फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   according to hindu religion know importance of wearing ornaments in hindu culture

धर्म: हिंदू संस्कृति में अलंकार धारण करने का महत्त्व

Thu, 16 Dec 2021 02:52 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 16 Dec 2021 02:52 PM IST
सार

हिंदू धर्म में देवता का पूजन करते समय उन्हें वस्त्रालंकारों से सुशोभित करने की पद्धति है। दीपावली में श्री लक्ष्मीपूजन के समय अलंकार धारण करने हेतु देवी से प्रार्थना करते हैं।

विज्ञापन
according to hindu religion know importance of wearing ornaments in hindu culture
हिंदू धर्म में स्त्रियों को विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट अलंकार धारण करने की सलाह दी जाती है। जैसे विवाह समारोह और त्योहारों के समय में बाजूबंद और कमरबंद पहनना।

विस्तार

अलंकार हिंदू संस्कृति की अनमोल धरोहर है। समय के परिवर्तन के साथ हिंदू संस्कृति पर पश्चिमी संस्कृति का रंग चढा। अलंकार रूपी धरोहर की ओर अनदेखी होने लगी। केवल हिंदू संस्कृति में इस प्रकार सिर, बाल, कान, नाक, गर्दन, हाथ, उंगलियों, कमर तथा पैर में गहने पहनने की परंपरा है। इसके अतिरिक्त, हिंदू धर्म में स्त्रियों को विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट अलंकार धारण करने की सलाह दी जाती है। जैसे विवाह समारोह और त्योहारों के समय में बाजूबंद और कमरबंद पहनना। ये आभूषण प्रदर्शन या सुख पाने की वस्तुएं नहीं हैं, अपितु स्त्रियों को चैतन्य (दिव्य चेतना) प्रदान करने के लिए एवं उनमें देवत्व को सक्रिय करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं। हिंदू संस्कृति में सम्पूर्ण शरीर पर अलंकार धारण करने की परंपरा के महत्त्व को समझा जा सकता है। यह केवल हिंदू संस्कृति की महानता को दिखाता है जो हर चरण पर मानवता के आध्यात्मिक कल्याण के बारे में सोचता है। अलंकार धारण करने का महत्त्व इस लेख में समझ लेंगे।  
विज्ञापन


1. हिंदू धर्म में अलंकृत होना एक प्रमुख आचार - अलंकार के बिना आकार तेजोमय नहीं। आकार के बिना क्रिया नहीं। क्रिया के बिना प्रकृति नहीं और प्रकृति के बिना माया नहीं। मायारूपी विश्व को चैतन्यमय बनाने के लिए अलंकारों की आवश्यकता होती है।
विज्ञापन


2. अलंकारों द्वारा तेजस्विता एवं प्रसन्नता प्रदान होना- अलंकारों के स्पर्श से देह की चेतना जागृत होती है। चेतना से देह में सजगता आती है। सजगता से देह सात्त्विक तेज रूपी तरंगें ग्रहण कर संवेदनशील बनता है। इस संवेदनशीलता से ही तेजस्विता आती है। तेजस्विता से देवत्व आता है एवं देवत्व से प्रसन्नता आती है। प्रसन्नता से आनंदरूप ईश्वरीय तत्त्व का बोध होता है। ईश्वरीय तत्त्व के आकलन से मोक्ष प्राप्त हो सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


3. तारक एवं मारक तत्त्व- मुखमंडल का तथा दमकने वाले अलंकारों का आह्लादयुक्त तेज, वायुमंडल के रज-तमात्मक कणों का नाश करता है, इसलिए वह तारक अर्थात देवत्व प्रदान करने वाला है और मारक अर्थात अनिष्ट शक्तियों को नष्ट करने वाला है।

4. सौंदर्यवृद्धि के लिए अलंकार उपयुक्त - मनुष्य को अपनी देह के प्रति आसक्ति रहती है। देह को सजाने के लिए अर्थात अपने सौंदर्य में वृद्धि करने के लिए अलंकार धारण किए जाते हैं।

