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धर्म विरूद्घ है पांच पुरूषों से द्रौपदी का विवाह
टीम डिजिटल
Updated Thu, 07 Nov 2013 04:09 PM IST
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पांचों पाण्डव द्रुपद कुमारी द्रौपदी से विवाह करने के लिए उत्सुक थे। इस स्थिति को देखक राजा द्रुपद चिंतित थे। इसी समय महात्मा व्यास राजभवन में पधारे। द्रुपद ने महात्मा व्यास से पूछा "भगवन्! संकरत्व को प्राप्त हुए बिना एक ही स्त्री अनेक पुरूषों की पत्नी किस प्रकार हो सकती है।
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व्यास जी ने उत्तर दिया: "धर्म का तत्व अत्यंत गहन है। वह शास्त्र के आवरण से आच्छादित है। यह धर्म लोक और वेद के विरूद्घ प्रतीत होता है। अतएव इसके विषय में तुम सबका मत मैं पृथक-पृथक सुनना चाहता हूं।"
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द्रुपद बोलेः "द्विजश्रेष्ठ! मेरे मत में तो यह अधर्म है। कारण, यह लोक और वेद, दोनें के विरूद्घ है। ऐसा आचार तो कहीं भी नहीं है कि अनेक पुरूषों की एक पत्नी हो। पूर्ववर्ती महापुरूषों ने भी ऐसे धर्म का आचरण नहीं किया। अतएव विद्वान लोगों को इस धर्म का आचरण किसी अवस्था में भी नहीं करना चाहिए। मैं इस धर्म-विरोधी आचार का विरोध करता हूं।
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युधिष्ठिर बोलेः मेरी बुद्घि कभी अधर्म परायण नहीं होती। और मेरे मानस की प्रवृति इसी प्रकार के विवाह की ओर है। अतएव यह विवाह किसी प्रकार अधर्म नहीं हो सकता। पुराणों में सुना जाता है कि धर्मात्माओं में श्रेष्ठ जटिल नाम की गौतम गोत्रा कन्या ने एक साथ सात ऋषियों के साथ विवाह किया था।
कण्डु ऋषि की पुत्री वार्क्षी ने दस प्रचेताओं के साथ विवाह किया था। हमारी माता ने भी हम लोगों को आदेश दिया है कि हम भिक्षा का मिलकर उपभोग करें। इसलिए हम पांचों भाई इस विवाह-संबंध को परम धर्म मानते हैं।
द्रौपदी विवाह का यह अंश सीता राम गोयल की पुस्त पाण्डवप्रिया पांचाली से लिया गया है। इस पुस्तक में द्रौपदी के जीवन में विभिन्न रूप, चरित्र और पांचों पांडवों के बीच उनकी स्थिति का मार्मिक और धार्मिक रूप से खूबसूरत चित्रण किया गया है।
अर्जुन द्वारा सुभद्रा से विवाह किए जाने पर द्रौपदी के मन में अर्जुन के प्रति रोष। पंच पतियों की पत्नी होने के बावजूद अर्जुन के प्रेम से वंचित होने का भय द्रौपदी को सताना बहुत ही रोमांचित करता है।