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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   Ahoi Ashtami 2020 Ahoi Ashtami Vrat Katha in Hindi

Ahoi Ashtami Vrat Katha: अहोई अष्टमी की व्रत कथा, जिसे सुनकर मिलता है व्रत फल

Thu, 05 Nov 2020 07:12 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: रुस्तम राणा Updated Thu, 05 Nov 2020 07:12 AM IST
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Ahoi Ashtami 2020 Ahoi Ashtami Vrat Katha in Hindi
अहोई अष्टमी 2020: व्रत कथा - फोटो : self

अहोई अष्टमी व्रत हर साल कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन रखा जाता है। इस साल यह व्रत 8 नवंबर को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माताओं के द्वारा संतान की दीर्घायु के लिए अहोई अष्टमी व्रत रखा जाता है। इस दिन अहोई माता की पूजा का विधान है। व्रत करने वाली माताओं को अहोई अष्टमी व्रत कथा को जरूर सुनना चाहिए। यह इस प्रकार है -  

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अहोई अष्टमी व्रत कथा (Ahoi Ashtami Vrat Katha)
प्राचीन समय में किसी नगर में एक साहूकार रहता था उसके सात लड़के थे। दीपावली से पूर्व साहूकार की स्त्री घर की लीपा -पोती हेतु मिट्टी लेने खदान में गई ओर कुदाल से मिट्टी खोदने लगी। उसी जगह एक सेह की मांद थी। सहसा उस स्त्री के हाथ से कुदाल सेह के बच्चे को लग गई जिससे सेह का बच्चा तत्काल मर गया। 
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अपने हाथ से हुई ह्त्या को लेकर साहूकार की पत्नी को बहुत दुःख हुआ परन्तु अब क्या हो सकता था। वह शोकाकुल पश्चाताप करती हुई अपने घर लौट आई। कुछ दिनों बाद उसके बेटे का निधन हो गया। फिर अचानक दूसरा, तीसरा ओर इस प्रकार वर्ष भर में उसके सातों बेटे मर गए। महिला अत्यंत व्यथित रहने लगी।
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एक दिन उसने अपने आस-पड़ोस की महिलाओं को विलाप करते हुए बताया कि उसने जान-बूझकर कभी कोई पाप नही किया। हाँ, एक बार खदान में मिट्टी खोदते हुए अनजाने में उससे एक सेह के बच्चे की ह्त्या अवश्य हुई है और उसके बाद मेरे सातों पुत्रों की मृत्यु हो गयी। यह सुनकर औरतों ने साहूकार की पत्नी को दिलासा देते हुए कहा कि यह बात बताकर तुमने जो पश्चाताप किया है उससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। 


तुम उसी अष्टमी को भगवती पार्वती की शरण लेकर सेह ओर सेह के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी आराधना करो और क्षमा-याचना करो। ईश्वर की कृपा से तुम्हारा पाप नष्ट हो जाएगा। साहूकार की पत्नी ने उनकी बात मानकर कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उपवास व पूजा-याचना की। वह हर वर्ष नियमित रूप से ऐसा करने लगी। बाद में उसे सात पुत्रों की प्राप्ति हुई, तभी से अहोई व्रत की परम्परा प्रचलित हो गई। इस कथा से अहिंसा की प्रेरणा भी मिलती है।

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