5. अलंकार धारण करने से देवता की तरंगें ग्रहण कर पाना- देवताओं द्वारा अलंकार धारण किए जाने से देवताओं से प्रक्षेपित तरंगें अलंकारों के माध्यम से व्यक्ति के लिए ग्रहण करना संभव होना होता है, भक्तों के लिए देवता का तेज सहज उपलब्ध करने का साधन है अलंकार। देवताओं से प्रक्षेपित तरंगें ग्रहण करना संभव हो, इसलिए देवता भी अलंकारों सहित होना - कलियुग में जीव की कुल सात्त्विकता अल्प है। इसलिए जीवों को अलंकार जैसे बाह्य माध्यमों का उपयोग हो, उसी प्रकार देवताओं से प्रक्षेपित तरंगों को भी अलंकारों के माध्यम से सगुणता प्राप्त हो तथा ऐसा तत्त्व सामान्य व्यक्ति के लिए ग्रहण करना सरल हो, इस उद्देश्य से ईश्वर ने सामान्य जनों के लिए प्रत्येक देवता के रूप की निर्मित अलंकारों सहित की। अतः हिंदू धर्म में देवता का पूजन करते समय उन्हें वस्त्रालंकारों से सुशोभित करने की पद्धति है। दीपावली में श्री लक्ष्मीपूजन के समय अलंकार धारण करने हेतु देवी से प्रार्थना करते हैं। उस समय निम्नांकित श्लोक का पाठ किया जाता है।

रत्नकंकणकेयूरकांचीकुण्डलनूपुरम्। मुक्ताहारं किरीटं च गृहाणाभरणानिमे।।

अर्थ : हे देवी, रत्नजडित कंगन, केयूर अर्थात बाहुबंद, करधनी, कर्णाभूषण, पायल, मोतियों का हार, मुकुट इत्यादि अलंकार धारण करें।

अलंकारों के माध्यम से देवताओं का चैतन्य ग्रहण कर पाना - अलंकार अर्थात ईश्वरीय तत्त्व ग्रहण कर जीव को उसका लाभ करवाने वाला प्रणेता। अलंकार धारण करने से देह द्वारा देवताओं की चैतन्यदायी उर्जाशक्ति का स्रोत ग्रहण होता है तथा जीव को कार्य करने की गति मिलती है। अलंकार धारण करने से सगुण चैतन्य ग्रहण करना तथा इस चैतन्य को देह के अलंकारों के माध्यम से घनीभूत कर, उसका प्रक्षेपण आवश्यकतानुसार अल्पावधि में करना संभव होता है।शरीर के विशिष्ट भाग पर विशिष्ट अलंकार धारण करना अर्थात सगुणत्व के माध्यम से ब्रह्मांड मंडल में विशिष्ट समय पर कार्यरत देवता का तेज रूपी चैतन्य ग्रहण करना सरल होना। अलंकार शरीर के सौंदर्य के कारण नहीं, अपितु ईश्वर से मनुष्य के शरीर को प्राप्त चैतन्य के कारण ही सुशोभित होते हैं।

त्योहार एवं धार्मिक विधि के दिन और शुभ दिन पर नए अथवा रेशमी वस्त्र एवं विविध अलंकार धारण करने से देवताओं की तरंगें ग्रहण कर पाना-  त्योहार तथा धार्मिक विधि के दिन तथा शुभदिन पर कभी-कभी देवता सूक्ष्म रूप से भूतल पर आते हैं। उस दिन व्यक्ति का वस्त्रालंकारों से सुशोभित होना, उसके द्वारा देवताओं के आगमन का स्वागत करने के समान है। इससे देवता प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं और व्यक्ति देवताओं की तरंगें ग्रहण कर पाता है।
 

6. उद्देश्यानुसार कलाकृति युक्त अलंकार - देवता का तारक अथवा मारक तत्त्व आकृष्ट करने के उद्देश्य के अनुसार नाग, कमल इत्यादि कलाकृति युक्त अलंकार धारण किए जाते हैं।

