् खण्ड में इस बात का उल्लेख किया गया है कि दत्तात्रेय भगवान सच्चे मन से ध्यान करने मात्र से भक्तों के कष्ट दूर करते हैं। इसलिए इन्हें स्मृतिगामी भी कहा जाता है। इनके विषय में मान्यता है कि यह प्रातः काल में ब्रह्मा रूप में रहते हैं। दोपहर में विष्णु रूप में तथा शाम के समय शिव रूप में विराजते हैं।
भगवान दत्तात्रेय की तस्वीरों में उनके साथ एक गाय और चार कुत्ते दिखाये जाते हैं। मान्यता है कि जब यह अनुसूया के घर अवतरित हुए तब धरती ने गाय एवं वेदों ने कुत्ते का स्वरूप धारण कर लिया और अपने संरक्षण के लिए दत्तात्रेय के साथ रहने लगे।