फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   amalaki ekadashi 2021 date timing shubh muhrat importance and ekadashi vrat katha

amalaki ekadashi: सुख-समृद्धि प्रदान करती है अमालकी एकादशी, जानिए तिथि और पौराणिक कथा

Thu, 18 Mar 2021 05:17 PM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Shashi Shashi Updated Thu, 18 Mar 2021 05:17 PM IST
विज्ञापन
amalaki ekadashi 2021 date timing shubh muhrat importance and ekadashi vrat katha
आमलकी एकादशी व्रत की कथा, महत्व और शुभ मुहूर्त (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : lord vishnu (demo pic)

फाल्गुन फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस बार यह एकादशी 25 मार्च 2021 दिन गुरूवार को पड़ रही है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने और भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करने का विधान है। इस एकादशी को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष करने वाला माना गया है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने से माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। अमालकी एकादशी पर व्रत और पूजन करने के साथ ही कथा भी अवश्य पढ़नी चाहिए। तो चलिए जानते हैं अमालकी एकादशी व्रत कथा और शुभ मुहूर्त

विज्ञापन


एकादशी और व्रत पारण का शुभ मुहूर्त
एकादशी तिथि आरंभ - 24 मार्च 2021 को सुबह 10 बजकर 23 मिनट से 
एकादशी तिथि समाप्त - 25 मार्च  2021 को सुबह 09 बजकर 47 मिनट पर
एकादशी व्रत पारण समय- 26 मार्च  2021 को सुबह 06 बजकर 18 मिनट से 08 बजकर 21 मिनट तक
 

आमलकी एकादशी व्रत की कथा
राजा मान्धाता के पूछने पर ऋषि वशिष्ठ ने आमलकी एकादशी व्रत का माहात्म्य बताते हुए कहा कि यह व्रत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन होता है। इस व्रत के फल से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत को करने से एक हजार गायों को दान करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। आमलकी एकादशी पर (आंवले) की महत्ता उसके गुणों के कारण उसकी पूजा का विधान है इसके अतिरिक्त माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के श्रीमुख से हुई है।

कथा के अनुसार प्राचीन समय में वैदिक नामक एक नगर था। उस नगर में चैत्ररथ नामक चंद्रवंशी राजा राज्य करता था। राजा उच्चकोटि का विद्वान होने के साथ ही बहुत धार्मिक प्रवृत्ति का था। राजा प्रत्येक एकादशी का व्रत किया करता था। उसके राज्य में सभी लोग एकदशी के व्रत का पालन और पूजन किया करते थे। इसी तरह उस राज्य में सभी सुख-शांति के साथ प्रसन्नता पूर्वक रहा करते थे। एक बार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी तिथि पर राजा और  उसकी प्रजा में बालक, युवा और वृद्धजनों सभी ने प्रसन्नतापूर्वक अमालकी एकादशी का व्रत किया। इसके बाद अपनी प्रजा के साथ मंदिर में जाकर राजा ने कलश स्थापित करके  धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न, छत्र आदि से पूजन किया। इसके बाद सभी लोग मंदिर में ही रात्रि जागरण करने लगे। रात के समय मंदिर में एक बहेलिया आया। वह बहेलिया अपने कुटुंब का पालन-पोषण जीव हिंसा (शिकार) करके किया करता था। उस समय वह भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल था। भोजन पाने की इच्छा से वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया। उस जगह बैठकर वह भगवान विष्णु की कथा तथा एकादशी माहात्म्य सुनने लगा। इस प्रकार उस बहेलिए ने सारी रात अन्य लोगों के साथ जागरण कर व्यतीत की। प्रात:काल सभी लोग अपने-अपने निवास पर चले गए। वह बहेलिया भी अपने घर चला गया और वहां जाकर भोजन किया।

विज्ञापन
विज्ञापन

अमालकी के प्रभाव से बहेलिए को मिला राजा का जन्म
कुछ समय पश्चात बहेलिए की मृत्यु हो गई। उसने जीव हिंसा की थी, इस कारण वह घोर नरक का भागी था परंतु उस दिन आमलकी एकादशी का व्रत तथा जागरण के प्रभाव से उसने राजा विदुरथ के यहां जन्म लिया। उसका नाम वसुरथ रखा गया। बड़ा होने पर वह चतुरंगिणी सेना सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर दस सहस्त्र ग्रामों का संचालन करने लगा। वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चंद्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान तथा क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णुभक्त था। 

एक बार राजा वसुरथ शिकार खेलने गया। वह वन में रास्ता भटक गया और दिशा का ज्ञान न होने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। रात में वहां डाकू आए और राजा को अकेला सोता हुआ देखकर वसुरथ की ओर दौड़े। वे राजा को पहचान गए। वह डाकू कहने लगे कि इस दुष्ट राजा ने हमारे माता-पिता, पुत्र-पौत्र आदि समस्त संबंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया। अब हमें इसे मारकर अपने अपमान का बदला लेना चाहिए। वे डाकू राजा पर टूट पड़े और हथियारों से प्रहार करने लगे परंतु डाकू जब भी अस्त्रों से राजा के ऊपर प्रहार करते वह फूल के समान हो जाते। आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुई। वह देवी अत्यंत सुंदर थी तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत थी। उसकी आंखों से क्रोध की भीषण लपटें निकल रही थी। उस देवी ने कुछ ही क्षणों में उन सभी डाकुओं का नाश कर दिया। जब राजा नींद से जागा तो उसने ने वहां अनेक डाकुओं को मृत देखा तो वह आश्चर्य होकर सोचने लगा किसने इन्हें मारा? इस वन में कौन मेरा हितैषी रहता है? राजा वसुरथ ऐसा विचार कर ही रहा था कि तभी उसी समय वहां आकाशवाणी हुई 'हे राजन! यह सब आमलकी एकादशी के प्रभाव से हुआ है। इस संसार मे भगवान विष्णु के अतिरिक्त तेरी रक्षा कौन कर सकता है। इस आकाशवाणी को सुनने के पश्चात राजा ने भगवान विष्णु को स्मरण कर उन्हें प्रणाम किया, फिर अपने नगर को वापस आ गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा।


 

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स,स्वास्थ्य संबंधी सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed