नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा क्यों होती है
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आज नवरात्र का दूसरा दिन है। इस दिन मां दुर्गा के नौ रुपों में से ब्रह्मचारिणी रुप की पूजा की जाती है। मां का यह रुप अति सौम्य माना गया है। इस रुप की आराधना करने वाले भक्त की मनोकामना माता जल्दी पूरी कर देती है।
इस रुप में माता के एक हाथों में एक हाथ में कमण्डलु और दूसरे हाथों में जप माला है। इस रुप को देखने मात्र से यह ज्ञात हो जाता है कि माता तपस्वी रुप में विराजमान हैं। माता के तन पर स्वेत रंग का निर्मल वस्त्र है जो उनकी तपस्वी वेष को दर्शाता है।
माता का यह स्वरुप इस बात की प्रेरणा देता है कि आपकी जो भी मनोकामना है वह पूरी हो सकती है बस शर्त यह है कि आपकी लगन सच्ची हो और आपकी तपस्या उस समय तक चलती रहे जब तब आप अपनी मनोकामना पूरी नहीं कर लेते।
माता व्रह्मचारिणी रुप में समझाने का प्रयास कर रही हैं कि उन्होंने ने भी अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए तपस्वी वेष धारण किया था।
माता का नाम ब्रह्मचारिणी क्यों?
भगवाती के दूसरे रुप को ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना जाता है। इसका कारण यह है कि देवी पार्वती ने जब नारद मुनि से अपने पूर्व जन्म की कथा यानी सती के देह त्याग वाली घटना को जाना तब वह भगवान शिव को पति रुप में पाने के लिए व्याकुल हो उठी।
नारद मुनि की सलाह पर देवी पार्वती वन में चली गई और वर्षों तक कठोर तप साधना में लीन हो गई। मां ने शुरु में फल फूल खाए लेकिन धीरे-धीरे फल-फूल का का भी त्याग कर दिया इसके बाद माता केवल शाक खाकर तप करती रही। लेकिन कुछ समय बाद माता ने शाक भी त्याग दिया और सिर्फ हवा पीकर रहने लगी।
माता ने जब शाक और वृक्षों के पत्ते भी खाना त्याग दिया तो संसार में इनका नाम अपर्णा कहलाया। तप से माता का शरीर सूख गया। माता की इस तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न होकर देवी पार्वती को पत्नी रुप में स्वीकार करने का वरदान देना पड़ा।
माता कठोर तप से तीनों लोक जय जयकार करने लगा और माता को ब्रह्मा की तरह तप का आचरण करने वाली मानकर ब्रह्मचारिणी के नाम से संबोधित करने लगा।
नवरात्र के दूसरे दिन मां को प्रसन्न करने का आसान उपाय
नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है इसका कारण यह है कि नवरात्र साधना और उपासना का त्योहार है। देवी ब्रह्मचारिणी साधना और तपस्या की देवी है। इनकी साधना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और की संयम वृद्धि होती है जो नवरात्र उपासना के लिए आवश्यक है।
जो लोग कुण्डली जागृत करने की साधना करते हैं वह अपना मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित करते हैं। चुंकि देवी ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रुप में पाने के लिए तप किया था इसके बाद इनका विवाह शिव से तय हुआ।
इसलिए मान्यता है कि नवरात्र के दूसरे दिन उन कन्याओं को भोजन करवाने से विशेष फल मिलता है जिनका विवाह तय हो चुका हो।
इसदिन मां का ध्यान इस मंत्र से करना चाहिए-
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।