7. अलंकार धारण करने से अनायास सूचीदाब (एक्यूप्रेशर) उपायों का लाभ होना-  सूचीदाब अर्थात शरीर के विशिष्ट अवयवों से संबंधित विशिष्ट बिंदु पर दबाव देकर शरीर में चैतन्यशक्ति के प्रवाह में आई अस्वास्थ्यकारी शक्ति की बाधा दूर करना। ‘सूचीदाब’उपायों से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्टों के निराकरण में सहायता मिलती है। (इस विषय की जानकारी सनातन के ग्रंथ ‘शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्टों पर उपाय ‘सूचीदाब (एक्यूप्रेशर)’ तथा आगामी ‘सामान्य रोगों के लिए सूचीदाब उपाय (अनुभूतियों सहित)’में दी है।) ‘विविध अलंकार धारण करने से शरीर के विशिष्ट भाग के बिंदुओं पर दबाव पडता है, जिससे अनायास सूचीदाब (एक्यूप्रेशर) उपाय होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ‘पूर्वकाल से चला आ रहा अलंकार धारण करने का उद्देश्य आध्यात्मिक स्तर पर किस प्रकार सूचीदाब पद्धति के माध्यम से जीव के लिए अज्ञात ही निरंतर कार्यरत है।’प्राचीन काल के जीवों द्वारा अलंकार धारण करने के आचार का परिपूर्ण पालन किया जाता था। इसलिए उन्हें किसी बाह्य माध्यम से स्वयं पर सूचीदाब पद्धति का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं पडी; क्योंकि वे अपने जीवन में निरंतर ही सूचीदाब का अनुभव कर रहे थे। कलियुग में हिंदू आचारधर्म से विन्मुख हो चुका है, जिसके कारण बाह्यतः इस पद्धति का उपयोग करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई है। इस प्रकार पूर्वकाल से ही सूचीदाब की पद्धति का उपयोग किया जाता था। इससे यही प्रमाणित होता है कि आचार धर्म द्वारा उसका उपयोग चैतन्य के स्तर पर करने में हमारे वैदिक जन अग्रसर थे।’

8. अलंकारों के कारण चक्रशुद्धि तथा चक्रजागृति होना - अलंकार शरीर के विशिष्ट अवयवों से संबंधित होते हैं। प्रत्येक अवयव शरीर के विशिष्ट चक्र (उदा. अनाहतचक्र, आज्ञाचक्र) से संबंधित होता है। विशिष्ट अवयव पर अलंकार धारण करने से अलंकारों के माध्यम से कार्यरत ईश्वरीय चैतन्य विशिष्ट अवयव से संबंधित चक्र तक पहुंचता है। इससे साध्य चक्रशुद्धि होने से नकारात्मकता से पीडित व्यक्ति का कष्ट घटने में सहायता मिलती है। जो नकारात्मकता पीडा से मुक्त हैं, उनके चक्र जागृत होते हैं। इससे उन्हें विशिष्ट चक्र से संबंधित अनुभूति हो सकती है, उदा. अनाहत चक्र की जागृति से ईश्वर के प्रति भाव जागृत होता है।

9. अलंकारों के कारण नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होना - प्राचीन काल में क्षत्रिय राजा अलंकार (सोने -चांदी के) धारण करते थे। इस कारण शत्रु द्वारा अघोरी (तांत्रिक) प्रयोग करने पर उससे उनकी रक्षा होने में सहायता मिलती थी।

10. ग्रह पीड़ा से बचने के लिए अलंकार धारण करना - मनुष्य के जीवन पर ग्रहों का बडा प्रभाव होता है। ग्रह पीड़ा निवारण के लिए अथवा उससे बचने के लिए विविध रत्नजडित अंगूठियां धारण करने के विषय में ज्योतिषशास्त्र में जानकारी दी जाती है।

संदर्भ : सनातन संस्था का सात्त्विक ग्रंथ ‘अलंकारों का महत्त्व’
विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स,स्वास्थ्य संबंधी सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed